# टेनरियों के जहरीले पानी को गंगा तक पहुंचने से रोक रहा जाजमऊ का 450 करोड़ रुपये का ट्रीटमेंट प्लांट

> कानपुर के जाजमऊ में टेनरियों के दूषित पानी को गंगा में मिलने से रोकने के लिए 450 करोड़ रुपये का सीईटीपी प्लांट रोज करीब 10 से 12 एमएलडी पानी को कई चरणों में साफ कर रहा है, जबकि इसकी क्षमता 20 एमएलडी है।

**Type:** article · **Category:** उत्तर प्रदेश · **Published:** 2026-09-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttar-pradesh/tenariyon-ke-jaharile-pani-ko-ganga-taka-pahunchane-se-roka-raha-jajmau-ka-450-karora-rupaye-ka-tritamenta-planta-29466 · **Language:** Hindi
**Tags:** गंगा प्रदूषण, जाजमऊ, कानपुर सीईटीपी, टेनरी उद्योग, नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा, क्रोमियम प्रदूषण, चमड़ा उद्योग

कानपुर के जाजमऊ इलाके की गिनती लंबे समय तक शहर के सबसे गंदे और प्रदूषित हिस्सों में होती रही, और इसकी बड़ी वजह यहां की चमड़ा टेनरियां मानी जाती थीं, जिनसे निकलने वाला जहरीला पानी सीधे गंगा में मिल जाता था। इसी संकट को खत्म करने के मकसद से जाजमऊ में एक कॉमन इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट यानी सीईटीपी तैयार किया गया, जिसकी लागत करीब 450 करोड़ रुपये आई और इसकी क्षमता 20 एमएलडी रखी गई, ताकि टेनरियों का पानी गंगा तक पहुंचने से पहले ही रोका जा सके। यह प्लांट 2019 में बनकर तैयार हो गया था, मगर पूरी क्षमता के साथ इसका काम 2024 से शुरू हो पाया। आज हालात यह हैं कि रोजाना करीब 10 से 12 एमएलडी दूषित पानी इस प्लांट तक पहुंचता है और उसे कई अलग-अलग चरणों से गुजारकर साफ किया जाता है, इसके बाद ही वह आगे भेजा जाता है।

## चार जोन और मास्टर पंपिंग स्टेशन से होकर पहुंचता है पानी
जाजमऊ में फिलहाल 276 टेनरियां चल रही हैं, और इनसे निकलने वाला दूषित पानी सीधे नदी में नहीं बहाया जाता। इसके बजाय पूरे इलाके को चार जोन में बांटकर पाइपलाइन के जरिए पानी को अलग-अलग पंपिंग स्टेशनों तक भेजा जाता है। पंपिंग स्टेशन एक, दो और चार का पानी आगे पंपिंग स्टेशन तीन में इकट्ठा होता है, जिसे मास्टर पंपिंग स्टेशन का दर्जा दिया गया है। यहीं से सारा दूषित पानी सीईटीपी के इनलेट तक भेजा जाता है, और तभी असली सफाई का काम शुरू होता है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा से जुड़े प्रोजेक्ट इंजीनियर विकास तिवारी बताते हैं कि प्लांट में एक्टिवेटेड स्लज तकनीक अपनाई गई है। सबसे पहले पानी में मौजूद बड़े कचरे और भारी कणों यानी ग्रीट को अलग किया जाता है, इसके बाद पानी को टीएसएस टैंक में भेजा जाता है जहां ठोस कण हटाए जाते हैं।

## क्रोमियम जैसे खतरनाक तत्वों को हटाने के लिए कई पड़ाव
चमड़ा बनाने के दौरान इस्तेमाल होने वाले रसायनों में क्रोमियम जैसे तत्व शामिल होते हैं, जो बिना उपचार के नदी में मिलने पर पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। इसी वजह से सीईटीपी में पानी को एक नहीं, बल्कि कई पड़ावों से गुजारा जाता है। ग्रीट अलग करने और टीएसएस टैंक की प्रक्रिया के बाद पानी में केमिकल डोजिंग की जाती है और फिर बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट होता है। इसके आगे अल्ट्रा फिल्ट्रेशन सहित अन्य तकनीकों का इस्तेमाल करके पानी को और बेहतर बनाया जाता है। इस पूरी कड़ी में एक्सटेंडेड एयरेशन सिस्टम की भूमिका भी अहम मानी जाती है, क्योंकि यही जैविक प्रक्रिया के जरिए पानी में घुले प्रदूषक तत्वों की मात्रा घटाता है। यह पूरी श्रृंखला इसलिए बनाई गई है ताकि किसी एक चरण की कमी की वजह से अनुपचारित पानी आगे न निकल जाए। सारे चरण पूरे होने के बाद शुद्ध किया गया पानी इरीगेशन चैनल के रास्ते खेतों की सिंचाई के लिए भेज दिया जाता है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक इस प्लांट के चालू होने के बाद टेनरियों का गंदा पानी अब सीधे गंगा में नहीं जा रहा।

## 20 एमएलडी की क्षमता, फिर भी आधा पानी ही पहुंच रहा
सीईटीपी हर दिन बीस एमएलडी यानी करीब दो करोड़ लीटर दूषित पानी को साफ करने में सक्षम है, लेकिन अभी इसमें केवल 10 से 12 एमएलडी पानी ही आ पा रहा है। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि जाजमऊ की ज्यादातर टेनरियां अपनी पूरी क्षमता से नहीं, बल्कि आधी क्षमता पर ही चल रही हैं। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अजीत सुमन के हवाले से बताया गया कि चालू टेनरियों को आधी क्षमता पर ही काम करने की मंजूरी दी गई है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार 65 टेनरियां पूरी तरह बंद पड़ी हैं, जबकि 13 टेनरियों को सिर्फ सूखे काम यानी बिना पानी वाली प्रक्रियाओं की ही इजाजत है। इसके अलावा 46 टेनरियां डिस्मेंटेल्ड यानी हटाई जा चुकी श्रेणी में दर्ज हैं। प्लांट की तय क्षमता और अभी पहुंच रहे पानी के बीच का यह फासला बताता है कि जाजमऊ की टेनरियों का उत्पादन अब भी किस हद तक सीमित है।

## प्रदूषण की सबसे बड़ी कड़ी पर लगी रोक
जाजमऊ का यह प्लांट इसलिए खास मायने रखता है क्योंकि यहीं पर चमड़ा उद्योग और गंगा नदी के बीच बनने वाली प्रदूषण की सबसे बड़ी कड़ी को तोड़ने की कोशिश हो रही है। यह प्लांट ठीक उसी जगह बनाया गया है जहां से कभी टेनरियों का पानी गंगा में मिलता था, और यही वजह है कि अधिकारी इसे प्रदूषण रोकने की पूरी मुहिम का सबसे अहम हिस्सा मानते हैं। जिस जाजमऊ का नाम बरसों तक गंगा में फैलती गंदगी के साथ जोड़कर लिया जाता रहा, वहीं अब करोड़ों रुपये खर्च करके तैयार किया गया यह ट्रीटमेंट प्लांट दूषित पानी को नदी तक पहुंचने से पहले रोकने और साफ करने का जरिया बन चुका है।

## इसका आप पर असर
जाजमऊ का यह प्लांट सीधे तौर पर गंगा किनारे रहने वाले और नदी के पानी पर निर्भर लोगों को प्रभावित करता है।

- **भारत में:** गंगा सफाई से जुड़ा हर कदम नदी किनारे बसे करोड़ों लोगों की सेहत और पानी की गुणवत्ता से जुड़ा है। जिन इलाकों में गंगा जल सिंचाई या पीने के काम आता है, वहां ऐसे ट्रीटमेंट प्लांट प्रदूषण घटाने में मदद कर सकते हैं।
- **कानपुर में:** जाजमऊ के आसपास रहने वालों को इसका सीधा फायदा है, क्योंकि टेनरियों का जहरीला पानी अब सीधे गंगा में नहीं मिल रहा। इससे स्थानीय जल स्रोतों की गुणवत्ता सुधरने की उम्मीद बनती है।
- **किसानों के लिए:** शोधित पानी इरीगेशन चैनल के जरिए खेतों तक भेजा जा रहा है, जिससे आसपास के किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिल रहा है।
- **टेनरी कारोबार पर असर:** आधी क्षमता पर काम करने की शर्त और कई टेनरियों के बंद होने से जाजमऊ के चमड़ा कारोबार से जुड़े लोगों की कमाई पर असर पड़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
जाजमऊ की पहचान लंबे समय तक गंगा में फैलते प्रदूषण से जुड़ी रही, और इसकी सीधी वजह यहां की चमड़ा टेनरियों से निकलने वाला बिना शोधित पानी था।

- **सीधा कारण:** टेनरियों से निकलने वाले पानी में क्रोमियम जैसे रासायनिक तत्व होते थे, जो बिना उपचार के गंगा में मिलकर प्रदूषण बढ़ाते थे।
- **पुरानी व्यवस्था की कमी:** पहले दूषित पानी को साफ करने के लिए इतनी बड़ी और संगठित प्रणाली मौजूद नहीं थी, जिससे पानी सीधे नदी तक पहुंच जाता था।
- **समाधान के तौर पर सीईटीपी:** इसी समस्या से निपटने के लिए 450 करोड़ रुपये की लागत से 20 एमएलडी क्षमता का प्लांट बनाया गया, जो एक्टिवेटेड स्लज प्रक्रिया के जरिए पानी को कई चरणों में साफ करता है।
- **क्षमता पर पाबंदी क्यों:** प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने टेनरियों को आधी क्षमता पर चलाने की शर्त रखी है, ताकि निकलने वाले दूषित पानी की मात्रा सीमित रखी जा सके।

## सवाल-जवाब

### 1. जाजमऊ का सीईटीपी किस मकसद से बनाया गया?
चमड़ा टेनरियों से निकलने वाले दूषित पानी को गंगा में मिलने से पहले साफ करने के लिए।

### 2. इस प्लांट को बनाने में कितना खर्च आया?
करीब 450 करोड़ रुपये।

### 3. प्लांट कब बना और पूरी क्षमता से कब शुरू हुआ?
प्लांट 2019 में बनकर तैयार हुआ और 2024 से पूरी क्षमता के साथ चल रहा है।

### 4. फिलहाल रोज कितना दूषित पानी प्लांट तक पहुंच रहा है?
करीब 10 से 12 एमएलडी, जबकि प्लांट की क्षमता 20 एमएलडी है।

### 5. जाजमऊ में कितनी टेनरियां चल रही हैं?
276 टेनरियां संचालित हैं, जबकि 65 पूरी तरह बंद हैं, 13 को सिर्फ सूखे काम की इजाजत है और 46 डिस्मेंटेल्ड श्रेणी में हैं।

### 6. प्लांट में पानी को कैसे साफ किया जाता है?
ग्रीट हटाने, टीएसएस टैंक, केमिकल डोजिंग, बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट, एक्सटेंडेड एयरेशन और अल्ट्रा फिल्ट्रेशन जैसे कई चरणों से गुजारकर।

### 7. शोधित पानी का इस्तेमाल कहां होता है?
शोधित पानी इरीगेशन चैनल के जरिए खेतों की सिंचाई के लिए भेजा जाता है।

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