टूटी बल्लियों और टपकते तिरपाल के नीचे कट रही जिंदगी, बलिया के बड़ागांव में योजना के पक्के मकान की राह देख रहा छह लोगों का परिवार बलिया के मनियर ब्लॉक स्थित बड़ागांव में चार बच्चों का एक गरीब परिवार टीन और तिरपाल की बदहाल झोपड़ी में रहने को विवश है, जहां प्रशासनिक मदद का अब तक इंतजार है। उत्तर प्रदेश के जनपद बलिया अंतर्गत मनियर ब्लॉक के बड़ागांव में छह सदस्यों का एक परिवार बुनियादी छत के अभाव में अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में गुजर-बसर कर रहा है। पति-पत्नी और उनके चार मासूम बच्चे बांस की कमजोर बल्लियों तथा टीन-तिरपाल के सहारे टिकी एक कच्ची झोपड़ी में रहते हैं। मौसम का मिजाज बदलते ही इस आशियाने की लाचारी खुलकर सामने आ जाती है। बरसात के दिनों में टपकती छत से गिरने वाला पानी परिवार की दैनिक दिनचर्या को अस्त-व्यस्त कर देता है। चार बच्चों का पालन-पोषण कर रहीं निर्मला देवी अपने कलेजे के टुकड़ों को समेटकर भूख, कड़ाके की ठंड और बारिश के थपेड़ों से एक साथ जूझने को मजबूर हैं। झोपड़ी के भीतर का नजारा उनकी विकट गरीबी की गवाही देता है, जहां बिखरा हुआ राशन और पानी में डूबी स्कूली किताबें व्यवस्था की बेरुखी बयां करती हैं। शादी के बाद से नहीं बदली बदहाली, हादसे ने बढ़ाई शारीरिक पीड़ा निर्मला देवी बताती हैं कि विवाह के बाद से ही उनका पूरा जीवन इसी बदहाल झोपड़ी की चहारदीवारी में कट रहा है। आज तक उनके परिवार को किसी पक्के और सुरक्षित मकान में रहने का सुख नसीब नहीं हो सका। मानसून के आते ही बच्चों के तन के कपड़े, पढ़ाई की कॉपियां और रसोई में रखा खाने का सामान पूरी तरह भीग जाता है। परिवार का पालन-पोषण करने के लिए उनके पति छोटक चौहान मजदूरी करते हैं, लेकिन दिहाड़ी से होने वाली सीमित कमाई से दो वक्त का भोजन जुटाना भी एक बड़ी चुनौती बना रहता है। कुछ समय पहले भोजन पकाते समय झोपड़ी में अचानक आग लग गई थी। इस भीषण अग्निकांड में निर्मला बुरी तरह झुलस गई थीं। उस दर्दनाक हादसे के बाद से उनके शरीर पर गहरे जख्म बन गए और उन्हें बोलने में भी गंभीर कठिनाई का सामना करना पड़ता है। सीमित सरकारी राशन और डॉक्टर बनने के ख्वाब पर मौसम की मार खाद्य सुरक्षा के नाम पर इस छह सदस्यीय परिवार को सरकारी तंत्र से केवल पांच किलो राशन उपलब्ध होता है। इतनी अल्प मात्रा पूरे परिवार की भूख शांत करने के लिए बिल्कुल नाकाफी साबित होती है, जिसके चलते निर्मला की बहनें समय-समय पर आवश्यक सहायता पहुंचाती हैं। आर्थिक तंगी का आलम यह है कि पूरे वर्ष में एक बार नए कपड़े जुटा पाना भी परिवार के लिए बेहद कठिन हो जाता है। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच बच्चों की आंखों में भविष्य के सुनहरे सपने पल रहे हैं। निर्मला के दो बेटे विशाल और विकास पढ़ाई-लिखाई पूरी करके डॉक्टर बनने का सपना संजोए हुए हैं। विडंबना यह है कि हर बरसात में झोपड़ी में रिसता पानी उनकी किताबों और कॉपियों को गला देता है, जिससे उनकी कलम की स्याही और भविष्य के अरमान बह जाते हैं। प्रशासनिक संकल्प के बीच आवास योजना में नाम जोड़ने की प्रक्रिया प्रधानमंत्री आवास अथवा किसी अन्य सरकारी योजना के तहत इस बेसहारा परिवार को आज तक अपने घर के निर्माण के लिए एक ईंट भी प्राप्त नहीं हुई है। इसी लाचारी के बीच परिवार के एक बेटे किसान ने सीधे अधिकारियों से गुहार लगाते हुए आग्रह किया कि उनके पिता अत्यंत निर्धन मजदूर हैं, इसलिए उनके परिवार को एक पक्का आवास प्रदान कराया जाए। इधर जनपद बलिया के नवागत जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने एक प्रेस वार्ता के दौरान बलिया को पूरी तरह झोपड़ी मुक्त जिला बनाने का अपना पहला संकल्प व्यक्त किया है। पीड़ित परिवार अब जिला प्रशासन के इसी वादे के धरातल पर उतरने की प्रतीक्षा कर रहा है। इस संबंध में स्थानीय उपजिलाधिकारी ने पुष्टि की है कि प्रकरण प्रशासन के संज्ञान में आ चुका है और अगली सूची में इस परिवार का नाम शामिल किया जा रहा है, ताकि इन्हें शीघ्र आवास तथा शासन की समस्त कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित कराया जा सके। इसका आप पर असर यह मामला ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धन परिवारों तक सरकारी योजनाओं की वास्तविक पहुंच और निगरानी तंत्र की अहमियत को रेखांकित करता है। • भारत में: केंद्र व राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद कई पात्र परिवार प्रशासनिक सूचियों से बाहर रह जाते हैं। यदि कोई नागरिक बुनियादी आवास या राशन से वंचित है, तो वह स्थानीय ब्लॉक अथवा जनसेवा केंद्र के माध्यम से पात्रता सत्यापन की मांग कर सकता है। • बलिया में: जनपद के मनियर ब्लॉक और आसपास के इलाकों में बदहाल झोपड़ियों में रह रहे लोगों के लिए नए प्रशासनिक अभियान से उम्मीद बंधी है। चिन्हित लाभार्थियों को अगली आधिकारिक सूची में जोड़े जाने से पक्के मकान और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा। ऐसा क्यों हुआ यह स्थिति लंबे समय से जारी अत्यधिक गरीबी, परिवार के मुखिया की अनियमित दैनिक मजदूरी और सरकारी कल्याणकारी सूचियों में नाम दर्ज न होने के कारण पैदा हुई है। • अस्थिर आजीविका और घरेलू हादसा: परिवार पूरी तरह छोटक चौहान की दैनिक मजदूरी पर आश्रित है, जिससे केवल बुनियादी भोजन की व्यवस्था हो पाती है। इसके अलावा झोपड़ी में आग लगने से निर्मला देवी के झुलस जाने के कारण परिवार पर शारीरिक और मानसिक विपदा और बढ़ गई। • सरकारी सहायता का अभाव: छह सदस्यों के इस बड़े परिवार को केवल पांच किलो अनाज मिलता है, जो मासिक पोषण के लिए बेहद कम है। वर्षों से पक्के आवास के लिए किसी सरकारी योजना की सूची में नाम शामिल न होने के चलते वे तिरपाल की झोपड़ी में रहने को विवश रहे। • प्रशासनिक संज्ञान: बच्चों की सार्वजनिक गुहार और मामले के सामने आने के बाद स्थानीय उपजिलाधिकारी ने इसे संज्ञान में लिया। अब नए सिरे से सूची तैयार कर परिवार को औपचारिक आवास आवंटन से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई है। सवाल-जवाब 1. यह मामला किस जिले और ब्लॉक से जुड़ा है? यह मामला उत्तर प्रदेश के जनपद बलिया स्थित मनियर ब्लॉक के बड़ागांव का है। 2. परिवार में कुल कितने सदस्य हैं और वे कहां रह रहे हैं? परिवार में पति-पत्नी और उनके चार बच्चे हैं, जो टीन, तिरपाल और बांस की बल्लियों से बनी कच्ची झोपड़ी में रह रहे हैं। 3. परिवार के मुखिया का क्या नाम है और वे क्या काम करते हैं? परिवार के मुखिया छोटक चौहान हैं और वे मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। 4. निर्मला देवी को बोलने में समस्या क्यों होती है? खाना बनाते समय झोपड़ी में आग लगने के कारण निर्मला बुरी तरह झुलस गई थीं, जिससे उन्हें बोलने में परेशानी होती है। 5. निर्मला देवी के बेटों के क्या नाम हैं और वे भविष्य में क्या बनना चाहते हैं? उनके बेटे विशाल और विकास पढ़ाई करके डॉक्टर बनना चाहते हैं, जबकि एक अन्य बेटे का नाम किसान है। 6. बलिया के जिलाधिकारी ने क्या संकल्प व्यक्त किया है? नवागत जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बलिया को झोपड़ी मुक्त जिला बनाने का पहला संकल्प व्यक्त किया है। 7. स्थानीय प्रशासन ने परिवार की मदद के लिए क्या कदम उठाया है? एसडीएम ने स्पष्ट किया है कि मामला संज्ञान में ले लिया गया है और अगली सूची में नाम जोड़कर जल्द आवास और सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। https://trendkia.com/uttar-pradesh/tuti-balliyon-aura-tapakate-tirapala-ke-niche-kata-rahi-jindagi-ballia-ke-badagaon-men-yojana-ke-pakke-makana-ki-raha-dekha-raha-c-40343 TrendKia — Har trend, sabse pehle.