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  "title": "उत्तर प्रदेश में योगी को रोकने के लिए ओवैसी ने सपा और कांग्रेस को दिया साथ आने का न्योता",
  "summary": "एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि उनकी पार्टी योगी आदित्यनाथ को फिर मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहती, इसलिए वे विपक्षी दलों के साथ हाथ मिलाने को तैयार हैं।",
  "content": "उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सामने गठबंधन की नई पेशकश रखी है। राज्य के पश्चिमी हिस्से के दौरे के दौरान उन्होंने साफ किया कि उनका मुख्य मकसद योगी आदित्यनाथ को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उनकी पार्टी विपक्षी दलों के साथ चुनावी तालमेल बैठाने के लिए पूरी तरह तैयार है।\n\nकैराना से शामली तक बदला चुनावी सुर\nचुनावी जनसभाओं के दौरान ओवैसी के बयानों में तीखे तेवर और रणनीतिक लचीलापन दोनों देखने को मिले। कैराना में आयोजित रैली में उन्होंने पहले तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों पर जमकर प्रहार किए। हालांकि, इसके बाद शामली में उन्होंने अपने रुख में नरमी लाते हुए संकेत दिया कि वे मिलकर चुनाव लड़ने को राजी हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी नहीं चाहती कि योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालें।\n\nओवैसी ने अतीत का हवाला देते हुए याद दिलाया कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनकी पार्टी ने राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने की पूरी कोशिश की थी। हालांकि, उस समय उनके गठबंधन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया था। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में जो भी दल योगी आदित्यनाथ को तीसरी बार सत्ता में आने से रोकने के प्रति गंभीर हैं, एआईएमआईएम बिना किसी झिझक के उनके साथ मंच साझा करने को तैयार है।\n\nअखिलेश यादव पर तीखे हमले और मुस्लिम प्रतिनिधित्व का सवाल\nकैराना में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए ओवैसी समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर बेहद आक्रामक नजर आए। खुद की तुलना रावण से किए जाने के बयान पर पलटवार करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव दरअसल भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भाषा बोल रहे हैं।\n\nसमुदाय की राजनीतिक भागीदारी पर जोर देते हुए ओवैसी ने कहा कि जब तक अब्दुल खुद नेता नहीं बनेगा, तब तक लोगों के बुनियादी मसले हल नहीं होंगे। उन्होंने यह भी तर्क रखा कि जब समाजवादी पार्टी को 90 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन हासिल होता है, तो सत्ता और विपक्ष में उनकी वास्तविक समस्याओं को लेकर जवाबदेही और सवाल भी सीधे अखिलेश यादव से ही पूछे जाएंगे। इसके साथ ही उन्होंने सपा से जुड़े मुस्लिम नेताओं की खामोशी पर भी सवाल खड़े किए।\n\nविपक्षी दलों की झिझक और वोट कटवा का ठप्पा\nयह पहली बार नहीं है जब ओवैसी ने राज्य में भाजपा विरोधी मोर्चे में शामिल होने की पहल की है। इससे पहले भी उन्होंने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के समक्ष औपचारिक गठबंधन का प्रस्ताव रखा था और इसके लिए 2 अक्टूबर तक का समय तय किया था। उस मियाद के बीत जाने के बाद भी मुख्य विपक्षी खेमे की ओर से कोई सकारात्मक जवाब सामने नहीं आया।\n\nसपा और अन्य विपक्षी दल ओवैसी के साथ औपचारिक समझौते से बचते रहे हैं। विपक्षी रणनीतिकारों का मानना है कि ओवैसी की चुनावी मौजूदगी से वोटों का ध्रुवीकरण तेज होता है, जिससे सीधे तौर पर भाजपा को चुनावी लाभ मिलता है। इसी वजह से उन्हें अक्सर वोट कटवा करार दिया जाता है। जब इस गठबंधन को लेकर अखिलेश यादव से रुख स्पष्ट करने को कहा गया था, तो उन्होंने दो टूक कहा था कि जिस गठबंधन ने पहले भाजपा को शिकस्त दी थी, समाजवादी पार्टी उसी पुराने गठबंधन के ढांचे को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित रखेगी। इसके अलावा 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की रैली को लेकर भी ओवैसी ने अपने विचार रखे हैं।\n\nइसका आप पर असर\nउत्तर प्रदेश के चुनावी परिदृश्य में ओवैसी की यह पेशकश विपक्षी एकता और मुस्लिम वोट बैंक के समीकरणों पर सीधा असर डाल सकती है।\n\n• उत्तर प्रदेश के मतदाताओं पर: यदि विपक्षी दल साथ आते हैं तो मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष वोटों के बंटवारे में कमी आ सकती है। इससे सीधे तौर पर कई संवेदनशील सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय होने के बजाय आमने-सामने का बन सकता है।\n• विपक्षी कार्यकर्ताओं के लिए: स्थानीय स्तर पर सपा, कांग्रेस और एआईएमआईएम कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति बन सकती है। नेताओं के अलग-अलग बयानों के चलते जमीनी स्तर पर चुनावी प्रचार की रणनीति प्रभावित हो सकती है।\n• चुनावी विकल्पों के संदर्भ में: मतदाताओं को यह तय करना होगा कि वे पारंपरिक पार्टियों पर भरोसा बनाए रखें या एआईएमआईएम जैसे मुखर विकल्प के साथ जाएं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रही मांगों से स्थानीय उम्मीदवारी तय करने पर दबाव बढ़ेगा।\n• सत्तारूढ़ दल की रणनीति पर: यदि गठबंधन नहीं बनता है तो वोटों का बिखराव भाजपा के चुनावी गणित को मजबूत बनाए रख सकता है। इसके चलते विपक्षी दलों को अपनी सीटों की रक्षा के लिए नई रणनीतियां बनानी होंगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह राजनीतिक घटनाक्रम उत्तर प्रदेश में चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होने से रोकने और मुस्लिम वोट बैंक पर राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की होड़ के कारण सामने आया है।\n\n• सत्ता परिवर्तन की कोशिश: ओवैसी का तात्कालिक उद्देश्य योगी आदित्यनाथ को लगातार तीसरे कार्यकाल से रोकना है। उनका मानना है कि बिखरे हुए विपक्ष के चलते सत्तारूढ़ दल को चुनावी बढ़त मिल जाती है।\n• अकेले लड़ने के अनुभव: बिहार और अन्य राज्यों में अकेले दम पर सीमित सफलता मिलने के बाद एआईएमआईएम बड़े दलों के साथ तालमेल बिठाकर अपनी सीटें और राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना चाहती है। हालांकि पहले बिहार में भी उनके ऐसे प्रयासों को कांग्रेस और राजद ने खारिज कर दिया था।\n• सपा की दूरी की वजह: समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एआईएमआईएम को साथ लेने से इसलिए बचती हैं क्योंकि उन पर वोटों के ध्रुवीकरण और वोट कटवा होने का आरोप लगता है। अखिलेश यादव उस पुराने गठबंधन को प्राथमिकता दे रहे हैं जिसने पूर्व में भाजपा का मुकाबला किया था।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. असदुद्दीन ओवैसी ने सपा और कांग्रेस को क्या प्रस्ताव दिया है?\nओवैसी ने योगी आदित्यनाथ को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए सपा और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का खुला प्रस्ताव दिया है।\n\n2. ओवैसी ने अखिलेश यादव पर क्या आरोप लगाए?\nओवैसी ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव भाजपा और आरएसएस की भाषा बोल रहे हैं और 90 फीसदी मुस्लिम वोट पाने के बावजूद उनकी समस्याओं पर जवाब नहीं देते।\n\n3. विपक्षी दल एआईएमआईएम के साथ गठबंधन से क्यों बच रहे हैं?\nविपक्षी दलों का मानना है कि ओवैसी की राजनीति से वोटों का ध्रुवीकरण होता है और उनकी पार्टी को अक्सर वोट काटने वाले दल के रूप में देखा जाता है।\n\n4. गठबंधन को लेकर अखिलेश यादव का क्या रुख रहा है?\nअखिलेश यादव ने स्पष्ट किया है कि समाजवादी पार्टी उसी गठबंधन ढांचे को आगे बढ़ाएगी जिसने पहले भाजपा को हराया था।",
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  "category": "उत्तर प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-10-26",
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