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  "title": "उत्तर प्रदेश 2027 चुनाव: पीलीभीत में लगातार तीसरी जीत की फिराक में भाजपा, हिसाब बराबर करने की जुगत में जुटी सपा",
  "summary": "पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र में पिछले नौ मुकाबलों में भाजपा छह बार जबकि सपा तीन बार विजयी रही है। आगामी 2027 के दंगल में दोनों दलों के बीच एक बार फिर जोरदार सियासी टकराव तय माना जा रहा है।",
  "content": "रुहेलखंड के सियासी फलक पर पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र संख्या 127 हमेशा से बेहद चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र रहा है। पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाले इस इलाके में पिछले आठ आम चुनावों और एक उपचुनाव का रिकॉर्ड बताता है कि मुकाबला मुख्य रूप से दो ध्रुवों के इर्द-गिर्द सिमटा रहा है। इस दौरान भारतीय जनता पार्टी ने छह बार अपना परचम लहराया, जबकि तीन मर्तबा समाजवादी पार्टी बाजी मारने में कामयाब रही। आगामी 2027 के प्रांतीय चुनाव को लेकर भाजपा जहां जीत का तीसरा क्रम पूरा करने की तैयारी कर रही है, वहीं सपा पिछले मुकाबले में हाथ से फिसली जीत का हिसाब चुकता करने के इरादे से जमीन मजबूत करने में जुटी है। इस क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने पर गौर करें तो मुस्लिम आबादी, कुर्मी मतदाता, अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के समूह चुनाव नतीजों की दिशा तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाते रहे हैं।\n\nनब्बे के दशक में राम मंदिर आंदोलन और भाजपा का उभार\nपीलीभीत के चुनावी इतिहास का एक बड़ा मोड़ 1991 के प्रांतीय चुनाव में देखने को मिला था। अयोध्या गोलीकांड के बाद उपजे माहौल में इस सीट पर पहली बार कमल खिला। भाजपा के उम्मीदवार बी.के. गुप्ता ने उस समय के सिटिंग विधायक और कांग्रेस प्रत्याशी रियाज अहमद को 19,978 मतों के बड़े अंतर से मात दी थी। इस मुकाबले में बी.के. गुप्ता के खाते में 47,617 वोट आए, जबकि रियाज अहमद को 27,639 मतों पर संतोष करना पड़ा था। उस दौर में जनता पार्टी के टिकट पर उतरे धीरेंद्र सहाय 11,629 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे। इस नतीजे ने जिले में लंबे समय तक चलने वाले नए राजनीतिक समीकरण की बुनियाद रख दी थी।\n\nइसके ठीक दो साल बाद, 1993 के मध्यावधि चुनाव में भी भाजपा का दबदबा कायम रहा। इस बार रियाज अहमद ने जनता पार्टी के चुनाव चिह्न पर बी.के. गुप्ता को चुनौती दी थी। हालांकि परिणाम में कोई फेरबदल नहीं हुआ और बी.के. गुप्ता 17,871 मतों के अंतर से दोबारा विधानसभा पहुंचे। बी.के. गुप्ता को 45,682 मत हासिल हुए, वहीं रियाज अहमद के पक्ष में 27,811 वोट पड़े थे। इस दंगल में समाजवादी पार्टी के हारून अहमद 19,876 वोटों के साथ तीसरे और कांग्रेस के माधव प्रसाद 11,570 वोटों के साथ चौथे पायदान पर रहे थे।\n\nबगावत के बीच 1996 में जीत और 2000 का उपचुनाव\nसाल 1996 के आम चुनाव में भाजपा के भीतर आंतरिक खींचतान सामने आई। पार्टी ने अपने दो बार के विजेता विधायक बी.के. गुप्ता का टिकट काटकर राज राय सिंह को मैदान में उतार दिया। इस फैसले के विरोध में बी.के. गुप्ता ने बतौर निर्दलीय पर्चा दाखिल कर मुकाबला बहुकोणीय बना दिया। दूसरी ओर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पार्टी एसजेपी (आर) से हारून अहमद और जनता दल से मोहम्मद जकी भी पूरी ताकत से ताल ठोक रहे थे। तमाम चुनौतियों के बावजूद भाजपा अपनी सीट बचाने में सफल रही। राज राय सिंह को 37,875 वोट मिले और उन्होंने हारून अहमद को 10,606 मतों से पराजित किया, जिन्हें 27,269 वोट मिले थे। इस चुनाव में जनता दल के मोहम्मद जकी को 22,652, बसपा के गोवर्धन को 19,797 और निर्दलीय लड़े बी.के. गुप्ता को 16,355 मत प्राप्त हुए थे।\n\nहालांकि राज राय सिंह अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं और उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। इसके चलते वर्ष 2000 में उपचुनाव कराना पड़ा। इस बार भाजपा ने अपने पुराने चेहरे बी.के. गुप्ता पर दोबारा भरोसा जताया और उन्हें मैदान में उतारा। बी.के. गुप्ता ने इस भरोसे को सही साबित करते हुए 40,203 वोट जुटाए और सपा उम्मीदवार एजाज अहमद को 14,432 मतों से शिकस्त दी। एजाज अहमद उस उपचुनाव में 25,771 वोट ही जुटा सके थे। इस जीत के साथ भाजपा ने लगातार चौथी बार इस क्षेत्र पर अपना कब्जा बनाए रखा था।\n\nरियाज अहमद का पलटवार और सपा का स्वर्णिम दौर\nसाल 2002 के विधानसभा चुनाव में पीलीभीत की चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल गई। इस बार रियाज अहमद समाजवादी पार्टी के सिंबल पर उतरे और उनका सीधा मुकाबला भाजपा के बी.के. गुप्ता से हुआ। रियाज अहमद ने पुरानी हारों का हिसाब चुकता करते हुए भाजपा प्रत्याशी को 9,971 वोटों से परास्त कर दिया। रियाज अहमद को 35,700 मत मिले, जबकि बी.के. गुप्ता 25,729 वोटों पर सिमट गए। इस चुनाव में पूर्व विधायक राज राय सिंह कांग्रेस की तरफ से लड़ी थीं और उन्हें 17,805 वोट मिले, वहीं बसपा के मोहम्मद जकी 7,941 मतों के साथ पांचवें नंबर पर रहे थे। इस तरह पहली बार सपा का परचम पीलीभीत में लहराया।\n\nवर्ष 2007 के चुनाव में रियाज अहमद और बी.के. गुप्ता के बीच फिर आमने-सामने की जंग हुई। यह मुकाबला बेहद रोमांचक और कांटे की टक्कर वाला साबित हुआ। रियाज अहमद ने 50,947 मत हासिल कर अपनी सीट बचा ली, जबकि बी.के. गुप्ता 46,912 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। सपा ने यह मुकाबला महज 4,035 मतों के अंतर से जीता, जो कि 1991 से 2022 के बीच इस सीट पर जीत-हार का सबसे संकीर्ण अंतर रहा है। उस वक्त पूरे उत्तर प्रदेश में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली आंधी चल रही थी, लेकिन पीलीभीत में बसपा प्रत्याशी हेमराज वर्मा 24,444 वोट पाकर तीसरे स्थान पर ही टिक सके।\n\nसाल 2012 के चुनाव में जब प्रदेश में सपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई, तब पीलीभीत में भी रियाज अहमद ने अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा। उन्होंने बसपा के संजय सिंह गंगवार को 4,235 मतों के करीबी अंतर से पराजित किया। रियाज अहमद को 61,578 वोट हासिल हुए, जबकि संजय सिंह गंगवार 57,343 वोट पाने में सफल रहे थे। भाजपा प्रत्याशी सत्यपाल 47,771 वोट पाकर तीसरे स्थान पर खिसक गए, वहीं पूर्व विधायक बी.के. गुप्ता निर्दलीय मैदान में उतरकर 12,422 मतों के साथ पांचवें स्थान पर रहे। इस जीत के साथ रियाज अहमद ने पीलीभीत में लगातार तीन जीत दर्ज करने का रिकॉर्ड बनाया।\n\nसंजय सिंह गंगवार का भाजपा में आगमन और 2017 का रिकॉर्ड\nवर्ष 2017 के चुनाव में भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। पार्टी ने 2012 में बसपा के टिकट पर कड़ा मुकाबला देने वाले संजय सिंह गंगवार को अपने पाले में लेकर प्रत्याशी बनाया। मोदी लहर के बीच संजय सिंह गंगवार ने इस सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उन्होंने 1,36,486 मत हासिल किए और लगातार तीन बार के विधायक रियाज अहमद को 43,356 वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। रियाज अहमद के खाते में 93,130 वोट ही आ सके। तीन दशकों के चुनावी इतिहास में वोटों के लिहाज से यह अब तक का सबसे बड़ा फासला रहा। इस चुनाव में बसपा प्रत्याशी अरशद खान को केवल 14,532 वोटों से संतोष करना पड़ा था।\n\n2022 का करीबी दंगल और वर्तमान परिदृश्य\nसाल 2022 के चुनाव में भाजपा के सामने अपनी यह सीट बचाने की कठिन चुनौती थी। संजय सिंह गंगवार का सीधा मुकाबला सपा के शैलेंद्र सिंह गंगवार से हुआ। दोनों कुर्मी चेहरों के बीच हुए इस संघर्ष में मुकाबला आखिरी दौर तक खिंचा। अंततः भाजपा के संजय सिंह गंगवार ने 1,25,506 मत पाकर 6,970 वोटों के मामूली अंतर से जीत दर्ज की। सपा के शैलेंद्र सिंह गंगवार ने 1,18,536 वोट जुटाकर बेहद कड़ी टक्कर दी थी। वहीं बसपा के उम्मीदवार शाने अली महज 12,099 वोट ही हासिल कर सके। कांग्रेस के प्रत्याशी शकील अहमद की स्थिति इतनी कमजोर रही कि उन्हें नोटा से भी कम वोट मिले। नोटा के पक्ष में 1,188 वोट पड़े थे, जबकि शकील अहमद 1,042 वोटों पर ही सिमट गए।\n\n2027 के चुनाव में तय होंगे नए समीकरण\nसाल 1991 से लेकर 2022 तक के पूरे चुनावी चक्र को परखें तो पीलीभीत सीट पर मुख्य रूप से दो प्रमुख राजनीतिक घरानों और दलों का दबदबा रहा है। इस पूरी अवधि में कांग्रेस और बसपा कभी भी पहले दो स्थानों से आगे निकलकर सीट जीतने में कामयाब नहीं हो सकीं। भाजपा ने 1991, 1993, 1996 और 2000 में लगातार चार बार जीत दर्ज की थी, जिसके बाद 2002 से 2012 तक सपा के रियाज अहमद ने लगातार तीन चुनाव जीते। अब 2017 और 2022 में संजय सिंह गंगवार की लगातार दो जीतों के बाद भाजपा के पास अपनी दूसरी हैट्रिक लगाने का मौका है।\n\nआगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर मुकाबला बेहद कड़ा होने के आसार हैं। एक तरफ भाजपा अपने पारंपरिक जनाधार, संगठनात्मक ढांचे और कुर्मी-ओबीसी मतदाताओं के सहारे सीट बरकरार रखने का प्रयास करेगी। दूसरी तरफ सपा पिछले चुनाव की मामूली हार के अंतर को पाटकर मुस्लिम, यादव और कुर्मी मतदाताओं के नए गठजोड़ के साथ मैदान में उतरने की रणनीति बना रही है। अगर सपा और कांग्रेस का तालमेल बना रहता है, तो वोटों का बिखराव रोकने में विपक्ष को मदद मिल सकती है। ऐसे में उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव, जातीय संतुलन और पोलिंग बूथ स्तर की तैयारी ही तय करेगी कि पीलीभीत में भाजपा का विजय क्रम जारी रहेगा या सपा फिर से वापसी करेगी।\n\nइसका आप पर असर\nयह चुनावी विश्लेषण मतदाताओं को स्थानीय विकास और राजनीतिक प्राथमिकताओं को समझने का सीधा आधार प्रदान करता है।\n\n• उत्तर प्रदेश में: पूरे राज्य के मतदाताओं के लिए यह सीट यह दर्शाती है कि आगामी 2027 के चुनाव में रुहेलखंड क्षेत्र में मुख्य मुकाबला किन मुद्दों और सामाजिक समूहों के बीच केंद्रित रहेगा। इससे राज्य स्तर पर राजनीतिक दलों की भावी रणनीतियों और गठबंधनों का आकलन करने में मदद मिलती है।\n• पीलीभीत में: स्थानीय नागरिकों के लिए दोनों प्रमुख दलों की दावेदारी से सड़कों, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार और बुनियादी ढांचे से जुड़े स्थानीय मुद्दों पर राजनीतिक दबाव बना रहेगा। मतदाता पिछले पांच वर्षों के कार्यों और जनप्रतिनिधियों के प्रदर्शन की तुलना करके अपने मताधिकार का प्रभावी उपयोग कर सकेंगे।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपीलीभीत विधानसभा सीट पर भाजपा और सपा के बीच का यह मुकाबला पिछले तीन दशकों के सामाजिक और वैचारिक ध्रुवीकरण का सीधा परिणाम है।\n\n• सामाजिक समीकरण: क्षेत्र में मुस्लिम और कुर्मी मतदाताओं के साथ-साथ अन्य पिछड़े वर्गों और दलितों की भारी आबादी ने चुनावी नतीजों को हमेशा दो ध्रुवों के बीच केंद्रित रखा है। इन सामाजिक समूहों की संगठित गोलबंदी ही तय करती है कि पलड़ा किस तरफ झुकेगा।\n• पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता: 1991 के बाद से भाजपा के बी.के. गुप्ता और सपा के रियाज अहमद के बीच लंबे समय तक रहे व्यक्तिगत टकराव ने दोनों दलों का सांगठनिक ढांचा बूथ स्तर तक मजबूत कर दिया। इसके चलते तीसरे दल जैसे बसपा और कांग्रेस कभी भी मुख्य मुकाबले में अपनी स्थायी जगह नहीं बना पाए।\n• 2022 का करीबी नतीजा: पिछले चुनाव में भाजपा और सपा के बीच जीत का अंतर घटकर केवल 6,970 वोटों का रह गया था। इस नजदीकी मुकाबले ने ही 2027 के आगामी दंगल को दोनों पक्षों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पीलीभीत विधानसभा सीट पर 1991 से 2022 तक भाजपा और सपा का क्या रिकॉर्ड रहा है?\nइस दौरान हुए आठ आम चुनावों और एक उपचुनाव में भाजपा ने छह बार जीत हासिल की है, जबकि समाजवादी पार्टी ने तीन बार जीत दर्ज की है।\n\n2. 2022 के विधानसभा चुनाव में पीलीभीत सीट पर जीत का अंतर कितना था?\n2022 में भाजपा के संजय सिंह गंगवार ने सपा के शैलेंद्र सिंह गंगवार को 6,970 मतों के अंतर से हराया था।\n\n3. पीलीभीत सीट पर पिछले तीन दशकों में सबसे बड़ी जीत किस चुनाव में दर्ज की गई?\nसाल 2017 में भाजपा के संजय सिंह गंगवार ने सपा के रियाज अहमद को 43,356 वोटों के रिकॉर्ड अंतर से हराया था।\n\n4. पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र में कौन से सामाजिक वर्ग चुनावी रूप से निर्णायक हैं?\nइस क्षेत्र में मुस्लिम, कुर्मी, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जाति (एससी) के मतदाता निर्णायक संख्या में हैं।",
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  "publishedAt": "2026-10-06",
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