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  "title": "उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027: बृजभूषण शरण सिंह के बगावती तेवर और अखिलेश यादव की तारीफ से बीजेपी की 18 सीटों पर सियासी संकट",
  "summary": "पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पक्ष में दिए बयान के बाद अवध और देवीपाटन मंडल की सीटों पर बीजेपी का चुनावी गणित डगमगाता नजर आ रहा है.",
  "content": "उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी बिसात अभी से बिछाई जाने लगी है. प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक खामोशी अख्तियार किए रहने वाले कई कद्दावर चेहरे अब खुलकर अपनी ताकत और तेवरों का इजहार कर रहे हैं. पूर्वांचल और अवध के सीमावर्ती इलाकों में खासा प्रभाव रखने वाले देवीपाटन मंडल के दिग्गज राजपूत नेता बृजभूषण शरण सिंह इस सियासी हलचल के मुख्य केंद्र में आ गए हैं. विभिन्न राजनीतिक दलों में लंबा वक्त गुजारने के बाद पिछले कुछ वर्षों से वे बीजेपी के साथ जुड़े रहे हैं. भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह अपने आक्रामक अंदाज, शक्ति प्रदर्शन और बेबाक बयानों से एक बार फिर सियासी गलियारों में भारी चर्चा बटोर रहे हैं. मंगलवार, 29 सितंबर को अखिलेश यादव की तारीफ करते हुए उनके द्वारा दिया गया बयान ‘बिन अखिलेश सब सूना’ पूरे राजनीतिक परिदृश्य में कौतूहल पैदा कर चुका है. ऐसे में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जिस नेता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन करके पार्टी में शामिल कराया था और गृह मंत्री अमित शाह ने स्वयं बुलाकर टिकट थमाया था, आखिर उस नेता का पार्टी के कुछ प्रमुख पदाधिकारियों से मोहभंग क्यों होने लगा है.\n\nकोर्ट से राहत और विरोधियों के प्रति बदलता रुख\nहाल के दिनों में महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के चर्चित मामले में अदालत से राहत मिलने के बाद बृजभूषण शरण सिंह के समर्थकों में नया उत्साह देखा जा रहा है. देवीपाटन मंडल समेत उनके प्रभाव वाले समूचे इलाके में उनके कार्यकर्ता जबरदस्त जश्न और सक्रियता के मूड में हैं. इसके साथ ही योग गुरु बाबा रामदेव तथा पतंजलि के उत्पादों पर उनके बेहद तीखे सार्वजनिक हमले और दूसरी तरफ विपक्षी नेताओं के प्रति उनकी अप्रत्याशित नरमी राजनीतिक जानकारों के कान खड़े कर रही है. विश्लेषक यह आकलन कर रहे हैं कि क्या यह बाहुबली नेता 2027 के महासमर से ठीक पहले कोई नया समीकरण तैयार कर रहा है. उत्तर प्रदेश की सियासत में बृजभूषण शरण सिंह उन चुनिंदा क्षेत्रीय क्षत्रपों में गिने जाते हैं जिनका दबदबा केवल अपनी लोकसभा सीट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे पूरे प्रशासनिक मंडल और उसके आसपास के जिलों में चुनाव की दिशा बदलने की कुव्वत रखते हैं. पूर्वांचल और अवध के मिलन बिंदु पर मौजूद देवीपाटन मंडल दशकों से उनका अभेद्य सियासी किला माना जाता है.\n\nगोंडा से लेकर तराई पट्टी तक फैला राजनीतिक साम्राज्य\nबृजभूषण शरण सिंह का गृह जनपद गोंडा उनके समूचे राजनीतिक तंत्र की धुरी रहा है. जिले की गोंडा सदर, कर्नलगंज, कटरा बाजार और तरबगंज जैसी प्रमुख विधानसभा सीटों पर उनका सीधा दखल और प्रभाव किसी से छिपा नहीं है. वे स्वयं कैसरगंज लोकसभा सीट से सांसद रहे हैं और वर्तमान में उनके बेटे करण भूषण सिंह इसी संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. पड़ोसी जिले बहराइच की बात करें तो महसी, पयागपुर और कैसरगंज विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय ठाकुर मतदाताओं और आम जनमानस के बीच उनकी पकड़ अत्यंत मजबूत है. इसके अलावा बलरामपुर वह जिला है जहां से उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन की नींव रखी थी. बलरामपुर के तुलसीपुर, गैसड़ी तथा श्रावस्ती की भिनगा विधानसभा सीट पर उनके निष्ठावान कार्यकर्ताओं का बहुत बड़ा संजाल सक्रिय है. राम मंदिर आंदोलन में शुरुआती दौर से सक्रिय भागीदारी के चलते अयोध्या, बस्ती, संत कबीर नगर और सिद्धार्थनगर के कई इलाकों में भी उनका सीधा सामाजिक प्रभाव है. इन जिलों में उनके द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक गतिविधियों ने उन्हें जमीनी स्तर पर एक मजबूत जनाधार दिया है.\n\nबीजेपी के चुनावी गणित और 12 से 18 सीटों पर असर\nविधानसभा सीटों के अंकगणित के मुताबिक देवीपाटन मंडल के चार जिलों गोंडा, बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती को मिलाकर कुल 16 विधानसभा सीटें आती हैं. इसके अलावा पड़ोस के अयोध्या और बस्ती मंडल की लगभग 8 से 10 ऐसी सीटें हैं जहां ठाकुर बिरादरी के मतदाता किसी भी प्रत्याशी की जीत अथवा हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. यदि बृजभूषण शरण सिंह 2027 के चुनाव से पहले बीजेपी से पूरी तरह अलग राह चुनते हैं या फिर पर्दे के पीछे रहकर पार्टी के उम्मीदवारों का विरोध करते हैं, तो बीजेपी को सीधे तौर पर 12 से 18 विधानसभा सीटों पर बेहद कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है. अवध और तराई पट्टी के इलाके में राजपूत समाज के साथ-साथ बृजभूषण का अपना एक वफादार समर्थक वर्ग है. यह व्यक्तिगत वोट बैंक जिस भी तरफ झुकेगा, वहां चुनावी नतीजों का अंतर तय होना बिल्कुल स्वाभाविक माना जा रहा है.\n\nमुलायम सिंह यादव के साथ साझा अखाड़ा और ऐतिहासिक रिश्ते\nसमाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ बृजभूषण शरण सिंह का नाता कभी भी पारंपरिक राजनीतिक कटुता के दायरे में नहीं बंधा रहा, बल्कि यह व्यक्तिगत आत्मीयता पर टिका रहा है. समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बृजभूषण शरण सिंह दोनों की ही पृष्ठभूमि पहलवानी और कुश्ती से जुड़ी रही. दोनों नेता अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और दलों में रहे, फिर भी दोनों के बीच हमेशा एक अनकहा आपसी आदर भाव मौजूद रहा. वर्ष 2008 का वह दौर बेहद अहम था जब भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर केंद्र की तत्कालीन सरकार संकट में घिर गई थी. उस वक्त बीजेपी ने अपने सभी सांसदों को सरकार के खिलाफ मतदान करने का व्हिप जारी किया था, लेकिन बृजभूषण सिंह ने मुलायम सिंह यादव के एक आह्वान पर सपा के रुख का समर्थन किया था. इस घटनाक्रम के बाद वे समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर कैसरगंज से लोकसभा सदस्य भी चुने गए थे. मुलायम सिंह यादव अक्सर सार्वजनिक मंचों से बृजभूषण की दबंग कार्यशैली और खेल के प्रति उनके समर्पण की खुलकर सराहना करते रहे थे.\n\nअखिलेश यादव के साथ मधुर समीकरण और बचपन की पहचान\nमुलायम सिंह यादव के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ भी बृजभूषण शरण सिंह की केमिस्ट्री कभी तल्ख नहीं हुई. जब महिला पहलवानों के धरने और आंदोलन के दौरान बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व बैकफुट पर दिखाई दे रहा था और पार्टी के कई बड़े नेता चुप्पी साधे हुए थे, उस नाजुक समय में भी अखिलेश यादव ने बृजभूषण पर कोई व्यक्तिगत हमला या अमर्यादित टिप्पणी नहीं की थी. अखिलेश यादव ने लगातार यही कहा था कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष कानूनी जांच होनी चाहिए. इसके प्रत्युत्तर में बृजभूषण शरण सिंह ने भी कई मौकों पर अखिलेश यादव के प्रशासनिक कौशल और मुख्यमंत्री काल के अनुभवों की सार्वजनिक तौर पर तारीफ की. 29 सितंबर को उनके द्वारा दिया गया बयान ‘अखिलेश के बिना सब सूना है’ इन्हीं पुराने रिश्तों की गर्माहट को उजागर करता है. बृजभूषण स्वयं इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि वे अखिलेश को उनके बचपन के दिनों से जानते हैं. वे कई मर्तबा अपने पहलवानों को लेकर सैफई के दंगल में शामिल होने गए थे, जहां अखिलेश और मुलायम सिंह दोनों उनके कुश्ती आयोजनों में शिरकत करते थे. राजनीतिक विरोध के बावजूद दोनों नेताओं के बीच एक पुराना पारिवारिक और व्यक्तिगत आदर बना हुआ है.\n\nसोशल मीडिया पर अनप्रिडिक्टेबल तेवर और आक्रामक राजनीति\nसोशल मीडिया पर बृजभूषण शरण सिंह से जुड़ा हर छोटा-बड़ा घटनाक्रम लगातार ट्रेंड करता रहता है. इसके पीछे उनका अप्रत्याशित और आक्रामक सियासी व्यवहार मुख्य वजह है. चाहे वह बाबा रामदेव के पतंजलि उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए तीखा जुबानी हमला बोलना हो, या फिर अपनी ही पार्टी के कुछ शीर्ष फैसलों और स्थानीय नेताओं पर तंज कसना हो, बृजभूषण हमेशा आक्रामक मुद्रा में दिखाई देते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक के राजनीतिक पंडित अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि देवीपाटन का यह बाहुबली नेता 2027 के चुनाव में बीजेपी के साथ रहकर सौदेबाजी करेगा या फिर समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर पूरे अवध मंडल का सियासी नक्शा बदलने का फैसला करेगा.\n\nइसका आप पर असर\nबृजभूषण शरण सिंह के संभावित सियासी पाला बदलने से अवध और देवीपाटन मंडल के राजनीतिक समीकरणों और आगामी विधानसभा चुनावों पर सीधा असर पड़ सकता है.\n\n• उत्तर प्रदेश की राजनीति में: राज्य में सत्ताधारी दल बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल सपा के बीच 2027 के चुनाव से पहले जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों की जंग तेज होगी. इसके कारण देवीपाटन और अवध मंडल की 12 से 18 सीटों पर प्रत्याशियों के चयन और रणनीतियों में भारी फेरबदल देखने को मिलेगा.\n• देवीपाटन और अवध क्षेत्र में: गोंडा, बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती के स्थानीय राजपूत और क्षेत्रीय मतदाताओं का ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है. स्थानीय नागरिक और पार्टी कार्यकर्ता आने वाले महीनों में नए राजनीतिक गठबंधनों के अनुसार जमीनी समीकरण बदलते देखेंगे.\n• स्थानीय मतदाताओं के लिए: क्षेत्र के विकास कार्यों और टिकट बंटवारे पर इस राजनीतिक खींचतान का गहरा असर पड़ेगा. मतदाता किसी पार्टी विशेष के बजाय व्यक्तिगत प्रभाव और ठाकुर बाहुल्य समीकरणों को तरजीह देने की स्थिति में आ सकते हैं.\n• विपक्षी दलों के लिए: समाजवादी पार्टी को पूर्वांचल और अवध के मजबूत क्षत्रप का समर्थन मिलने से गैर-यादव वोटों में सेंध लगाने का बड़ा मौका मिल सकता है. इससे सपा को इस क्षेत्र की उन सीटों पर बढ़त बनाने में मदद मिलेगी जहां बीजेपी लंबे समय से मजबूत रही है.\n\nऐसा क्यों हुआ\nबृजभूषण शरण सिंह की हालिया बयानबाजी और पार्टी से नाराजगी के पीछे व्यक्तिगत उपेक्षा, कानूनी राहत के बाद बढ़ा आत्मविश्वास और समाजवादी पार्टी नेतृत्व के साथ उनकी पुरानी नजदीकी मुख्य वजहें हैं.\n\n• अदालती राहत के बाद आत्मविश्वास: महिला पहलवानों से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में अदालत से हाल ही में मिली राहत ने बृजभूषण और उनके समर्थकों में नया उत्साह भरा है. इस कानूनी राहत के बाद उन्होंने पार्टी आलाकमान पर दबाव बनाने और अपनी राजनीतिक ताकत को फिर से साबित करने के लिए आक्रामक रुख अख्तियार किया है.\n• बीजेपी में कथित उपेक्षा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा पार्टी में लाने के बावजूद बृजभूषण संगठन के कुछ आंतरिक नेताओं के रवैये से असहज महसूस कर रहे हैं. यही असंतोष अब सार्वजनिक मंचों पर पार्टी नेताओं और बाबा रामदेव जैसे समर्थकों पर तीखे बयानों के रूप में सामने आ रहा है.\n• सपा नेतृत्व से पुराना पारिवारिक नाता: कुश्ती और अखाड़ा संस्कृति की पृष्ठभूमि के चलते मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के साथ उनके संबंध हमेशा सौहार्दपूर्ण रहे हैं. महिला पहलवानों के आंदोलन के दौरान भी अखिलेश यादव द्वारा संयमित रुख अपनाना और कोई व्यक्तिगत हमला न करना इस रिश्ते को और मजबूती दे गया.\n• 2027 विधानसभा चुनाव की बिसात: उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनाव से पहले देवीपाटन मंडल की 16 सीटों पर अपना सियासी वर्चस्व और मोलभाव की क्षमता बनाए रखना उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. इस समय दिए जा रहे बयानों के जरिए वे अपनी ताकत का अहसास दोनों प्रमुख दलों को करा रहे हैं.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बृजभूषण शरण सिंह ने अखिलेश यादव को लेकर क्या बयान दिया है?\nबृजभूषण शरण सिंह ने 29 सितंबर को एक बयान में ‘बिन अखिलेश सब सूना’ कहकर सपा प्रमुख के साथ अपनी पुरानी आत्मीयता को उजागर किया.\n\n2. बृजभूषण शरण सिंह का सियासी गढ़ किन क्षेत्रों में माना जाता है?\nउनका मुख्य प्रभाव देवीपाटन मंडल के गोंडा, बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती जिलों के अलावा अयोध्या और बस्ती के कई इलाकों में फैला है.\n\n3. अगर बृजभूषण बीजेपी छोड़ते हैं तो पार्टी को कितनी सीटों पर नुकसान हो सकता है?\nराजनीतिक गणित के अनुसार बीजेपी को देवीपाटन, अवध और बस्ती मंडल की 12 से 18 विधानसभा सीटों पर कड़े चुनावी मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है.\n\n4. मुलायम सिंह यादव और बृजभूषण शरण सिंह के बीच क्या समानता थी?\nदोनों नेताओं की पृष्ठभूमि कुश्ती और पहलवानी से जुड़ी थी, और 2008 के परमाणु करार संकट के समय बृजभूषण ने मुलायम सिंह के कहने पर सपा का साथ दिया था.\n\n5. वर्तमान में कैसरगंज लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है?\nकैसरगंज लोकसभा सीट से बृजभूषण शरण सिंह के पुत्र करण भूषण सिंह वर्तमान में सांसद हैं.\n\n6. गोंडा जिले की किन विधानसभा सीटों पर बृजभूषण का सीधा दखल है?\nगोंडा जिले की सदर, कर्नलगंज, कटरा बाजार और तरबगंज जैसी प्रमुख सीटों पर उनका सीधा राजनीतिक दखल माना जाता है.",
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