आध्यात्मिक नगरी से एडवेंचर हब बनता ऋषिकेश, योग और राफ्टिंग के बीच शहर की पहचान पर स्थानीय लोग बंटे ऋषिकेश में धार्मिक पर्यटन के मुकाबले एडवेंचर टूरिज्म तेजी से बढ़ा है, जिससे शहर के पुराने स्वरूप और नई पहचान को लेकर स्थानीय नागरिकों के विचार सामने आ रहे हैं। उत्तराखंड की पावन नगरी ऋषिकेश सदियों से गंगा के पावन तट, गहन साधना और योग की वैश्विक राजधानी के रूप में विख्यात रही है। दुनिया भर के कोने-कोने से लोग यहां मानसिक शांति, तपस्या और गंगा के दर्शन करने की चाह में आते रहे हैं। समय के पहिए के साथ इस तीर्थ नगरी का स्वरूप बहुत तेजी से बदला है। नदी किनारे शुरू हुई रिवर राफ्टिंग, पहाड़ी ढलानों पर कैंपिंग, आधुनिक कैफे, बहुमंजिला होटल और साहसिक खेलों ने इस शांत आध्यात्मिक केंद्र को एक विशाल और हलचल भरे टूरिस्ट डेस्टिनेशन में तब्दील कर दिया है। इस बदलाव के बीच अब यह विचारणीय सवाल खड़ा हो गया है कि वर्तमान समय में ऋषिकेश का वास्तविक परिचय क्या है, इसे योग नगरी कहा जाए, एक धार्मिक तीर्थ स्थल माना जाए या फिर सिर्फ एडवेंचर पसंद युवाओं का अड्डा समझा जाए। साधना की शांत नगरी से कमर्शियल टूरिज्म की ओर बदलाव शहर में बीते करीब 59 सालों से निवास कर रहीं श्रीमती चंदना साधु ने इस परिवर्तन को बहुत नजदीक से घटित होते देखा है। वह बताती हैं कि जब वह मात्र दो वर्ष की थीं, तब अपने परिवार के साथ कोलकाता से ऋषिकेश आई थीं। उस पुराने दौर का वातावरण आज के माहौल की तुलना में पूरी तरह जुदा था। उस वक्त ऋषिकेश की गलियों और घाटों पर केवल श्रद्धा, भक्ति और निश्छल साधना की भावना प्रमुखता से दिखाई देती थी। चंदना के अनुसार, पहले के समय में जो भी यात्री ऋषिकेश का रुख करते थे, उनके मन में धार्मिक निष्ठा और ईश्वर दर्शन ही मुख्य ध्येय होता था। आज के हालात इसके ठीक विपरीत हो चुके हैं। वर्तमान में आने वाले आगंतुकों में करीब 90 प्रतिशत लोग केवल सैर-सपाटे और मौज-मस्ती के इरादे से आने वाले सामान्य टूरिस्ट हैं, जबकि विशुद्ध भक्ति और साधना के भाव से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या सिमट कर बहुत कम रह गई है। उनका कहना है कि गंगा के किनारे बढ़ता व्यावसायिक कारोबार और अनियंत्रित पर्यटन शहर के मूल स्वरूप को निगल चुका है, जिससे इसकी ऐतिहासिक आध्यात्मिक पहचान लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। योग और आधुनिकता के सह-अस्तित्व पर दूसरा नजरिया वहीं दूसरी तरफ, ऋषिकेश में पिछले 40 वर्षों से रह रहे जनलाल स्लाउका का दृष्टिकोण थोड़ा अलग है। उनका मानना है कि शहर की प्राचीन गरिमा और पहचान अभी पूरी तरह मिटी नहीं है। उनके अनुसार, विश्व पटल पर ऋषिकेश की प्रतिष्ठा आज भी योग सिटी के रूप में कायम है। शहर के पारंपरिक आश्रमों में आज भी नियमित रूप से योग साधनाएं चल रही हैं, और यहां तक कि नए होटलों तथा कैंपों में भी योग से संबंधित कार्यक्रमों और गतिविधियों को शामिल किया जा रहा है। इसके साथ ही जनलाल स्लाउका इस हकीकत को भी स्वीकार करते हैं कि नगर में दस्तक देने वाली नई पीढ़ी की तादाद में भारी उछाल आया है। अतीत में जहां लोग धर्म और आत्मिक शांति के उद्देश्य से सफर तय करते थे, वहीं अब नौजवानों की बड़ी टोली केवल छुट्टियों का आनंद लेने और घूमने-फिरने के लिए यहां पहुंच रही है। गंगा की लहरों पर होने वाली राफ्टिंग और अन्य साहसिक खेलों के रोमांच ने देश भर के युवाओं को बड़े पैमाने पर ऋषिकेश की तरफ आकर्षित किया है। इसका आप पर असर ऋषिकेश में धार्मिक पर्यटन से एडवेंचर टूरिज्म की ओर हुआ यह बदलाव स्थानीय अर्थव्यवस्था, जीवनशैली और आने वाले यात्रियों के अनुभव को सीधे प्रभावित करता है। • भारत में: देश भर के सैलानियों और आध्यात्मिक साधकों के लिए ऋषिकेश अब एक बहुउद्देशीय स्थल बन गया है, जहां शांति के साथ-साथ रोमांचक गतिविधियां भी उपलब्ध हैं। आने वाले दिनों में यात्रा की योजना बनाते समय पर्यटकों को आध्यात्मिक साधना या साहसिक खेलों के अनुसार अपने ठहरने के क्षेत्र का चयन करना होगा। • उत्तराखंड में: स्थानीय स्तर पर होटल, कैंपिंग, राफ्टिंग और कैफे कारोबार से युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के व्यापक अवसर खुले हैं। इसके साथ ही गंगा तट पर व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने से पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक आश्रम संस्कृति को बचाए रखने की नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। ऐसा क्यों हुआ ऋषिकेश के स्वरूप में यह व्यापक बदलाव युवाओं की बदलती प्राथमिकताओं, साहसिक खेलों की बढ़ती मांग और गंगा तट पर पर्यटन के तेजी से हुए व्यवसायीकरण के कारण सामने आया है। • एडवेंचर स्पोर्ट्स की लोकप्रियता: गंगा नदी में रिवर राफ्टिंग और तटों पर कैंपिंग की अनुमति मिलने से यह क्षेत्र देश भर के युवाओं के लिए वीकेंड गेटवे और रोमांच का केंद्र बन गया। इसने पारंपरिक धार्मिक तीर्थाटन के मुकाबले मौज-मस्ती वाले पर्यटन को कई गुना तेज गति से बढ़ावा दिया। • पर्यटकों की बदलती जनसांख्यिकी: जहां पूर्व में वृद्धजन, साधु-संत और आध्यात्मिक साधक प्रमुखता से आते थे, वहीं अब 90 प्रतिशत आगंतुक आधुनिक युवा टूरिस्ट हैं जो रोमांच और सैर-सपाटे की तलाश में पहुंचते हैं। इस मांग के अनुरूप बाजार ने आश्रमों के बजाय होटल, कैफे और रिसॉर्ट्स को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। • योग और व्यवसाय का तालमेल: शहर ने योग को पूरी तरह छोड़ा नहीं, बल्कि इसे व्यावसायिक हॉस्पिटैलिटी का हिस्सा बना दिया, जिससे आश्रमों के साथ-साथ निजी रिसॉर्ट्स में भी योग सत्र आयोजित होने लगे। इसके चलते शहर की पुरानी धार्मिक पहचान और नए व्यावसायिक एडवेंचर हब के बीच एक मिश्रित संस्कृति उभर कर सामने आई। सवाल-जवाब 1. ऋषिकेश में स्थानीय निवासियों के अनुसार पर्यटकों के अनुपात में क्या बदलाव आया है? स्थानीय निवासी चंदना साधु के अनुसार, आज आने वाले लोगों में करीब 90 प्रतिशत केवल सामान्य टूरिस्ट होते हैं, जबकि धार्मिक निष्ठा से आने वालों की संख्या काफी कम रह गई है। 2. चंदना साधु कितने समय से ऋषिकेश में रह रही हैं? चंदना साधु करीब 59 वर्षों से ऋषिकेश में रह रही हैं और वह दो वर्ष की उम्र में कोलकाता से यहां आई थीं। 3. क्या ऋषिकेश की पुरानी योग पहचान पूरी तरह खत्म हो चुकी है? लगभग 40 साल से रह रहे जनलाल स्लाउका का मानना है कि शहर की पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और आश्रमों तथा कैंपों में योग आज भी सक्रिय रूप से संचालित होता है। 4. युवाओं को ऋषिकेश की ओर मुख्य रूप से कौन सी गतिविधियां आकर्षित कर रही हैं? गंगा नदी में रिवर राफ्टिंग, कैंपिंग और विभिन्न एडवेंचर एक्टिविटीज बड़ी संख्या में युवा पीढ़ी को आकर्षित कर रही हैं। https://trendkia.com/uttarakhand/adhyatmika-nagari-se-edavenchara-haba-banata-rishikesh-yoga-aura-rafting-ke-bicha-shahara-ki-pahachana-para-sthaniya-loga-bnte-44542 TrendKia — Har trend, sabse pehle.