आजादी के दौर की पाक कला और खास स्वाद, दून के इस पारंपरिक आटा बिस्किट के मुरीद हैं दिग्गज देहरादून के पलटन बाजार स्थित ऐतिहासिक सनराइज बेकर्स के आटा बिस्किट और रस्क आज भी दशकों पुराने स्वाद को सहेजे हुए हैं। विभाजन के समय सीमा पार से आई इस पारंपरिक रेसिपी के मुरीद आम नागरिकों के साथ महेंद्र सिंह धोनी भी हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की आबोहवा जितनी सुकून देने वाली है, उतनी ही समृद्ध यहां की खानपान संस्कृति भी रही है। शहर के प्रसिद्ध पलटन बाजार की घोसी गली में स्थित सनराइज बेकरी आज भी स्वतंत्रता संग्राम के दौर की बेकिंग विरासत को संजोए हुए है। सन 1947 से चली आ रही इस प्रतिष्ठित दुकान के तैयार किए गए बेकरी उत्पाद न सिर्फ स्थानीय बाशिंदों के पसंदीदा हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार कर सुदूर देशों तक अपनी महक बिखेर रहे हैं। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में अंग्रेज अफसर भी इस खास जायके के कायल हुआ करते थे, और बदलते समय के बावजूद इस पारंपरिक स्वाद की पहचान वैसी ही बनी हुई है। विभाजन की दास्तान और सीमा पार से आया बेकिंग हुनर इस बेकरी की नींव के पीछे विभाजन की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। दुकान के वर्तमान संचालक जगजीत सिंह के अनुसार, उनके पिता विभाजन के बाद पाकिस्तान से पलायन कर देहरादून में आ बसे थे। उन्होंने पाकिस्तान में ही बिस्कुट, रस्क और पारंपरिक खताई तैयार करने का काम सीखा था। जब वे विस्थापित होकर भारत आए, तो अपने साथ वही समृद्ध पाक कला, पारंपरिक हुनर और खास रेसिपी लेकर पहुंचे। इस कौशल को उन्होंने देहरादून में बेकिंग के रूप में स्थापित किया, जो धीरे-धीरे इस पहाड़ी शहर की विशिष्ट पहचान बन गया। 8 आने की बनवाई से 150 रुपये के पैकेट तक का सफर दुकान की शुरुआती कार्यप्रणाली की यादें साझा करते हुए जगजीत सिंह बताते हैं कि शुरुआती दौर में कामकाज का तरीका आज से बिल्कुल अलग था। उस जमाने में ग्राहक अपने घरों से खुद मैदा, चीनी और दूध जैसी जरूरी सामग्रियां लेकर दुकान पर पहुंचते थे। बेकरी में केवल उनकी बनवाई का मामूली शुल्क लिया जाता था और तैयार बिस्किट व रस्क कागज के साधारण लिफाफों में दिए जाते थे, जिसकी लागत उस वक्त मात्र 8 आने हुआ करती थी। दशकों के लंबे सफर के बाद आज रस्क के एक पैकेट का मूल्य 150 रुपये हो चुका है, परंतु गुणवत्ता, सादगी और शुद्धता के मानकों से कोई समझौता नहीं किया गया है। सात समंदर पार मांग और नामचीन हस्तियों की पहली पसंद सनराइज बेकर्स के आटा बिस्किट और रस्क की सादगी, कुरकुरापन और देसी स्वाद का दायरा अब केवल भारत तक सीमित नहीं है। यहां तैयार होने वाले उत्पाद नियमित रूप से अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और जापान जैसे देशों में रहने वाले ग्राहकों तक भिजवाए जाते हैं। आम जनता और प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ यह स्थान मशहूर हस्तियों की भी पसंदीदा सूची में शामिल है। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उनकी पत्नी साक्षी धोनी जब भी देहरादून के दौरे पर होते हैं, तो वे यहां के मशहूर आटा बिस्किट और रस्क अपने साथ ले जाना कभी नहीं भूलते। आधुनिक मशीनीकरण के दौर में भी पारंपरिक भट्टी और पुरानी रेसिपी के प्रति समर्पण ही इस स्वाद को अमर बनाए हुए है। इसका आप पर असर यह समाचार पारंपरिक भारतीय खानपान की सांस्कृतिक विरासत और दशकों पुरानी विश्वसनीय खाद्य गुणवत्ता के महत्व को रेखांकित करता है। • भारत में: देशभर के खाद्य प्रेमी और पर्यटक जब भी उत्तराखंड भ्रमण पर जाएं, तो वे आधुनिक पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के स्थान पर इस पारंपरिक बेकिंग स्वाद का अनुभव ले सकते हैं। बिना रासायनिक मिलावट के पारंपरिक तरीके से बने यह बेकरी उत्पाद प्रामाणिक स्वाद की तलाश करने वालों के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प हैं। • देहरादून में: स्थानीय निवासियों और दून आने वाले आगंतुकों के लिए पलटन बाजार की घोसी गली में स्थित यह दुकान किफायती दरों पर एक समृद्ध विरासत का हिस्सा बनने का अवसर देती है। उपभोक्ता 150 रुपये में ताजे रस्क का पैकेट खरीदकर पुरानी पाक कला का लुत्फ उठा सकते हैं। • वैश्विक प्रवासियों के लिए: विदेशों में रहने वाले भारतीय अपने पैतृक स्वाद से जुड़े रहने के लिए इन उत्पादों को पार्सल के जरिए मंगवा सकते हैं। यह सेवा संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और जापान में रहने वाले लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखती है। • पारंपरिक व्यवसायों के लिए: यह सफलता दर्शाती है कि औद्योगिकीकरण के युग में भी अगर गुणवत्ता और मूल रेसिपी को बनाए रखा जाए, तो एक छोटी दुकान भी अंतरराष्ट्रीय पहचान पा सकती है। स्थानीय कारीगरों को अपने पारंपरिक हुनर को सहेजने की प्रेरणा मिलती है। ऐसा क्यों हुआ यह बेकरी अपनी निरंतरता और विशिष्ट पहचान के लिए इसलिए जानी जाती है क्योंकि इसकी रेसिपी विभाजन पूर्व की पाक परंपराओं से सीधे जुड़ी हुई है। • विभाजन के दौरान विस्थापन: वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के समय वर्तमान संचालक के पिता पाकिस्तान से विस्थापित होकर देहरादून पहुंचे थे। वे अपने साथ बिस्कुट, रस्क और खताई तैयार करने की वही पारंगत तकनीक लाए, जो उन्होंने वहां सीखी थी। • पारंपरिक पद्धति का संरक्षण: आधुनिक मशीनीकरण और कृत्रिम स्वादों के प्रसार के बावजूद इस दुकान ने बेकिंग की अपनी पुरानी भट्टी और पारंपरिक रेसिपी को बरकरार रखा। इसी प्रामाणिकता ने दशकों से ग्राहकों के भरोसे को अक्षुण्ण बनाए रखा है। • सामुदायिक विश्वास और प्रतिष्ठा: शुरुआती दौर में ग्राहकों द्वारा स्वयं सामग्री लाकर मात्र 8 आने में बेकिंग करवाने की व्यवस्था ने इलाके में एक अटूट सामाजिक विश्वास पैदा किया। यही साख समय के साथ बढ़ते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल गई। सवाल-जवाब 1. सनराइज बेकरी देहरादून में कहां स्थित है? यह ऐतिहासिक बेकरी देहरादून के प्रसिद्ध पलटन बाजार की घोसी गली में स्थित है। 2. इस बेकरी की शुरुआत कब हुई थी? इस बेकरी की स्थापना विभाजन के दौर में वर्ष 1947 में हुई थी। 3. बेकरी के बिस्किट और रस्क की रेसिपी कहां से आई थी? दुकान के संचालक जगजीत सिंह के पिता विभाजन के समय पाकिस्तान से यह पारंपरिक रेसिपी और हुनर देहरादून लेकर आए थे। 4. शुरुआती दौर में यहां बिस्किट और रस्क बनवाने की लागत क्या थी? शुरुआती समय में लोग अपनी सामग्री खुद लाते थे और उनसे लिफाफे में बिस्किट तैयार करने के लिए केवल 8 आने बनवाई ली जाती थी। 5. वर्तमान में यहां रस्क के एक पैकेट की कीमत कितनी है? वर्तमान समय में सनराइज बेकर्स पर रस्क के एक पैकेट की कीमत 150 रुपये है। 6. किन विदेशी देशों में इस बेकरी के उत्पाद भेजे जाते हैं? यहां के बने बिस्किट और रस्क अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और जापान जैसे देशों में भेजे जाते हैं। 7. कौन से प्रसिद्ध क्रिकेट व्यक्तित्व इस बेकरी के उत्पादों के दीवाने हैं? भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उनकी पत्नी साक्षी धोनी जब भी देहरादून आते हैं, तो यहां के बिस्किट और रस्क जरूर ले जाते हैं। प्रेरणा और सबक सनराइज बेकर्स की यात्रा दर्शाती है कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी कला के प्रति निष्ठा एक ऐतिहासिक पहचान बना सकती है। • विपत्ति में हुनर का सहारा: विभाजन के गहरे संकट और विस्थापन के दौरान खाली हाथ आने के बाद भी परिवार ने अपने हुनर और मेहनत के दम पर नई शुरुआत की। कठिन समय में व्यक्तिगत कौशल ही सबसे बड़ी पूंजी साबित होता है। • मूल पहचान पर अडिग रहना: समय के साथ बाजार में अनेक बदलाव आए, लेकिन बेकरी ने अपने पारंपरिक स्वाद और गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया। निरंतर प्रामाणिकता दीर्घकालिक सफलता की सबसे मजबूत कुंजी होती है। • सादगी और ग्राहक निष्ठा: मात्र 8 आने की बनवाई से शुरुआत कर वैश्विक ख्याति हासिल करने का यह सफर सिखाता है कि ईमानदारी और सादगी से किया गया काम हमेशा सराहा जाता है। https://trendkia.com/uttarakhand/ajadi-ke-daura-ki-paka-kala-aura-khasa-svada-dehradun-ke-isa-parnparika-ata-biskita-ke-murida-hain-diggaja-35870 TrendKia — Har trend, sabse pehle.