# उत्तराखंड के बागेश्वर में मौसम के मिजाज के साथ बदलते हैं चरवाहों के ठिकाने, प्रकृति के बीच कटती है जिंदगी

> उत्तराखंड के बागेश्वर में भेड़-बकरी पालने वाले चरवाहे मौसम के बदलाव के साथ अपने ठिकाने बदलते हैं। ऊंचे बुग्यालों और निचली घाटियों के बीच उनकी यह जीवनशैली पीढ़ियों से चली आ रही है।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-17 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/bageshwar-me-mausam-ke-sath-badalte-hain-charvaho-ke-thikane-48633 · **Language:** Hindi
**Tags:** बागेश्वर, उत्तराखंड, चरवाहे, बुग्याल, पशुपालन, पहाड़ी जीवन

उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले चरवाहों का जीवन प्रकृति, मौसम और पशुओं के साथ बेहद गहराई से जुड़ा हुआ रहता है। बागेश्वर क्षेत्र में भेड़ और बकरियों का पालन केवल एक साधारण व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही एक विशिष्ट जीवनशैली और आजीविका का मुख्य आधार है। घने जंगलों, घुमावदार पहाड़ी रास्तों और ऊंचे बुग्यालों के बीच अपना जीवन बिताने वाले ये चरवाहे मौसम के बदलने के साथ ही अपने ठिकाने भी बदल लेते हैं। ऊन, दूध, घी और पशुओं की बिक्री से मिलने वाली आय के जरिए ही वे अपने परिवारों का भरण-पोषण करते हैं।

## गर्मियों में ऊंचे बुग्यालों की ओर पलायन
पहाड़ों में सर्दियों के मौसम के दौरान ऊंचाई वाले इलाकों में भारी बर्फबारी होती है और कड़ाके की ठंड पड़ती है, जिससे पशुओं के लिए चारा जुटाना बहुत कठिन हो जाता है। स्थानीय जानकार रमेश कृषक पांडे बताते हैं कि इसके विपरीत गर्मियों के दिनों में ऊंचे बुग्यालों में प्राकृतिक घास और पानी की उपलब्धता काफी बढ़ जाती है, जिसके बाद चरवाहे अपने पशुओं के साथ इन इलाकों की तरफ निकल जाते हैं। आमतौर पर अप्रैल से लेकर सितंबर महीने के बीच उनका ठिकाना इन्हीं ऊंचाई वाले चरागाहों में होता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में चरवाहे अस्थायी तंबुओं या फिर पत्थरों से बनाई गई छोटी चन्नियों में अपना गुजर-बसर करते हैं। कई बार हालात ऐसे होते हैं कि उन्हें खुले आसमान के नीचे ही अपनी रात गुजारनी पड़ जाती है। उनका पूरा दिन पशुओं को चराने, उनके लिए पानी की उचित व्यवस्था करने और झुंड की सुरक्षा करने में ही बीतता है।

## सर्दियों में निचली घाटियों की ओर वापसी
अक्टूबर से मार्च के बीच जैसे-जैसे मौसम बदलता है और ऊंचाई वाले इलाकों में ठंड बढ़ने लगती है, चरवाहे वापस निचली घाटियों और भाबर की ओर लौटने लगते हैं। इस मौसमी आवागमन का सबसे बड़ा उद्देश्य पशुओं को अनुकूल मौसम, पर्याप्त चारा और पानी उपलब्ध कराना होता है। इस कठिन सफर के दौरान उन्हें अपने साथ खाने-पीने का सामान, जरूरी वस्तुएं और पशुओं की देखभाल से जुड़ी सामग्री भी ले जानी पड़ती है। दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर इस लंबे सफर के दौरान भूस्खलन, बारिश, बर्फबारी और रास्तों की खराब स्थिति जैसी कई बड़ी चुनौतियां सामने आती हैं। ऐसे में चरवाहों को मौसम के मिजाज का अनुमान लगाते हुए पूरी सावधानी के साथ आगे बढ़ना पड़ता है।

## ऊन और पशुपालन से चलती है आजीविका
इन चरवाहों की आमदनी का सबसे बड़ा आधार भेड़ और बकरी पालन ही है। भेड़ों से मिलने वाली ऊन, बकरियों के दूध से तैयार उत्पाद और समय-समय पर पशुओं की बिक्री उनकी आय के मुख्य स्रोत माने जाते हैं। कुछ परिवार दूध से घी और अन्य पारंपरिक उत्पाद भी तैयार करते हैं। इस पूरे काम में परिवार के सभी सदस्यों की कड़ी मेहनत जुड़ी होती है। पशुओं को चराने, बीमार पशुओं का ध्यान रखने और झुंड को जंगली जानवरों के हमलों से बचाने की जिम्मेदारी बिल्कुल भी आसान नहीं होती है। कई बार परिवार के लोगों को महीनों तक अपने मूल गांवों और सामाजिक परिवेश से पूरी तरह दूर रहना पड़ता है.

## गांवों की बारी से बुग्यालों में पहुंचता है राशन
जब चरवाहे बुग्यालों में रह रहे होते हैं, तो उनके साथ कई अलग-अलग गांवों की भेड़ें और बकरियां भी होती हैं। ऐसी स्थिति में हर महीने अलग-अलग गांवों के लोग बारी-बारी से उनके पास राशन और नमक लेकर पहुंचते हैं। स्वास्थ्य संबंधी कोई परेशानी न आए, इसलिए भेड़ों को पर्याप्त मात्रा में नमक खिलाया जाता है। इस दौरान इन चरवाहों के पास एक हजार से अधिक भेड़ें होती हैं, जिनकी देखभाल उन्हें खुद ही करनी पड़ती है। जब गांवों के लोग राशन और अन्य खाद्य सामग्री लेकर वहां पहुंचते हैं, तो इसी बहाने चरवाहों की कुशलता की जानकारी भी मिलती है। साथ ही उनके अगले पड़ाव के बारे में भी अन्य ग्रामीणों को इसी माध्यम से पता चल पाता है। इस तरह छह महीने चरवाहे उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहते हैं और शीत ऋतु की शुरुआत होते ही धीरे-धीरे पहाड़ी रास्तों से होते हुए भाबर की ओर निकल जाते हैं, जहां वे अगले छह महीने अपना जीवन यापन करते हैं।

## इसका आप पर असर
यह खबर स्थानीय परंपराओं और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी है, जिसका सीधा प्रभाव पर्वतीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

- **उत्तराखंड में:** पर्वतीय जिलों के स्थानीय चरवाहों और पशुपालकों को अत्यधिक ठंड और बर्फबारी के समय अपने मवेशियों को बचाने के लिए मैदानी इलाकों की ओर रुख करना पड़ता है। इससे उनके पारंपरिक मौसमी पलायन और आजीविका के चक्र पर सीधा असर पड़ता है।
- **बागेश्वर में:** बागेश्वर और आसपास के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को अपनी आजीविका चलाने के लिए ऊन, दूध और पशु बिक्री पर निर्भर रहना पड़ता है। मौसम में बदलाव के कारण उनके दैनिक कामकाज और रसद पहुंचाने की व्यवस्था तय होती है।

## ऐसा क्यों हुआ
पर्वतीय क्षेत्रों में चरवाहों के जीवन और उनके मौसमी पलायन के पीछे भौगोलिक और जलवायु संबंधी कारण मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं।

- **मौसम का प्रभाव:** सर्दियों के दौरान उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भारी बर्फबारी और अत्यधिक ठंड के कारण घास और पानी की भारी कमी हो जाती है। इस वजह से पशुओं का वहां जीवित रहना कठिन हो जाता है, जिससे उन्हें नीचे की घाटियों में लाना जरूरी हो जाता है।
- **चरागाहों की उपलब्धता:** गर्मियों के मौसम में ऊंचे बुग्यालों में प्राकृतिक रूप से हरी घास और पानी प्रचुर मात्रा में उग आते हैं। चरवाहे पशुओं के बेहतर पोषण के लिए अप्रैल से सितंबर के बीच इन्हीं ऊंचाई वाले इलाकों की तरफ जाते हैं।
- **पारंपरिक आजीविका:** पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली के कारण ये परिवार भेड़ और बकरी पालन पर ही पूरी तरह निर्भर हैं। ऊन, दूध और घी जैसे उत्पादों की मांग और बिक्री उनके जीवनयापन का मुख्य आधार बनी हुई है।

## सवाल-जवाब

### 1. बागेश्वर के चरवाहे गर्मियों में कहां रहते हैं?
गर्मियों के दौरान अप्रैल से सितंबर के बीच ये चरवाहे ऊंचे बुग्यालों में अपने पशुओं के साथ अस्थायी तंबुओं या पत्थरों की चन्नियों में रहते हैं।

### 2. चरवाहे सर्दियों में अपने ठिकाने क्यों बदलते हैं?
सर्दियों में ऊंचाई वाले इलाकों में भारी बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के कारण चारे और पानी की कमी हो जाती है, इसलिए वे निचली घाटियों व भाबर की ओर लौट आते हैं।

### 3. चरवाहों की आमदनी के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उनकी आय का मुख्य आधार भेड़-बकरी पालन, भेड़ों से मिलने वाली ऊन, दूध से बने उत्पाद और पशुओं की बिक्री है।

### 4. बुग्यालों में रहने वाले चरवाहों तक राशन कैसे पहुंचता है?
विभिन्न गांवों के लोग हर महीने बारी-बारी से चरवाहों के पास पैदल चलकर राशन और नमक पहुंचाते हैं।

### 5. भेड़ों को नमक क्यों खिलाया जाता है?
स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां न हों, इसलिए भेड़ों को अच्छी मात्रा में नमक खिलाया जाता है।

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