बागेश्वर में शंभू नदी पर बनी 1 किमी लंबी झील बनी टाइम बम, श्मशान घाट डूबा और 37 लाख घनमीटर पानी से तबाही की आशंका उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की कपकोट तहसील में शंभू नदी का बहाव रुकने से 1.13 किलोमीटर लंबी झील बन चुकी है, जिसमें 37 लाख घनमीटर पानी जमा है और स्थानीय श्मशान घाट भी जलमग्न हो गया है। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित कपकोट तहसील के कुवारी क्षेत्र में एक बड़ा प्राकृतिक संकट गहराता जा रहा है। शंभू नदी के मार्ग में मलबा आने से बनी प्राकृतिक झील ने अब एक विशाल और खतरनाक जलाशय का रूप ले लिया है। लगातार बढ़ते जलस्तर की वजह से नदी किनारे स्थित बरसों पुराना पारंपरिक श्मशान घाट पूरी तरह पानी में डूब चुका है। इस वजह से स्थानीय ग्रामीणों के सामने परिजनों की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार करने तक के लिए सुरक्षित स्थान नहीं बचा है। हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए ताजा उपग्रह अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इस झील में वर्तमान में लगभग 37 लाख घनमीटर पानी जमा हो चुका है, जो निचले इलाकों के गांवों के लिए गंभीर खतरा बन गया है। श्मशान घाट पूरी तरह जलमग्न, ग्रामीणों में बना तबाही का खौफ कुवारी और आसपास की बस्तियों में रहने वाले लोगों का दैनिक जीवन प्राकृतिक रूप से कठिन रहा है, लेकिन अब श्मशान घाट डूब जाने से स्थिति और अधिक दयनीय हो गई है। स्थानीय निवासी किशन दानू के अनुसार, शंभू नदी में बीते कई वर्षों से जल भराव हो रहा था, लेकिन इस बार पानी का फैलाव बेकाबू हो चुका है। जलस्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने से पूरा श्मशान घाट जलमग्न हो गया है, जिससे गांव में किसी व्यक्ति के निधन पर चिता सजाने तक के लिए सूखी जगह उपलब्ध नहीं हो पा रही है। ग्रामीणों को डर है कि यदि क्षेत्र में मूसलाधार बारिश होती है, तो यह अस्थाई बांध टूट सकता है और पानी का तीव्र प्रवाह आवासीय क्षेत्रों, रास्तों और पुलों को बहा ले जाएगा। स्थानीय निवासियों ने केवल प्रशासनिक दौरों के बजाय इस जलभराव का स्थायी और पक्का समाधान निकालने की मांग की है। जून 2013 की केदारनाथ आपदा से जुड़े हैं इस संकट के तार कुवारी क्षेत्र की तलहटी में बहने वाली शंभू नदी का उद्गम शंभू ग्लेशियर से होता है। इस स्थान पर झील बनने की मुख्य वजह जून 2013 की ऐतिहासिक केदारनाथ आपदा से जुड़ी हुई है। उस भीषण प्राकृतिक तबाही के दौरान कुवारी पहाड़ी की ढलान का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे शंभू नदी की घाटी में गिर गया था। चट्टानों, मलबे और गाद के जमा होने से नदी का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो गया था। तब से वहां बार-बार पानी रुकने और झील बनने की प्रक्रिया जारी है। इससे पूर्व वर्ष 2023 में भी जब जलस्तर काफी बढ़ गया था, तब सिंचाई विभाग कपकोट की टीम ने मौके पर जाकर मैन्युअल खुदाई के जरिए पानी का निकास कराया था और तत्कालीन खतरे को टाल दिया था। हालांकि, पहाड़ी से लगातार मलबा गिरते रहने के कारण नदी का मुहाना बार-बार बंद हो जाता है। एनआरएससी हैदराबाद की सैटेलाइट रिपोर्ट: 11 वर्षों में 400 मीटर से 1130 मीटर तक बढ़ी झील नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर, हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2013 से 2025 के बीच की उपग्रह तस्वीरों, वर्ष 2014 से 2024 तक के InSAR आंकड़ों और जमीनी सर्वेक्षणों का विस्तृत विश्लेषण किया है। वैज्ञानिक आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि यह प्राकृतिक झील लगातार विस्तृत होती जा रही है • नवंबर 2013: प्रारंभिक सैटेलाइट अध्ययन में झील की कुल लंबाई 400 मीटर और चौड़ाई 20 मीटर दर्ज की गई थी। • वर्ष 2014: झील की लंबाई बढ़कर लगभग 580 मीटर तक पहुंच गई थी। • वर्ष 2021: पानी का फैलाव बढ़कर 680 मीटर की लंबाई तक दर्ज किया गया। • अप्रैल 2022: उपग्रह तस्वीरों में झील की लंबाई 885 मीटर पाई गई। • अक्टूबर 2022: झील का दायरा बढ़कर लगभग 900 मीटर लंबा और 80 मीटर चौड़ा हो गया। • अक्टूबर 2023: झील की लंबाई 1050 मीटर और चौड़ाई 85 मीटर से अधिक मापी गई। • अक्टूबर 2024: नवीनतम मापन के अनुसार झील की लंबाई 1130 मीटर (1.13 किलोमीटर) और चौड़ाई 100 मीटर तक पहुंच चुकी है। जलवैज्ञानिकों और उपग्रह मॉडलों के अनुसार, इस मलबे के पीछे वर्तमान में लगभग 37 लाख घनमीटर पानी रुका हुआ है, जो भारी बारिश की स्थिति में नीचे की घाटियों के लिए अत्यधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता है। 'रेट्रोग्रेसिव भूस्खलन' की श्रेणी में आया कुवारी पहाड़, ढलान लगातार हो रही अस्थिर वैज्ञानिकी जांच में कुवारी भूस्खलन की प्रकृति को लेकर एक चिंताजनक तथ्य का खुलासा हुआ है। विशेषज्ञों ने इसे 'रेट्रोग्रेसिव लैंडस्लाइड' के रूप में वर्गीकृत किया है। इसका तात्पर्य यह है कि सामान्य भूस्खलन की तरह केवल नीचे की ओर मलबा गिरने के बजाय, यहां पहाड़ी का ऊपरी हिस्सा पीछे और ऊपर की तरफ खिसक रहा है। पहाड़ी की चट्टानें अत्यधिक कमजोर और भुरभुरी हैं, जिनमें नई दरारें बन रही हैं और अंदरूनी जल का रिसाव हो रहा है। इसका सीधा निष्कर्ष यह है कि खतरा केवल पहले से जमा मलबे से नहीं है, बल्कि पूरी ढलान खुद अस्थिर बनी हुई है और कभी भी पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा पुनः नदी घाटी में गिर सकता है। InSAR सैटेलाइट तकनीक से यह भी प्रमाणित हुआ है कि क्षेत्र में होने वाली बारिश और जमीन के खिसकने के बीच सीधा संबंध है। प्रशासनिक दल ने किया निरीक्षण, शासन से विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण की सिफारिश झील का फैलाव बढ़ने और स्थानीय लोगों की चिंता के बाद गुरुवार को जिला प्रशासन की एक संयुक्त टीम ने क्षेत्र का दौरा किया। इस दल में सिंचाई विभाग, राजस्व विभाग और भूवैज्ञानिकों के प्रतिनिधि शामिल थे, जिन्होंने कुवारी पहुंचकर शंभू नदी के मुहाने पर बनी स्थिति का जायजा लिया। इस निरीक्षण के संबंध में अपर जिलाधिकारी (एडीएम) एनएस नबियाल ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में झील से पानी का रिसाव प्राकृतिक रूप से धीरे-धीरे हो रहा है, जिससे तुरंत कोई आपात स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है। फिर भी, भूगर्भीय संवेदनशीलता को देखते हुए विस्तृत निरीक्षण रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी गई है और विशेषज्ञ वैज्ञानिक संस्थानों से क्षेत्र का व्यापक भूवैज्ञानिक और हाइड्रोलॉजिकल सर्वेक्षण कराने की सिफारिश की गई है। इसका आप पर असर उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और पर्यटकों के लिए सुरक्षा व्यवस्था तथा बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। • उत्तराखंड में: बागेश्वर और कपकोट तहसील के निचले क्षेत्रों में स्थित गांवों को संभावित बाढ़ का अलर्ट झेलना पड़ सकता है तथा श्मशान घाट जलमग्न होने से स्थानीय ग्रामीणों को अंतिम संस्कार में भारी असुविधा हो रही है। • भारत में: संवेदनशील हिमालयी राज्यों में भूस्खलन जनित प्राकृतिक झीलों की सैटेलाइट निगरानी और त्वरित आपदा प्रबंधन रणनीतियों की प्रभावशीलता पर राष्ट्रीय स्तर पर समीक्षा तेज होगी। ऐसा क्यों हुआ शंभू नदी में इस खतरनाक झील का निर्माण प्राकृतिक मलबे से नदी मार्ग अवरुद्ध होने और लगातार हो रहे भूस्खलन के कारण हुआ है। • प्राकृतिक अवरोध: जून 2013 की आपदा के समय कुवारी पहाड़ी का बड़ा भाग गिरकर शंभू नदी की घाटी में जमा हो गया था, जिससे नदी का प्राकृतिक बहाव रुक गया। • रेट्रोग्रेसिव भूस्खलन: पहाड़ी का ऊपरी हिस्सा धीरे-धीरे पीछे की ओर खिसक रहा है और कमजोर चट्टानों व पानी के रिसाव के कारण बार-बार नया मलबा नदी में गिरता रहता है। • मानसून और बारिश: भारी बारिश के दौरान ढलान का खिसकना तेज हो जाता है, जिससे रुका हुआ पानी 1.13 किलोमीटर लंबाई और 37 लाख घनमीटर आयतन तक फैल गया है। सवाल-जवाब 1. बागेश्वर की शंभू नदी पर बनी झील की लंबाई और चौड़ाई कितनी है? अक्टूबर 2024 के उपग्रह आंकड़ों के अनुसार, शंभू नदी पर बनी झील की लंबाई 1130 मीटर (1.13 किलोमीटर) और चौड़ाई 100 मीटर तक पहुंच गई है। 2. इस प्राकृतिक झील में कितना पानी जमा हो चुका है? हैदराबाद स्थित NRSC के वैज्ञानिकों के अनुसार झील के पीछे लगभग 37 लाख घनमीटर (3.7 Million Cubic Metre) पानी जमा है। 3. झील बनने की मुख्य वजह क्या है? जून 2013 की आपदा के दौरान कुवारी पहाड़ी का ढलान टूटकर शंभू नदी घाटी में गिर गया था, जिससे नदी का प्राकृतिक बहाव रुक गया। 4. स्थानीय ग्रामीणों को किस प्रमुख समस्या का सामना करना पड़ रहा है? झील का जलस्तर बढ़ने से नदी किनारे बना पारंपरिक श्मशान घाट जलमग्न हो चुका है, जिससे ग्रामीणों के पास अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं बची है। 5. प्रशासन ने इस स्थिति पर क्या कार्रवाई की है? राजस्व, सिंचाई और भूवैज्ञानिकों की टीम ने मुआयना किया है। अपर जिलाधिकारी के अनुसार फिलहाल प्राकृतिक रिसाव हो रहा है और विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेजकर विस्तृत भूगर्भीय सर्वेक्षण की सिफारिश की गई है। https://trendkia.com/uttarakhand/bageshwar-men-shambhu-nadi-para-1-kimi-lnbi-jhila-bani-taima-bama-31497 TrendKia — Har trend, sabse pehle.