डार्क रूम की रील से डिजिटल लेंस तक: देहरादून के विवेक भाटिया का पाँच दशकों का फोटोग्राफी सफर पाँच साल की उम्र में डार्क रूम की तकनीक देखने वाले देहरादून के विवेक भाटिया ने एनालॉग रील से लेकर आधुनिक डिजिटल कैमरों तक का दौर देखा है। 1976 में पिता द्वारा शुरू किए गए स्टूडियो से लेकर आज तक, 50 वर्षों से उनका कैमरे से गहरा नाता बना हुआ है। फोटोग्राफी की दुनिया में जब कोई तस्वीर क्लिक की जाती है, तो वह केवल एक फ्रेम नहीं बल्कि एक पूरे युग की गवाह बन जाती है। देहरादून के रहने वाले विवेक भाटिया की ज़िंदगी भी कुछ इसी तरह लेंस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। जिस छोटी उम्र में बच्चे खिलौनों के पीछे भागते हैं, उस पाँच वर्ष की बाल उम्र में विवेक अपने पिता के स्टूडियो में डार्क रूम और केमिकल के बीच तस्वीरें तैयार होते देखा करते थे। नेगेटिव से चमकती हुई तस्वीर उभरने का जादू उनके मन में ऐसा बसा कि कैमरे की दुनिया ही उनकी पहचान बन गई। आज करीब 50 साल बीत जाने के बाद भी, पहाड़ों और देहरादून की वादियों में कैमरे के साथ उनकी सक्रियता उसी शिद्दत से कायम है। पिता की सैन्य सेवा के बाद 1976 में शुरू हुआ रेसकोर्स का स्टूडियो विवेक भाटिया के इस कलात्मक सफर की नींव उनके पिता ने रखी थी। उनके पिता भारतीय सेना में सेवारत थे और उन्होंने काफी कम उम्र में सेना ज्वाइन कर ली थी। लगभग 14 वर्षों तक देश की सेवा करने के उपरांत, उन्होंने वॉलंटरी रिटायरमेंट ले लिया और घर वापस आ गए। नागरिक जीवन में लौटने के बाद उन्होंने कैमरा और फोटोग्राफी की बारीकियां सीखीं और साल 1976 में देहरादून के रेसकोर्स इलाके में अपनी फोटोग्राफी की दुकान खोली। उस दौर में यह दुकान केवल फोटो खींचने की जगह नहीं थी, बल्कि उसमें एक मुकम्मल स्टूडियो और तस्वीरों को प्रोसेस करने के लिए विशेष डार्क रूम भी मौजूद था। उस ज़माने में आज की तरह मोबाइल फोन या तुरंत नतीजे देने वाले डिजिटल उपकरण नहीं हुआ करते थे। शहर के बाशिंदों को जब भी परिवार, निजी दस्तावेज या किसी खास आयोजन के लिए तस्वीर खिंचवानी होती थी, तो स्टूडियो जाना ही एकमात्र जरिया था। पाँच साल के विवेक दुकान के कोने में खड़े होकर अपने पिता के हाथों से नेगेटिव को धुलते और कागज पर तस्वीर बनते देखते थे, जिससे उनके बाल मन में इस शिल्प के प्रति गहरा कौतूहल पैदा हो गया। डार्क रूम में बीती रातें और 15 साल की उम्र में कैमरे पर पकड़ जैसे-जैसे काम का दायरा बढ़ा, दुकान पर ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ने लगी। कई बार स्थिति ऐसी होती थी कि उनके पिता को समय पर खाना खाने या रात को सोने की फुर्सत तक नहीं मिल पाती थी। डार्क रूम में केमिकल के बीच पूरी-पूरी रात काम करके तस्वीरें तैयार की जाती थीं। पिता की इस अथक मेहनत को देखकर विवेक ने पढ़ाई के बाद बचे समय में उनका हाथ बंटाने का फैसला किया। स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही वह सीधे रेसकोर्स स्थित दुकान पर पहुंच जाते थे। शुरुआती दिनों में वह छोटे-मोटे सहयोगी काम निपटाते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने कैमरे के लेंस, फ्रेमिंग, नेगेटिव तैयार करने और फिर अंधेरे कमरे में सावधानीपूर्वक फोटो डेवलप करने की जटिल प्रक्रिया को गहराई से समझ लिया। पिता की छत्रछाया में निरंतर अभ्यास करते हुए, महज 15 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते विवेक खुद एक कुशल फोटोग्राफर बन चुके थे। अब वह स्वयं कैमरे से सटीक शॉट लेने के साथ-साथ नेगेटिव रोल तैयार करने और उसे कागज पर प्रिंट करने का पूरा काम स्वतंत्र रूप से संभालने लगे थे। पिता की विरासत और एनालॉग से डिजिटल क्रांति का समन्वय शुरुआत में पिता का काम हल्का करने के मकसद से सीखा गया यह हुनर आगे चलकर विवेक भाटिया का जीवन भर का पेशा बन गया। पिता के निधन के बाद दुकान और स्टूडियो के संचालन की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई, जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया। इस यात्रा के दौरान तकनीक में भारी बदलाव आए। मैनुअल फोकस, रील, नेगेटिव और डार्क रूम का वह पुराना एनालॉग दौर धीरे-धीरे डिजिटल चिप्स, मेमोरी कार्ड और कंप्यूटर स्क्रीन में तब्दील हो गया। विवेक ने इस तकनीकी बदलाव से मुंह मोड़ने के बजाय समय के साथ कदम मिलाया और डिजिटल फोटोग्राफी की नई कार्यप्रणाली को पूरी तरह सीखा। आज भी वह डिजिटल लेंस के जरिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। तकनीक चाहे केमिकल वाले घोल से निकलकर पिक्सल तक पहुंच गई हो, लेकिन उनके लिए लेंस से देहरादून की गलियों और प्राकृतिक नजारों को देखना आज भी उतना ही रोमांचक है जितना बचपन में पिता के साथ बैठना हुआ करता था। इसका आप पर असर यह कहानी पारंपरिक कला से आधुनिक तकनीक की ओर बढ़ते बदलाव और पारिवारिक हुनर को सहेजने के महत्व को रेखांकित करती है। • भारत में: यह अनुभव दिखाता है कि कैसे तेजी से बदलते तकनीकी दौर में पुराने हुनरमंद भी खुद को नई तकनीक के अनुकूल ढाल सकते हैं। जो पेशेवर बदलाव को स्वीकार करते हैं, वे बाजार में दशकों तक प्रासंगिक बने रहते हैं। • देहरादून में: रेसकोर्स जैसे ऐतिहासिक बाजार के पुराने स्टूडियो शहर की सांस्कृतिक और सामाजिक यादों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं। स्थानीय लोग आज भी पारंपरिक फोटोग्राफरों के जरिए पारिवारिक इतिहास और पलों को सहेज रहे हैं। • पेशेवर सीख: नए दौर के रचनाकारों को एनालॉग फोटोग्राफी की बुनियादी समझ और धैर्य से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। केवल ऑटो मोड पर निर्भर रहने के बजाय बुनियादी प्रकाश और फ्रेमिंग की तकनीक समझना जरूरी है। • पारिवारिक उद्यम: माता-पिता के काम में हाथ बंटाने से व्यावहारिक ज्ञान और आत्मनिर्भरता बहुत कम उम्र में हासिल हो जाती है। यह युवाओं को करियर के निर्माण में शुरुआती बढ़त और वास्तविक अनुभव प्रदान करता है। ऐसा क्यों हुआ विवेक भाटिया का 50 साल लंबा फोटोग्राफिक सफर पारिवारिक सहयोग और फोटोग्राफी तकनीक में आए ऐतिहासिक परिवर्तनों की वजह से संभव हुआ। • सैन्य पृष्ठभूमि के बाद नया करियर: उनके पिता ने भारतीय सेना से करीब 14 साल की सेवा के बाद वॉलंटरी रिटायरमेंट लिया और 1976 में देहरादून के रेसकोर्स में स्टूडियो की स्थापना की। उस समय मोबाइल या घरेलू कैमरे न होने की वजह से स्टूडियो ही फोटो खिंचवाने का मुख्य जरिया था। • अत्यधिक कार्यभार और डार्क रूम की जरूरत: ग्राहकों की भारी संख्या के चलते रात-रात भर डार्क रूम में फोटो तैयार करनी पड़ती थी, जिससे पिता की मदद के लिए विवेक ने बचपन से ही काम सीखना शुरू कर दिया। 15 साल की उम्र तक वह खुद पूरी प्रक्रिया में माहिर हो चुके थे। • एनालॉग से डिजिटल का ऐतिहासिक दौर: फोटोग्राफी उद्योग धीरे-धीरे केमिकल, रील और नेगेटिव से डिजिटल सेंसर और मेमोरी कार्ड में बदल गया, जिससे प्रासंगिक बने रहने के लिए नई तकनीक अपनाना अनिवार्य हो गया। सवाल-जवाब 1. विवेक भाटिया ने कितने सालों तक फोटोग्राफी का सफर देखा है? विवेक भाटिया लगभग 50 सालों से कैमरे के साथ जुड़े हुए हैं और उन्होंने एनालॉग से डिजिटल दौर तक का सफर तय किया है। 2. उनके पिता ने देहरादून में स्टूडियो कब और कहाँ खोला था? उनके पिता ने भारतीय सेना से 14 साल की सेवा के बाद रिटायरमेंट लेकर साल 1976 में देहरादून के रेसकोर्स इलाके में दुकान और स्टूडियो खोला था। 3. विवेक ने किस उम्र में फोटोग्राफी का पूरा काम सीख लिया था? विवेक पाँच साल की उम्र से डार्क रूम का काम देखने लगे थे और 15 साल की उम्र तक वह पूरी तरह फोटोग्राफी और फोटो डेवलप करना सीख चुके थे। 4. दुकान की पूरी जिम्मेदारी विवेक के कंधों पर कब आई? पिता के निधन के बाद विवेक भाटिया ने दुकान और स्टूडियो की पूरी जिम्मेदारी संभाली और नई डिजिटल तकनीक के साथ काम जारी रखा। प्रेरणा और सबक विवेक भाटिया का जीवन दिखाता है कि समर्पण, पारिवारिक सहयोग और निरंतर सीखने की ललक से किसी भी विधा में लंबी सफलता हासिल की जा सकती है। • कम उम्र से जिम्मेदारी की भावना: पिता की मेहनत को देखकर बचपन में ही खेलकूद के साथ काम में हाथ बंटाने से न सिर्फ पारिवारिक संबल मिला बल्कि हुनर भी निखरा। • बदलाव के साथ खुद को ढालना: 50 वर्षों में एनालॉग से डिजिटल का दौर आने पर उन्होंने नई तकनीक का स्वागत किया और लगातार सीखते रहे। • शिल्प के प्रति गहरा समर्पण: डार्क रूम की कठिन और जटिल प्रक्रियाओं को धैर्यपूर्वक सीखकर उन्होंने एक साधारण मदद को अपने जीवन के पेशे में तब्दील किया। https://trendkia.com/uttarakhand/darka-ruma-ki-rila-se-dijitala-lensa-taka-dehradun-ke-vivek-bhatia-ka-pancha-dashakon-ka-photographi-saphara-38377 TrendKia — Har trend, sabse pehle.