# देहरादून के गढ़ी कैंट में 68 साल की जसोदा का हौसला, तीन दशकों से ठेले पर परोस रहीं मशहूर बन टिक्की

> पति के देहांत के बाद देहरादून की 68 वर्षीय जसोदा ने ठेला संभालकर बच्चों की परवरिश की और आज 30 साल से गढ़ी कैंट में लोकप्रिय बन टिक्की परोस रही हैं।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/dehradun-ke-garhi-cantt-men-68-sala-ki-jasoda-ka-hausala-tina-dashakon-se-thele-para-parosa-rahin-mashahura-bana-tikki-40428 · **Language:** Hindi
**Tags:** देहरादून, गढ़ी कैंट, जसोदा, बन टिक्की, डाकरा बाज़ार, उत्तराखंड खानपान, महिला उद्यमिता

जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों में जब रास्ते बंद दिखाई देते हैं, तब अटूट इच्छाशक्ति ही इंसान को आगे बढ़ने की राह दिखाती है। देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र में रहने वाली 68 वर्षीय जसोदा की कहानी इसी दृढ़ निश्चय का प्रमाण है। सिर से जीवनसाथी का साया छिन जाने के बाद जब परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हुआ, तो उन्होंने हार मानने की बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। आज ढलती उम्र के उस पड़ाव पर, जहां अधिकांश लोग सेवानिवृत्त होकर आराम की दिनचर्या अपनाते हैं, जसोदा पूरी लगन से शाम ढलते ही अपना ठेला सजाती हैं और लोगों को अपने हाथों का स्वाद परोसती हैं।

## संकट के दौर में संभाली परिवार की कमान
जसोदा के परिवार में सब कुछ सामान्य चल रहा था और उनके पति स्थानीय स्तर पर ठेले पर टिक्की बनाकर घर का खर्च चलाते थे। अचानक पति का देहांत हो गया, जिससे परिवार पर गहरा दुख आ पड़ा। बच्चों की परवरिश और उनकी पढ़ाई-लिखाई की पूरी जिम्मेदारी अचानक जसोदा के कंधों पर आ गई। ऐसे नाज़ुक मोड़ पर उन्होंने दूसरों पर आश्रित रहने के बजाय पति के काम को ही आगे बढ़ाने का फैसला किया। उन्होंने खुद ठेला संभालना शुरू किया और अपनी कड़ी मेहनत के दम पर बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और उनका पालन-पोषण सम्मान के साथ पूरा किया।

## तीन दशकों से बरकरार है स्वाद का सफर
जसोदा को यह काम करते हुए अब 30 साल से भी अधिक का समय बीत चुका है। तीन दशकों के इस लंबे सफर में उन्होंने कभी काम से मुंह नहीं मोड़ा। देहरादून का कैंट क्षेत्र, जो मशहूर टपकेश्वर महादेव मंदिर और रॉबर्स केव जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों के लिए जाना जाता है, वहीं डाकरा बाज़ार की गलियों में उनका यह छोटा सा ठेला लगता है। शाम होते ही स्थानीय निवासियों और वहां से गुजरने वाले पर्यटकों की भीड़ उनके ठेले पर जुटने लगती है। साठ की उम्र पार करने के बाद भी उनका यह जज्बा उन सभी महिलाओं को हिम्मत देता है जो जीवन की अनपेक्षित मुश्किलों से घबरा जाती हैं।

## डाकरा बाज़ार में गरमा-गरम बन टिक्की की धूम
गढ़ी कैंट के डाकरा बाज़ार में हर शाम जसोदा अपने ठेले पर ग्राहकों को गरमा-गरम बन टिक्की तैयार करके देती हैं। बड़े तवे पर कुरकुरी सिकती आलू की टिक्की, ताज़ा कटे बन और उनके साथ परोसी जाने वाली खास इमली की चटनी, लच्छेदार प्याज़ व भुने ज़ीरे का चटपटा स्वाद लोगों को बेहद पसंद आता है। स्वाद के शौकीनों के लिए यह साधारण लगने वाला व्यंजन अपनी ताजगी और स्वाद के कारण खास बन चुका है। डाकरा बाज़ार में उनके ठेले पर मात्र 35 रुपए में ताज़ा बन के साथ दो करारी टिक्कियां परोसी जाती हैं।

## इसका आप पर असर
स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार और पारंपरिक खानपान की तलाश करने वाले लोगों के लिए यह खबर व्यावहारिक जानकारी और प्रेरणा दोनों प्रदान करती है।

- **देहरादून में:** टपकेश्वर महादेव मंदिर या रॉबर्स केव की यात्रा करने वाले पर्यटक गढ़ी कैंट के डाकरा बाज़ार में शाम के समय इस किफायती स्थानीय व्यंजन का स्वाद ले सकते हैं। यहां मात्र 35 रुपए में दो करारी टिक्की और बन का नाश्ता आसानी से उपलब्ध रहता है।
- **भारत में:** देश भर में स्वरोजगार शुरू करने की सोच रही महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह कहानी साबित करती है कि सीमित संसाधनों से भी आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है। स्थानीय स्ट्रीट फूड संस्कृति छोटे स्तर पर पारिवारिक आजीविका चलाने का एक मजबूत माध्यम बनी हुई है।

## ऐसा क्यों हुआ
पारिवारिक संकट और आजीविका की अनिवार्यता के कारण जसोदा को यह व्यावसायिक कदम उठाना पड़ा था। जीवनसाथी के अचानक चले जाने के बाद उनके सामने बच्चों के भरण-पोषण की सीधी चुनौती खड़ी हो गई थी।

- **पारिवारिक मुखिया का निधन:** जसोदा के पति का अचानक देहांत हो गया, जिससे परिवार की नियमित आय पूरी तरह बंद हो गई थी। अकेले पड़ जाने के बाद बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी बन गया।
- **मौजूदा काम को आगे बढ़ाना:** पति पहले से ठेले पर टिक्की बनाने का काम करते थे, इसलिए उन्होंने कोई नया प्रयोग करने के बजाय उसी स्थापित काम की बागडोर खुद संभाली। इस निर्णय से उन्हें शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़ी और ग्राहक आधार भी जुड़ा रहा।
- **निरंतर मेहनत से मिली स्थिरता:** उन्होंने पिछले तीन दशकों में बिना रुके इसी काम को अपनी आजीविका का जरिया बनाए रखा। इसी नियमित कमाई के सहारे उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और बाजार में अपनी पहचान स्थापित की।

## सवाल-जवाब

### 1. जसोदा देहरादून में अपना ठेला कहां लगाती हैं?
जसोदा देहरादून के कैंट क्षेत्र स्थित गढ़ी कैंट के डाकरा बाज़ार में अपना ठेला लगाती हैं।

### 2. जसोदा की उम्र कितनी है और वे कितने समय से यह काम कर रही हैं?
जसोदा की उम्र 68 वर्ष है और वे पिछले 30 से अधिक वर्षों से यह काम कर रही हैं।

### 3. उनके ठेले पर बन टिक्की की क्या कीमत है?
उनके ठेले पर ताज़ा बन के साथ दो करारी टिक्की की प्लेट 35 रुपए में मिलती है।

### 4. जसोदा ने ठेला चलाना क्यों शुरू किया था?
पति के अचानक देहांत के बाद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालने और बच्चों की पढ़ाई-परवरिश के लिए उन्होंने यह काम शुरू किया था।

### 5. उनकी बन टिक्की के साथ क्या-क्या परोसा जाता है?
तवे पर सिकती कुरकुरी टिक्की और ताज़ा बन के साथ खास इमली की चटनी, लच्छेदार प्याज़ और भुने ज़ीरे का मसाला दिया जाता है।

## प्रेरणा और सबक
जसोदा का जीवन संघर्ष सिखाता है कि कठिन से कठिन हालात में भी स्वाभिमान और मेहनत से मुकाम हासिल किया जा सकता है।

- **मुसीबत में हिम्मत न हारें:** अचानक आए पारिवारिक संकट से घबराने के बजाय व्यावहारिक रास्ता चुनकर आगे बढ़ना चाहिए। जसोदा ने आंसुओं को कमजोरी बनाने के बजाय काम को अपनी ताकत बनाया।
- **उम्र को बाधा न बनने दें:** 68 वर्ष की आयु में भी सक्रिय रहकर काम करना यह दर्शाता है कि सीखने और कर्म करने की कोई निश्चित उम्र सीमा नहीं होती। लगन हो तो ढलती उम्र में भी आत्मनिर्भर बना रहा जा सकता है।
- **ईमानदार श्रम का सम्मान:** छोटा या बड़ा कोई भी काम हीन नहीं होता, यदि उसे पूरी लगन और ईमानदारी के साथ किया जाए। एक छोटे से ठेले के दम पर उन्होंने पूरे परिवार को सम्मानजनक जीवन दिया।

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