देहरादून के सरस मेले में छत्तीसगढ़ के सिल्क पर उकेरी गई वर्ली कला बनी आकर्षण का केंद्र, तीन हजार रुपये में मिल रही साड़ियां देहरादून के सरस मेले में छत्तीसगढ़ से आए कारीगर राकेश की वर्ली आर्ट वाली सिल्क साड़ियां खरीदारों को खूब लुभा रही हैं। शोरूम में 5,000 से 10,000 रुपये में बिकने वाली ये साड़ियां मेले में सीधे कारीगर से मात्र 3,000 रुपये तक में मिल रही हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आयोजित सरस मेले में देशभर की समृद्ध लोक संस्कृतियों और पारंपारिक शिल्पकला का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। इस भव्य मेले में भारत के अलग-अलग राज्यों से आए दस्तकार अपनी पुश्तैनी कला और उत्पाद लेकर पहुंचे हैं। इसी मेले के बीच छत्तीसगढ़ से पहली बार पहुंचे एक कारीगर राकेश की स्टॉल पर भारी भीड़ जुट रही है। उनके पास मौजूद शुद्ध रेशम पर हस्तनिर्मित वर्ली चित्रकारी से सजी साड़ियां मेले में आने वाले कला प्रेमियों और ग्राहकों के बीच जबरदस्त चर्चा का विषय बनी हुई हैं। साड़ियों के पल्लू और बॉर्डर पर उकेरी गई आदिवासी आकृतियां लोगों को पहली नजर में ही भा रही हैं। शोरूम की तुलना में बेहद किफायती दाम पर सीधी खरीदारी इस स्टॉल पर साड़ियों की सबसे बड़ी खूबी उनकी किफायती दरें हैं। मेले में ये खास वर्ली पेंटिंग वाली साड़ियां 3,000 रुपये तक की कीमत में बेची जा रही हैं। कारीगर राकेश के अनुसार, जब यही साड़ियां बड़े शहरों के महंगे शोरूम या खास बुटीक में पहुंचती हैं, तो उनकी कीमत 5,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक पहुंच जाती है। सरस मेले के मंच ने बिचौलियों को पूरी तरह बाहर कर दिया है, जिससे देहरादून के स्थानीय निवासियों को सीधे वास्तविक बुनकर और चित्रकार से बिना किसी अतिरिक्त कमीशन के उचित दाम पर यह हस्तशिल्प खरीदने का शानदार अवसर मिल रहा है। छत्तीसगढ़ से पहली बार दून पहुंचे राकेश की अनोखी कला कारीगर राकेश पहली बार देहरादून की सरजमीं पर अपनी कला का प्रदर्शन करने आए हैं। वह अपने साथ विभिन्न प्रकार के रेशमी वस्त्र, सूट और परिधान लाए हैं, लेकिन उनके पूरे संग्रह में वर्ली आर्ट वाली साड़ियों की मांग सबसे ज्यादा देखी जा रही है। इन साड़ियों पर पारंपरिक आदिवासी जीवन और वर्ली शैली के रेखाचित्र बेहद बारीकी से बनाए गए हैं। साड़ियों की सादगी, प्राकृतिक रंगों का संयोजन और सिल्क की चमक महिलाओं को काफी आकर्षित कर रही है। इसके साथ ही स्थानीय ग्राहकों का इस कला से गहरा जुड़ाव महसूस करने का एक विशेष सांस्कृतिक कारण भी सामने आया है। वर्ली और उत्तराखंड की ऐपण कला में दिखा अद्भुत साम्य महाराष्ट्र मूल की वर्ली जनजातीय कला और उत्तराखंड की प्रसिद्ध ऐपण लोककला यूं तो भौगोलिक रूप से दो अलग छोर की विधाएं हैं, लेकिन दोनों शैलियों की मूल संरचना में काफी समानता पाई जाती है। दोनों ही पारंपरिक कलाओं में ज्यामितीय स्वरूपों जैसे त्रिकोण, वृत्त और प्रतीकात्मक मानव आकृतियों का भरपूर उपयोग होता है। यही वजह है कि जब देहरादून के लोग इन साड़ियों पर बने चित्रों को देख रहे हैं, तो उन्हें इसमें अपनी स्थानीय ऐपण परंपरा की स्पष्ट झलक नजर आ रही है। इस सांस्कृतिक समानता ने स्थानीय खरीदारों के दिल में इन साड़ियों के प्रति एक भावनात्मक लगाव पैदा कर दिया है। रेशम के आंचल पर जीवंत होती ग्रामीण दिनचर्या वर्ली कला वास्तव में भारत के ग्रामीण और जनजातीय जनजीवन का जीवंत दस्तावेज है। इन साड़ियों के पल्लू और किनारों पर गांव के उत्सव, लोकनृत्य, खेती-किसानी, पशु-पक्षी और प्रकृति के विभिन्न रूपों को बेहद खूबसूरती से चित्रित किया जाता है। रेशमी फैब्रिक पर हाथों से तैयार की गई यह महीन चित्रकारी हर साड़ी को अपने आप में अद्वितीय बना देती है। इसके ज्यामितीय डिजाइन जहां एक ओर सदियों पुरानी परंपरा को सहेजते हैं, वहीं दूसरी ओर इनका लुक आज के आधुनिक दौर के फैशन के भी बिल्कुल अनुकूल बैठता है। उचित रखरखाव से पीढ़ियों तक बरकरार रहती है चमक इन साड़ियों के निर्माण में उच्च गुणवत्ता वाले रेशम और लंबे समय तक टिकने वाले पक्के रंगों का उपयोग किया गया है। कारीगरों का कहना है कि यदि इन साड़ियों की सही तरीके से देखभाल की जाए और नियमित रूप से ड्राई क्लीन कराया जाए, तो इनकी खूबसूरती और मजबूती कई दशकों तक जस की तस बनी रहती है। सिल्क के टिकाऊपन और इस बेशकीमती कलाकारी के कारण इन्हें पारिवारिक धरोहर के रूप में सहेजकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को उपहार स्वरूप भी सौंपा जा सकता है। हस्तकला का सम्मान करने वाले लोग मेले में पहुंचकर इस अनूठे शिल्प को हाथों-हाथ अपना रहे हैं। इसका आप पर असर देहरादून के सरस मेले में सीधे कारीगर से खरीदारी करने पर खरीदारों को ब्रांडेड शोरूम के मुकाबले 70 प्रतिशत तक कम कीमत पर असली सिल्क और पारंपरिक हस्तकला मिल रही है। • देहरादून में: दून निवासी सीधे सरस मेले में जाकर बिचौलियों के बिना 3,000 रुपये तक में मूल वर्ली सिल्क साड़ियां खरीद सकते हैं। इससे बड़े शोरूम की तुलना में प्रत्येक साड़ी पर 2,000 से 7,000 रुपये तक की सीधी बचत हो रही है। • भारत में: सरस मेले जैसे सरकारी मंच देश भर के पारंपरिक कारीगरों को नए बाजारों में सीधे ग्राहक उपलब्ध करा रहे हैं। इससे दूरदराज के बुनकरों की आय बढ़ती है और उपभोक्ताओं को प्रामाणिक भारतीय लोककला किफायती दरों पर सुलभ होती है। • कपड़ा खरीदारों के लिए: उच्च गुणवत्ता वाले सिल्क पर हाथ से की गई इस पेंटिंग को सही देखभाल और ड्राई क्लीनिंग के जरिए दशकों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। पारंपरिक ज्यामितीय डिजाइनों की वजह से यह परिधान आधुनिक और पारंपरिक दोनों तरह के अवसरों के लिए उपयुक्त रहता है। • सांस्कृतिक जुड़ाव: उत्तराखंड के लोग वर्ली और स्थानीय ऐपण कला के बीच साझा ज्यामितीय प्रतीकों का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। यह विभिन्न राज्यों की पारंपरिक धरोहरों को जोड़ने और उन्हें समझने का व्यावहारिक अवसर देता है। ऐसा क्यों हुआ सरस मेले में इस स्टॉल पर भारी भीड़ और बिक्री होने का मुख्य कारण शोरूम्स की तुलना में भारी कीमत का अंतर और कलात्मक समानता है। बिचौलियों के न होने से यह साड़ी काफी सस्ती मिल रही है और स्थानीय लोग इसमें अपनी ऐपण परंपरा देखते हैं। • कीमत में बड़ा अंतर: बड़े रिटेल शोरूम और बुटीक में यही सिल्क साड़ियां 5,000 से 10,000 रुपये तक में बिकती हैं, जबकि मेले में कारीगर इसे केवल 3,000 रुपये तक में उपलब्ध करा रहे हैं। इस भारी मूल्य लाभ ने ग्राहकों को तुरंत खरीदारी करने के लिए प्रेरित किया। • ऐपण और वर्ली कला की समानता: उत्तराखंड की स्थानीय ऐपण कला और महाराष्ट्र की वर्ली कला दोनों में त्रिकोण, वृत्त और ज्यामितीय मानव आकृतियों का प्रयोग होता है। इस दृश्य समानता के कारण देहरादून के खरीदार इस नई कला शैली से खुद को स्वाभाविक रूप से जोड़ पाए। • सीधा दस्तकार संपर्क: छत्तीसगढ़ से पहली बार आए कारीगर राकेश ने सीधे ग्राहकों के सामने अपने हाथ से तैयार रेशमी कपड़े प्रदर्शित किए। बिचौलियों की गैरमौजूदगी ने प्रामाणिकता और विश्वास का वातावरण तैयार किया। सवाल-जवाब 1. देहरादून के सरस मेले में वर्ली आर्ट की साड़ियों की क्या कीमत है? मेले में छत्तीसगढ़ से आए कारीगर राकेश की स्टॉल पर ये साड़ियां 3,000 रुपये तक की कीमत में उपलब्ध हैं। 2. यही वर्ली आर्ट साड़ियां बड़े शोरूम और बुटीक में किस दाम पर मिलती हैं? कारीगर राकेश के मुताबिक, बड़े शोरूम और बुटीक में इस तरह की साड़ियां 5,000 से 10,000 रुपये तक में बिकती हैं। 3. कारीगर राकेश किस राज्य से देहरादून के सरस मेले में पहुंचे हैं? कारीगर राकेश छत्तीसगढ़ से पहली बार देहरादून में आयोजित सरस मेले में पहुंचे हैं। 4. देहरादून के लोग वर्ली आर्ट की साड़ियों को अपनी किस स्थानीय कला से जोड़कर देख रहे हैं? लोग वर्ली आर्ट में इस्तेमाल होने वाले त्रिकोण, वृत्त और आकृतियों को उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला की झलक के रूप में देख रहे हैं। 5. वर्ली आर्ट वाली इन रेशम साड़ियों पर किन विषयों की चित्रकारी की गई है? इन साड़ियों के आंचल और बॉर्डर पर ग्रामीण जीवन, त्योहारों, लोकनृत्य, प्रकृति और जानवरों से जुड़े दृश्य उकेरे गए हैं। 6. इन साड़ियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए क्या सलाह दी गई है? गुणवत्तापूर्ण सिल्क और पक्के रंगों से बनी इन साड़ियों की उचित देखभाल और ड्राई क्लीन कराने से ये कई वर्षों तक अच्छी स्थिति में रहती हैं। प्रेरणा और सबक छत्तीसगढ़ के एक कारीगर का पहली बार दूसरे राज्य के मेले में जाकर अपनी कला को स्थापित करना और ग्राहकों का विश्वास जीतना स्व-रोजगार और उद्यमिता का प्रेरक उदाहरण है। • बिचौलियों से मुक्ति: अपनी मेहनत का सीधा लाभ उठाने के लिए बड़े बाजारों और प्रदर्शनियों में स्वयं उत्पाद लेकर पहुंचना कारीगरों के लिए लाभप्रद साबित होता है। राकेश ने सीधे मेले का रुख कर अपनी कमाई और ग्राहक दोनों बढ़ाए। • पारंपरिक कला का आधुनिक उपयोग: सदियों पुरानी लोककला को सिल्क की साड़ियों और समकालीन परिधानों पर उतारने से पारंपरिक शिल्प को नया जीवन मिलता है। युवा और आधुनिक खरीदारों के बीच इससे प्राचीन कलाओं की प्रासंगिकता बनी रहती है। • सांस्कृतिक सेतु का निर्माण: एक राज्य की कला का दूसरे राज्य की स्थानीय परंपराओं से मेल तलाशना व्यापार और सामाजिक जुड़ाव दोनों को मजबूत करता है। ऐपण और वर्ली की समानता ने कला को सीमा से परे पहचान दिलाई। https://trendkia.com/uttarakhand/dehradun-ke-saras-mela-men-chhattisgarh-ke-silka-para-ukeri-gai-warli-kala-bani-akarshana-ka-kendra-tina-hajara-rupaye-men-mila-ra-44873 TrendKia — Har trend, sabse pehle.