देहरादून में जीवंत हुई कुमाऊं की सदियों पुरानी परंपरा, बबीता साह लोहनी के प्रयासों से सजने लगा मां नंदा सुनंदा का दरबार कुमाऊं की बेटी बबीता साह लोहनी के प्रयासों से देहरादून में पारंपरिक मां नंदा-सुनंदा महोत्सव की शुरुआत हुई है, जहां 23 सितंबर तक विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उत्तराखंड को केवल उसकी गगनचुंबी हिमालयी चोटियों, घने जंगलों और मनोरम वादियों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इस पर्वतीय राज्य की वास्तविक पहचान यहां की सदियों पुरानी आध्यात्मिक विरासत और लोक आस्था में भी निहित है। कुमाऊं क्षेत्र में मां नंदा और मां सुनंदा को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है और उनकी आराधना में मनाया जाने वाला नंदा देवी महोत्सव दो सौ वर्षों से भी अधिक पुरानी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। अब समय के साथ यह पावन परंपरा पहाड़ों से उतरकर राज्य की राजधानी देहरादून तक पहुंच चुकी है। देहरादून में इस वर्ष मां नंदा-सुनंदा महोत्सव की शुरुआत 15 सितंबर से हो चुकी है और यह भव्य आयोजन 23 सितंबर तक अनवरत चलेगा। इस महोत्सव के देहरादून पहुंचने के पीछे कुमाऊं की एक ऐसी बेटी की भावुक कहानी छिपी है, जिसने अपनी शादी के बाद भी अपने मायके की जड़ों को जीवंत रखने का संकल्प लिया। इस अनूठे सांस्कृतिक प्रयास के पीछे की कहानी देहरादून में इस भव्य धार्मिक आयोजन की मुख्य सूत्रधार बबीता साह लोहनी हैं। विवाह के पश्चात बबीता साह लोहनी अपने पैतृक निवास कुमाऊं से आकर देहरादून में बस गईं। बचपन से ही मां नंदा और सुनंदा की पूजा-अर्चना को बेहद करीब से देखने और उसमें श्रद्धापूर्वक भाग लेने के कारण, देहरादून आने के बाद उन्हें अपने मायके के इस त्योहार की कमी बहुत सताने लगी। घरेलू और सामाजिक जिम्मेदारियों के चलते उनके लिए हर साल उत्सव के दौरान कुमाऊं जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता था। बबीता को जल्द ही यह अहसास हुआ कि देहरादून में रहने वाले सैकड़ों अन्य कुमाऊंनी परिवार भी अपने गृह क्षेत्र की इस अनूठे पर्व से दूर रहकर इसी तरह का खालीपन महसूस करते होंगे। इसी सोच से प्रेरित होकर उन्होंने पिछले साल कुर्मांचल एवं सांस्कृतिक कल्याण परिषद से संपर्क किया और उनके सहयोग से देहरादून में पहली बार इस ऐतिहासिक मां नंदा-सुनंदा महोत्सव की नींव रखी। पारंपरिक शिल्प कला से सजता है मां का दरबार मां नंदा और सुनंदा की पावन प्रतिमाओं का निर्माण बेहद अनूठे और पारंपरिक तरीके से किया जाता है, जो पूरी तरह से प्रकृति से जुड़े होने का संदेश देता है। इन देवी प्रतिमाओं को तैयार करने के लिए केले के पेड़ के तने, रुई, नए कपड़ों और बांस की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है। मूर्तियों के तैयार होने के बाद उन्हें कछुए के आकार के बने एक विशेष आसन पर प्रतिष्ठित किया जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में कछुए को स्थिरता और ब्रह्मांडीय आधार का प्रतीक माना गया है। देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र में अष्टमी के पावन अवसर पर ब्रह्म मुहूर्त के दौरान इन मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। इस पावन अनुष्ठान के संपन्न होते ही पूरा क्षेत्र देवी की अलौकिक ऊर्जा से सराबोर हो उठेगा। लोक धुनों और पारंपरिक कलाओं की अनूठी प्रस्तुति प्राण प्रतिष्ठा के संपन्न होने के बाद गढ़ी कैंट का पूरा इलाका कुमाऊं की पारंपरिक लोक धुनों से गुंजायमान हो जाएगा। श्रद्धालु इस दौरान पारंपरिक लोक नृत्य झोड़ा और चाचरी की मनमोहक प्रस्तुति देंगे, जो पहाड़ों के सामाजिक और कृषक जीवन की खूबसूरती को बयां करते हैं। इसके साथ ही सुरीले भजनों और कीर्तनों से पूरा माहौल भक्तिमय रहेगा। नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के लिए आयोजकों द्वारा कई तरह की रचनात्मक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है। बच्चों के लिए फैंसी ड्रेस और चित्रकला प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाएगा। चित्रकला प्रतियोगिता में बच्चे अपनी कल्पना से मां नंदा और सुनंदा के सुंदर चित्र बनाएंगे। इसके अतिरिक्त, कुमाऊं की पारंपरिक ऐपन कला की अनूठी झलक भी देखने को मिलेगी। ऐपन कला में गेरू और पिसे हुए चावल के घोल का उपयोग करके फर्श और दीवारों पर बेहद खूबसूरत आकृतियां बनाई जाती हैं, जो समृद्धि और देवी के आगमन का प्रतीक मानी जाती हैं। बेटी की विदाई का भावुक और दिव्य अनुष्ठान कुमाऊं की संस्कृति में मां नंदा और सुनंदा को केवल देवी के रूप में ही नहीं पूजा जाता, बल्कि उन्हें अपने घर की लाडली बेटी की तरह माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, अष्टमी के दिन दोनों माताएं स्वर्गलोक से धरती पर अपने मायके आती हैं और पूरे तीन दिनों तक यहां निवास करती हैं। इन तीन दिनों में पूरा मायका अपनी बेटियों की सेवा और आवभगत में लीन रहता है। इसके बाद चौथे दिन माहौल में एक भावुकता छा जाती है, जब मां नंदा और सुनंदा को एक शादीशुदा बेटी की तरह ससुराल के लिए विदा किया जाता है। इस विदाई के अवसर पर माता के भव्य डोले को पूरे नगर में घुमाया जाता है, ताकि सभी नगरवासी उनके अंतिम दर्शन कर आशीर्वाद ले सकें। अंत में डोले को किसी पवित्र जल स्रोत में विसर्जित किया जाता है। देहरादून में भी इसी दिव्य परंपरा का निर्वहन किया जाएगा और 23 सितंबर को डोले के विसर्जन के साथ ही इस उत्सव का विधि-विधान से समापन होगा। गढ़वाल और कुमाऊं के बीच आपसी भाईचारे की मिसाल बबीता साह लोहनी ने बताया कि यह महोत्सव अब केवल कुमाऊं समुदाय तक सीमित नहीं रह गया है। गढ़ी कैंट में आयोजित होने वाले इस उत्सव में गढ़वाल क्षेत्र के निवासी भी बड़े उत्साह के साथ भाग लेते हैं। यह आयोजन उत्तराखंड के दोनों प्रमुख क्षेत्रों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रहा है। देहरादून के मैदानी इलाकों में रहने वाले प्रवासियों के लिए यह पहाड़ों की इस समृद्ध और प्राचीन परंपरा से रूबरू होने का एक बेहतरीन जरिया बन गया है, जो आपसी प्रेम और सांस्कृतिक एकता को और अधिक मजबूत कर रहा है। इसका आप पर असर इस सांस्कृतिक उत्सव के देहरादून में आयोजन से स्थानीय प्रवासियों और युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का सीधा अवसर मिलेगा। - सांस्कृतिक सुगमता: देहरादून में रहने वाले कुमाऊंनी प्रवासियों को अब उत्सव के लिए अपने पैतृक गांव जाने की मजबूरी नहीं होगी। इससे उनका समय और यात्रा पर होने वाला खर्च बचेगा। - युवाओं को ज्ञान: नई पीढ़ी के बच्चे खेल और कला प्रतियोगिताओं के माध्यम से प्राचीन ऐपन कला और लोक नृत्यों को करीब से सीख पाएंगे। इससे महान हिमालयी विरासत को शहरी क्षेत्रों में भी जीवित रखने में मदद मिलेगी। - सामुदायिक सद्भाव: गढ़ी कैंट में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों के लोग एक साथ शामिल हो रहे हैं। इससे प्रवासियों के बीच आपसी भाईचारा और सामाजिक नेटवर्क मजबूत होगा। - स्थानीय कलाकारों को मंच: लोक कलाकारों को बड़े शहर में अपनी नृत्य और वादन प्रतिभा दिखाने का नया अवसर मिला है। यह उनके पारंपरिक कौशल को बढ़ावा देने और नया दर्शक वर्ग तैयार करने में मदद करेगा। ऐसा क्यों हुआ यह सांस्कृतिक महोत्सव पर्वतीय क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन और अपनी पारंपरिक विरासत को सहेजने की भावनात्मक आवश्यकता के कारण शुरू हुआ है। - पलायन और सांस्कृतिक शून्यता: पहाड़ों से बड़ी संख्या में लोग काम और शिक्षा के सिलसिले में देहरादून आकर बस गए हैं। त्योहारों के समय अपने मूल गांवों में न पहुंच पाने के कारण वे अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से दूर हो रहे थे, जिसकी कमी बबीता साह को महसूस हुई। - 200 साल पुरानी विरासत का संरक्षण: मां नंदा और सुनंदा की पूजा का इतिहास 200 वर्षों से अधिक पुराना है। इस समृद्ध धरोहर को नई पीढ़ी के मन में जीवित रखना भी एक बड़ा कारण रहा है। - धार्मिक आस्था और कुलदेवी पूजा: कुमाऊं क्षेत्र के लोगों में मां नंदा-सुनंदा को कुलदेवी और अपनी बेटी के रूप में पूजने की गहरी आस्था है। इसी धार्मिक भावना के चलते प्रवासियों ने मिलकर राजधानी में इस पावन आयोजन की शुरुआत की। सवाल-जवाब 1. देहरादून में मां नंदा-सुनंदा महोत्सव कब से कब तक आयोजित किया जा रहा है? यह महोत्सव देहरादून में 15 सितंबर से शुरू हो चुका है और 23 सितंबर तक चलेगा। 2. इस महोत्सव को देहरादून में शुरू करने का श्रेय किसे जाता है? इस महोत्सव को शुरू करने का श्रेय कुमाऊं की बेटी बबीता साह लोहनी को जाता है, जिन्होंने कुर्मांचल एवं सांस्कृतिक कल्याण परिषद के सहयोग से इसकी शुरुआत की। 3. मां नंदा और सुनंदा की मूर्तियां किन चीजों से बनाई जाती हैं? इन देव प्रतिमाओं को केले के पेड़ के तने, रुई, कपड़े और बांस की मदद से कछुए के आसन पर विराजमान करके बनाया जाता है। 4. महोत्सव के दौरान बच्चों के लिए कौन सी प्रतियोगिताएं आयोजित होंगी? महोत्सव के दौरान बच्चों के लिए फैंसी ड्रेस और चित्रकला प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी, जिसमें कुमाऊं की पारंपरिक ऐपन कला की झलक भी दिखेगी। 5. मां नंदा-सुनंदा को लेकर मायके और ससुराल की क्या मान्यता है? मान्यता है कि अष्टमी के दिन दोनों माताएं स्वर्ग से अपने मायके आती हैं और तीन दिन रहने के बाद चौथे दिन उन्हें विदा कर डोले का विसर्जन किया जाता है। प्रेरणा और सबक बबीता साह लोहनी की यह यात्रा दर्शाती है कि कैसे एक व्यक्ति की पहल पूरे समाज को अपनी जड़ों से जोड़ सकती है। - सांस्कृतिक सक्रियता: परंपराओं की कमी पर केवल पछतावा करने के बजाय बबीता साह ने सक्रिय प्रयास किया। यह सिखाता है कि अगर हम अपनी विरासत को खोना नहीं चाहते, तो हमें खुद आगे आकर पहल करनी होगी। - सामुदायिक सहयोग की शक्ति: बबीता ने कुर्मांचल परिषद को जोड़कर एक व्यक्तिगत सोच को जन आंदोलन में बदला। सामूहिक प्रयास हमेशा बड़े बदलाव लाने में सहायक होते हैं। - सद्भाव और समावेश: इस महोत्सव में गढ़वाल के लोगों को भी शामिल करके आयोजकों ने दिखाया कि सांस्कृतिक उत्सव कैसे क्षेत्रीय दूरियों को मिटाकर एकता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। https://trendkia.com/uttarakhand/dehradun-men-jivnta-hui-kumaon-ki-sadiyon-purani-parnpara-babita-sah-lohani-ke-prayason-se-sajane-laga-man-nanda-sunanda-ka-daraba-32693 TrendKia — Har trend, sabse pehle.