दिवाली पूजन के लिए श्री यंत्र का चयन कैसे करें, जानिए 16D स्वरूप और धातु से जुड़े जरूरी नियम दिवाली पर मां लक्ष्मी की कृपा और सकारात्मक ऊर्जा के लिए श्री यंत्र की स्थापना का विशेष महत्व माना गया है। ज्योतिषी अखिलेश पांडेय के अनुसार सही बनावट, धातु और 16D स्वरूप का चयन पूजा का पूर्ण फल दिलाता है। दिपावली का पावन पर्व धन, वैभव और मां लक्ष्मी के स्वागत के उल्लास से जुड़ा हुआ है। इस खास अवसर पर घरों में स्वच्छता, दीप प्रज्वलन और विधि-विधान से पूजन के साथ कई श्रद्धालु अपने पूजा स्थल में श्री यंत्र की स्थापना भी करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधिपूर्वक श्री यंत्र स्थापित कर नित्य आराधना करने से परिवार में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। हालांकि, बाजार में उपलब्ध यंत्रों के विभिन्न स्वरूपों के बीच अपनी पूजा के लिए उचित और शुद्ध यंत्र का चयन करना बेहद महत्वपूर्ण कदम होता है। श्री यंत्र की ज्यामितीय बनावट और इसका धार्मिक महत्व ज्योतिषी अखिलेश पांडेय के अनुसार श्री यंत्र को साक्षात देवी लक्ष्मी का अलौकिक प्रतीक माना जाता है। इसकी संरचना एक अत्यंत विशिष्ट ज्यामितीय विन्यास पर आधारित होती है, जो विभिन्न त्रिकोणों के आपस में मिलने से पूर्ण होती है। इसमें मूल रूप से नौ परस्पर जुड़े हुए त्रिकोण निर्मित होते हैं, जिनका सम्मिलन एक अद्भुत और दिव्य आकृति को जन्म देता है। सनातन परंपरा में यह आकृति केवल एक धातु का टुकड़ा न होकर खुशहाली, संपदा और समग्र कल्याण का प्रमुख आधार मानी गई है। निरंतर इसकी साधना करने से घर के भीतर सकारात्मक स्पंदन बढ़ते हैं, जिससे गृह क्लेश दूर होते हैं और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी कारण से दिवाली की शुभ बेला पर लोग अपने प्रतिष्ठानों और पूजा घरों में इसे विशेष तौर पर स्थापित करते हैं। पिरामिड आकार का 16D श्री यंत्र और देवी-देवताओं का वास व्यावसायिक बाजारों में कई तरह के यंत्र उपलब्ध रहते हैं, परंतु 16D श्री यंत्र को माता लक्ष्मी का अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप माना गया है। इसकी त्रिविमीय संरचना पिरामिड के समान दिखाई देती है, जिसमें क्रमिक रूप से कई खाने या खंड निर्मित होते हैं। इस बनावट की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके प्रत्येक खंड का अपना विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व निर्धारित है और हर भाग अलग-अलग देवी-देवताओं की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है। संरचना के शिखर यानी सबसे ऊपरी खंड में शिवलिंग की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में उपासना की जाती है। इसके अलावा नीचे के अन्य खंडों में सृष्टि के पालक भगवान विष्णु और रचयिता ब्रह्मा जी के पूजन का विधान स्पष्ट किया गया है। मान्यता के अनुसार इस संपूर्ण स्वरूप में 16 कोटि देवी-देवताओं की सामूहिक उपस्थिति मानी जाती है, जिससे इस एक यंत्र की आराधना से समस्त दिव्य शक्तियों का अनुग्रह एक साथ प्राप्त हो जाता है। यही वजह है कि इसे देवी लक्ष्मी का प्रत्यक्ष 16D रूप भी कहा जाता है। स्फटिक और तांबे के यंत्र की स्थापना के सही नियम मां लक्ष्मी की विशेष अनुकंपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए स्फटिक से निर्मित श्री यंत्र को अत्यंत फलदायी और शुभ माना गया है। पूजन के दौरान स्फटिक के इस यंत्र को चांदी की सुंदर प्लेट में सुसज्जित करके स्थापित करने की सलाह दी जाती है, जिससे उसकी ऊर्जा और पवित्रता बनी रहती है। वहीं दूसरी ओर, तांबे पर मढ़े हुए श्री यंत्र को घर के मुख्य मंदिर, धन रखने वाली तिजोरी या फिर किसी प्रमुख दीवार के सामने प्रतिष्ठित करना अनुकूल माना गया है। सही स्थान और उपयुक्त धातु का यह चयन घर में शांति और बरकत को बनाए रखने में सहायक होता है। इसका आप पर असर दिवाली पर श्री यंत्र की स्थापना करने वाले श्रद्धालुओं के लिए सही ज्यामिति, स्वरूप और धातु का चयन सबसे आवश्यक माना गया है। • खरीदारी में सावधानी: बाजार में कई तरह के यंत्र मिलते हैं, इसलिए नौ जुड़े हुए त्रिकोणों वाली शुद्ध ज्यामिति देखकर ही चयन करें। सही बनावट वाला यंत्र ही धार्मिक नियमों के अनुसार फलदायी माना जाता है। • 16D स्वरूप का चयन: पिरामिड जैसी त्रिआयामी बनावट वाला 16D श्री यंत्र घर में सभी देवताओं की सामूहिक ऊर्जा का केंद्र बनता है। इसे स्थापित करने से एक साथ 16 कोटि देवी-देवताओं के पूजन का पुण्य मिलता है। • धातु का सही चुनाव: स्फटिक यंत्र को चांदी की प्लेट पर रखकर पूजने का नियम बताया गया है। इससे पवित्रता बनी रहती है और घर में शांति का वातावरण तैयार होता है। • स्थापना स्थल का ध्यान: तांबे पर मढ़ा गया श्री यंत्र घर के मंदिर, अलमारी या तिजोरी के पास रखने की सलाह दी गई है। उचित स्थान पर रखने से सकारात्मक ऊर्जा और बरकत में वृद्धि होती है। ऐसा क्यों हुआ दिवाली के दिन मां लक्ष्मी की पूजा के साथ श्री यंत्र की स्थापना को सुख, शांति और समृद्धि आकर्षित करने का मुख्य साधन माना जाता है। • धार्मिक मान्यता और ऊर्जा प्रवाह: श्री यंत्र को देवी लक्ष्मी का साक्षात ज्यामितीय स्वरूप माना गया है। नौ आपस में जुड़े त्रिकोणों की आकृति घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और अशांति को समाप्त करती है। • 16D बनावट का आध्यात्मिक आधार: पिरामिड नुमा 16D यंत्र में अनेक खंड बने होते हैं जो विभिन्न शक्तियों से जुड़े हैं। इसके शिखर पर शिवलिंग और अन्य खानों में ब्रह्मा जी तथा भगवान विष्णु का वास माना जाता है। • 16 कोटि देवी-देवताओं का संयोजन: प्राचीन मान्यताओं के मुताबिक इस विशिष्ट यंत्र में 16 कोटि देवताओं का वास होता है। इसी कारण दिवाली के पावन अवसर पर एक साथ सभी दैवीय शक्तियों का आशीष पाने के लिए इसे प्रतिष्ठित किया जाता है। सवाल-जवाब 1. श्री यंत्र में कुल कितने त्रिकोण आपस में जुड़े होते हैं? श्री यंत्र में नौ आपस में जुड़े हुए त्रिकोण होते हैं, जो मिलकर एक विशेष ज्यामितीय आकृति का निर्माण करते हैं। 2. 16D श्री यंत्र का आकार कैसा होता है? 16D श्री यंत्र की बनावट पिरामिड जैसी होती है, जिसमें कई खंड या खाने बने होते हैं। 3. 16D श्री यंत्र के सबसे ऊपरी हिस्से में किसकी पूजा की जाती है? इस यंत्र के सबसे ऊपर वाले खंड में शिवलिंग के रूप में पूजा करने का विधान है। 4. स्फटिक के श्री यंत्र को किस तरह स्थापित करना शुभ माना गया है? स्फटिक से बने श्री यंत्र को चांदी की प्लेट पर रखकर पूजा करना सबसे अच्छा और शुभ माना जाता है। 5. तांबे के श्री यंत्र को घर में कहां स्थापित करना चाहिए? तांबे पर मढ़े श्री यंत्र को घर के मंदिर, तिजोरी या दीवार के सामने स्थापित करने की सलाह दी जाती है। https://trendkia.com/uttarakhand/divali-pujana-ke-lie-shri-yantra-ka-chayana-kaise-karen-janie-16d-svarupa-aura-dhatu-se-jure-jaruri-niyama-55779 TrendKia — Har trend, sabse pehle.