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  "title": "हरिद्वार की ढाई सौ साल पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला, जहां आज भी मामूली शुल्क पर मिलती है शरण",
  "summary": "हरिद्वार में हर की पौड़ी के नजदीक स्थित सेठ सूरजमल धर्मशाला करीब ढाई सौ साल पुरानी है। ब्रिटिश काल में बनी इस ऐतिहासिक इमारत में आज भी यात्रियों से कोई व्यावसायिक किराया नहीं लिया जाता है।",
  "content": "उत्तराखंड के प्रमुख शहर हरिद्वार में प्राचीन काल की कई निशानियां आज भी अपनी खास पहचान के साथ मौजूद हैं। हर की पौड़ी के करीब अपर रोड पर स्थित सेठ सूरजमल धर्मशाला इन्हीं पुरानी और महत्वपूर्ण विरासतों में गिनी जाती है। करीब ढाई सौ साल पुरानी इस इमारत को उस समय की संस्कृति और वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना माना जाता है।\n\nयह पुरानी धर्मशाला प्रसिद्ध हर की पौड़ी से सिर्फ 300 मीटर की दूरी पर मुख्य रास्ते पर ही बनी हुई है और हरिद्वार नगर कोतवाली से लगभग 100 मीटर आगे स्थित है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान एक परोपकारी सेठ ने इस बड़े भवन को बनवाया था ताकि दूर-दराज के इलाकों से पैदल या बैलगाड़ियों के जरिए गंगा स्नान और धार्मिक कार्यों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को सुरक्षित रहने की जगह मिल सके।\n\nपुराने समय में तीर्थयात्रा को भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर मानसिक शांति और साधना का साधन माना जाता था। उस दौर की वास्तुकला को दर्शाती यह इमारत आज भी अपनी सादगी और पुरानी मर्यादाओं को पूरी तरह से बचाकर रखती है। यहां आने वाले लोग आधुनिक सुविधाओं की परवाह किए बिना जमीन पर आराम करते थे और अपनी धार्मिक यात्रा पूरी करते थे।\n\nइस ढाई सौ साल पुरानी इमारत में कुल 53 कमरे बने हुए हैं जिनकी बनावट पुराने समय की याद ताजा कराती है। इस जगह ठहरने के नियम काफी सख्त और अनुशासित हैं क्योंकि यहां केवल परिवार के साथ आने वाले श्रद्धालुओं को ही कमरे दिए जाते हैं। किसी भी अकेले या बिना परिवार के पहुंचे यात्री को यहां रहने की अनुमति नहीं दी जाती है।\n\nधर्मशाला के मैनेजर श्रीनिवास पांडे बताते हैं कि व्यवस्था को ठीक रखने के लिए परिसर के खुलने और बंद होने का समय तय किया गया है। इस जगह की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह आज भी पूरी तरह से सेवा की भावना से चलाई जाती है। यहां आने वाले लोगों से कोई भी व्यावसायिक किराया नहीं वसूला जाता है, बल्कि केवल बिजली और पानी के खर्च के तौर पर प्रति व्यक्ति 100 या 120 रुपए ही लिए जाते हैं।\n\nश्रीनिवास पांडे ने आगे बताया कि इस ऐतिहासिक भवन की स्थिति और इसके आसपास का नजारा बेहद खूबसूरत है। शिवालिक पहाड़ियों के करीब होने की वजह से इसकी छत से आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य साफ दिखाई देता है। यहां की छत से ऊंची पहाड़ियों पर स्थित मां मनसा देवी और दूसरी तरफ सिद्धपीठ मां चंडी देवी के दर्शन बहुत ही स्पष्ट रूप से होते हैं।\n\nआज के समय में आधुनिक होटलों की चकाचौंध के बीच सेठ सूरजमल धर्मशाला तीर्थयात्रा के असली रूप को जीवित रखे हुए है। यह ब्रिटिश कालीन इमारत हरिद्वार के गौरवशाली इतिहास को दिखाने के साथ-साथ उस पुरानी भारतीय परंपरा की भी याद दिलाती है जहां निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म माना जाता था।\n\nइसका आप पर असर\nहरिद्वार आने वाले पारंपरिक तीर्थयात्रियों और परिवारों के लिए यह ऐतिहासिक धर्मशाला बेहद किफायती और सुरक्षित ठहरने का विकल्प प्रदान करती है।\n\n• भारत में: देश के विभिन्न हिस्सों से हरिद्वार आने वाले आम परिवारों को बहुत कम खर्च में रहने की सुविधा मिलती है। इससे बजट यात्रियों को महंगे होटलों पर पैसे खर्च नहीं करने पड़ते हैं।\n• उत्तराखंड में: हरिद्वार क्षेत्र में आने वाले श्रद्धालु इस पुरानी व्यवस्था के जरिए केवल बिजली-पानी के मामूली खर्च पर सुरक्षित आश्रय पा सकते हैं। यह जगह केवल परिवारों के लिए होने के कारण यहां पारिवारिक माहौल बना रहता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सेठ सूरजमल धर्मशाला कहां स्थित है?\nयह धर्मशाला हरिद्वार में हर की पौड़ी से लगभग 300 मीटर पहले अपर रोड पर मुख्य मार्ग पर स्थित है।\n\n2. यह धर्मशाला कितनी पुरानी है?\nयह ऐतिहासिक इमारत लगभग ढाई सौ साल पुरानी है जिसका निर्माण ब्रिटिश काल में हुआ था।\n\n3. यहां ठहरने के लिए कितना शुल्क लिया जाता है?\nयहां कोई व्यावसायिक किराया नहीं लिया जाता है, बल्कि बिजली और पानी के खर्च के रूप में प्रति व्यक्ति केवल 100 या 120 रुपए लिए जाते हैं।\n\n4. इस धर्मशाला में किसे ठहरने की अनुमति मिलती है?\nइस धर्मशाला में केवल परिवार के साथ आने वाले श्रद्धालुओं को ही कमरे दिए जाते हैं और अकेले यात्रियों को प्रवेश नहीं मिलता है।\n\n5. धर्मशाला के मैनेजर कौन हैं?\nइस ऐतिहासिक धर्मशाला के मैनेजर श्रीनिवास पांडे हैं।\n\n6. धर्मशाला की छत से कौन से मंदिर दिखाई देते हैं?\nइसकी छत से मां मनसा देवी और सिद्धपीठ मां चंडी देवी के दर्शन साफ रूप से होते हैं।",
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  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-09-04",
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