{
  "type": "article",
  "title": "हरिद्वार के घाटों पर गंगनहर बंदी से जल संकट, अंग्रेजों के साथ बने 1916 के समझौते का नहीं हो रहा पालन",
  "summary": "दशहरा की रात गंगनहर की वार्षिक बंदी के बाद हरिद्वार के हर की पैड़ी पर गंगा की धारा सूख गई है। 1916 में ब्रिटिश सरकार और पंडित मदन मोहन मालवीय के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते के बावजूद न्यूनतम जल प्रवाह नहीं बनाए रखा जा रहा है।",
  "content": "दशहरा की रात से उत्तरी खंड गंगनहर की वार्षिक रखरखाव बंदी शुरू होते ही हरिद्वार के प्रमुख गंगा घाटों पर जल का संकट पैदा हो गया है। उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा नहर का प्रवाह रोके जाने के बाद पवित्र हर की पैड़ी के ब्रह्मकुंड सहित कई प्रमुख घाटों पर गंगा की धारा पूरी तरह सूख चुकी है। देश और विदेश से पिंडदान, तर्पण, अस्थि विसर्जन और मुंडन जैसे आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने पहुंचे हजारों तीर्थयात्रियों को इस स्थिति के कारण भारी निराशा का सामना करना पड़ रहा है। बहते हुए पवित्र गंगाजल के स्थान पर घाटों पर केवल रुका हुआ और मटमैला पानी दिखाई दे रहा है, जिससे धार्मिक परंपराओं को निभाना अत्यंत कठिन हो गया है।\n\nऐतिहासिक समझौता और न्यूनतम जल प्रवाह का नियम\nगंगनहर की वार्षिक बंदी के दौरान भी हर की पैड़ी पर जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक शताब्दी पुराना ऐतिहासिक समझौता मौजूद है। इस समझौते के प्रावधानों के तहत गंगनहर का रखरखाव कार्य चलने के दौरान भी हर की पैड़ी की मुख्यधारा में कम से कम 1000 क्यूसेक जल का निरंतर और अविरल प्रवाह बनाए रखना अनिवार्य किया गया था। हालांकि, स्थानीय तीर्थ पुरोहितों का आरोप है कि सिंचाई विभाग की लापरवाही के कारण इस निर्धारित मानक का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।\n\nगंगा सभा से जुड़े पुरोहित पंडित कौशल सिखोला का कहना है कि प्रशासन और सिंचाई विभाग की इस अनदेखी के चलते हर वर्ष श्रद्धालुओं को ऐसी ही विकट परिस्थिति से जूझना पड़ता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा का जल स्वतंत्र और प्रवाही होना आवश्यक है, क्योंकि स्थिर या जमा हुए पानी में किए गए धार्मिक कर्मकांड शास्त्र सम्मत नहीं माने जाते।\n\n1914 का आंदोलन और अंग्रेजों की योजना का विरोध\nइस पूरे विवाद की जड़ें वर्ष 1914 के उस ऐतिहासिक दौर से जुड़ी हुई हैं, जब तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने हर की पैड़ी पर बांध बनाकर गंगा की प्राकृतिक धारा को पूरी तरह रोकने की योजना बनाई थी। उस समय हरिद्वार के तीर्थ पुरोहितों का कोई औपचारिक या पंजीकृत संगठन नहीं था, फिर भी पंडा समाज और स्थानीय पुरोहितों ने एकजुट होकर अंग्रेजों की इस मंशा का कड़ा विरोध शुरू कर दिया। पुरोहितों का स्पष्ट तर्क था कि बहती गंगा धारा के बिना सनातन परंपरा के अनुसार कोई भी धार्मिक कार्य या अस्थि प्रवाह संभव नहीं हो सकता।\n\nअंग्रेज अधिकारी अपनी योजना पर अड़े रहे और कई महीनों तक बातचीत बेनतीजा रही। गतिरोध को समाप्त करने और इस जनआंदोलन को दिशा देने के लिए बनारस से महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को हरिद्वार आमंत्रित किया गया। उनके आगमन के बाद इस विरोध प्रदर्शन ने एक व्यापक राष्ट्रीय रूप धारण कर लिया।\n\nदो साल लंबा संघर्ष और 1916 का ब्रिटिश समझौता\nपंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में यह आंदोलन वर्ष 1914 से 1916 तक लगभग दो वर्षों तक लगातार चला। इस दौरान देशभर के विभिन्न रजवाड़ों, राजा-महाराजाओं और सनातन धर्म के अनुयायियों ने इस आंदोलन को अपना भरपूर नैतिक और वित्तीय समर्थन प्रदान किया। बढ़ते जनदबाव और व्यापक विरोध के आगे आखिरकार ब्रिटिश सरकार को झुकने पर मजबूर होना पड़ा।\n\nतत्कालीन वरिष्ठ ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी सर जेम्स मेस्टन ने तीर्थ पुरोहितों के प्रतिनिधियों के साथ वार्ता की और एक आधिकारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में यह स्पष्ट गारंटी दी गई थी कि गंगनहर की वार्षिक मरम्मत या बंदी के दौरान भी हर की पैड़ी पर जल का स्तर कम से कम दो फीट हमेशा बना रहेगा और 1000 क्यूसेक पानी अनवरत बहता रहेगा।\n\nगंगा सभा का गठन और वर्तमान की अवहेलना\nहर की पैड़ी की संपूर्ण व्यवस्था, स्वच्छता और धार्मिक मर्यादाओं की देखरेख के उद्देश्य से पंडित मदन मोहन मालवीय ने वर्ष 1916 में गंगा सभा नामक संस्था की स्थापना की थी। तब से लेकर आज तक गंगा सभा घाटों की देखरेख और श्रद्धालुओं की सुविधाओं का ध्यान रखती आ रही है।\n\nहालांकि, वर्तमान परिस्थितियों पर चिंता जताते हुए पंडित कौशल सिखोला ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग अक्सर इस ऐतिहासिक दस्तावेज और समझौते का उल्लंघन करता है। हर वर्ष गंगनहर बंदी के दौरान घाटों पर पानी घटा दिया जाता है, जिससे देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं को भारी असुविधा होती है। पुरोहितों ने मांग की है कि अंग्रेजों के समय तय की गई व्यवस्था का कड़ाई से पालन कराया जाए ताकि हर की पैड़ी की पवित्र धारा कभी न सूखे।\n\nइसका आप पर असर\nगंगनहर की वार्षिक बंदी के कारण हरिद्वार में श्रद्धालुओं के धार्मिक कर्मकांड प्रभावित हो रहे हैं।\n\n• भारत भर में श्रद्धालुओं के लिए: त्योहारों के बाद हरिद्वार में पिंडदान, तर्पण और मुंडन कराने आने वाले श्रद्धालुओं को घाटों पर पानी न होने से कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। बहते पानी के अभाव में धार्मिक अनुष्ठान शास्त्र सम्मत तरीके से करने में असुविधा होगी।\n• हरिद्वार में: स्थानीय तीर्थ पुरोहितों, पंडा समाज और पर्यटन पर निर्भर कारोबारियों के कामकाज पर विपरीत असर पड़ रहा है। घाटों पर गंदे और ठहरे हुए पानी से स्वच्छता से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न होने की आशंका है।\n• प्रशासनिक जवाबदेही: उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग पर ऐतिहासिक समझौतों और नियमों के तहत 1000 क्यूसेक न्यूनतम जल छोड़ने का दबाव बढ़ेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nउत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा नहरों की वार्षिक सफाई और मरम्मत के लिए गंगनहर का प्रवाह रोका गया है, जिससे घाटों में जल का संकट उत्पन्न हुआ है।\n\n• नहर का वार्षिक रखरखाव: हर साल दशहरा के बाद गंगनहर के उत्तरी खंड को गाद निकालने और मरम्मत के लिए बंद किया जाता है, जिससे मुख्य धारा में जल स्तर गिर जाता है।\n• समझौते की अवहेलना: 1916 के ब्रिटिश काल के ऐतिहासिक समझौते के तहत हर की पैड़ी पर कम से कम 1000 क्यूसेक पानी का निरंतर प्रवाह अनिवार्य है, जिसका सिंचाई विभाग द्वारा पूर्णतः पालन नहीं किया जा रहा है।\n• प्रशासनिक अव्यवस्था: नहर बंदी के समय पानी का वैकल्पिक आवंटन सही ढंग से प्रबंधित न होने के कारण पवित्र धाराएं सूख जाती हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. हरिद्वार के घाटों पर पानी कम क्यों हो गया है?\nउत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने वार्षिक रखरखाव और गाद सफाई के लिए दशहरा की रात से उत्तरी खंड गंगनहर की बंदी शुरू कर दी है, जिससे घाटों पर पानी की कमी हो गई है।\n\n2. 1916 का ऐतिहासिक समझौता क्या है?\n1916 में पंडित मदन मोहन मालवीय और ब्रिटिश अधिकारी सर जेम्स मेस्टन के बीच हुए समझौते के अनुसार, गंगनहर की वार्षिक बंदी के दौरान भी हर की पैड़ी पर कम से कम 1000 क्यूसेक पानी और 2 फीट गहराई बनी रहना अनिवार्य है।\n\n3. गंगा सभा की स्थापना किसने और क्यों की थी?\nपंडित मदन मोहन मालवीय ने वर्ष 1916 में हर की पैड़ी की व्यवस्था, स्वच्छता और धार्मिक मर्यादाओं की देखरेख के लिए गंगा सभा का गठन किया था।\n\n4. घाटों पर पानी न होने से श्रद्धालुओं को क्या परेशानी हो रही है?\nबहती गंगा धारा न होने के कारण श्रद्धालु पिंडदान, तर्पण, अस्थि विसर्जन और मुंडन जैसे जरूरी धार्मिक अनुष्ठान सही तरीके से संपन्न नहीं कर पा रहे हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/uttarakhand/haridwar-ke-ghaton-para-gnganahara-bndi-se-jala-snkata-angrejon-ke-satha-bane-1916-ke-samajhaute-ka-nahin-ho-raha-palana-52701",
  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-10-28",
  "tags": [
    "हरिद्वार",
    "हर की पैड़ी",
    "गंगनहर बंदी",
    "गंगा सभा",
    "पंडित मदन मोहन मालवीय",
    "उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}