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  "title": "हरिद्वार के मोती बाजार में देसी घी के समोसे और पारंपरिक मिठाइयों की महक, ब्रिटिश काल से कायम है स्वाद की यह विरासत",
  "summary": "हर की पौड़ी से कुछ ही दूरी पर स्थित सौ साल पुरानी दुकान अपने शुद्ध देसी घी में तैयार समोसों, चंद्रकला और खास मिठाइयों के लिए आज भी श्रद्धालुओं की पहली पसंद बनी हुई है.",
  "content": "तीर्थनगरी हरिद्वार में गंगा दर्शन और पवित्र स्नान के बाद अक्सर श्रद्धालुओं के कदम शहर की ऐतिहासिक गलियों और पारंपरिक खानपान के ठिकानों की ओर मुड़ जाते हैं. धार्मिक अनुष्ठानों के समापन के पश्चात जब सात्विक और लजीज भोजन की इच्छा जागती है, तो स्थानीय बाजारों की पुरानी दुकानें अपनी अनोखी महक से भक्तों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं. हरिद्वार का स्वाद उसकी सदियों पुरानी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी वही प्रामाणिक जायका आज भी सुरक्षित रखा गया है. हर की पौड़ी पर आस्था की डुबकी लगाने वाले देश के कोने-कोने से पहुंचे तीर्थयात्रियों के लिए यह पारंपरिक खानपान यात्रा का एक अनिवार्य अनुभव बन जाता है.\n\nमोती बाजार की संकरी गलियों में एक सदी का इतिहास\nप्रसिद्ध हर की पौड़ी घाट से बमुश्किल दस मिनट पैदल चलकर जब बड़ा बाजार को पार करते हैं, तो आगे मोती बाजार का जीवंत इलाका शुरू होता है. इसी मोती बाजार की पतली गलियों के बीच ठंडे कुएं के समीप 'प्राचीन मथुरा वाले' नाम का एक पारंपरिक मिष्ठान भंडार मौजूद है. इस दुकान की शुरुआत ब्रिटिश हुकूमत के दौर में हुई थी और इसने समय के कई उतार-चढ़ाव देखते हुए अपने सफर का एक शतक पूरा कर लिया है. पिछले सौ वर्षों में जहां दुनिया का तौर-तरीका पूरी तरह बदल गया, वहीं इस प्रतिष्ठान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहां समोसे से लेकर सभी तरह की पारंपरिक मिठाइयां आज भी पूरी निष्ठा के साथ शुद्ध देसी घी में ही बनाई जाती हैं.\n\nकाजू-किशमिश और खास चटनी वाले देसी घी के समोसे\nइस ऐतिहासिक दुकान पर तैयार होने वाले नमकीन व्यंजनों में शुद्ध देसी घी के समोसे सबसे ज्यादा मांग में रहते हैं. कड़ाही से गरमा-गरम छनकर निकलने वाले इन समोसों के अंदर आलू की विशेष मसालेदार पिट्ठी के साथ भरपूर मात्रा में काजू और किशमिश भरा जाता है. देसी घी में तलने के कारण इनकी बाहरी परत बेहद कुरकुरी होती है, जिसमें भारीपन के बजाय शुद्धता का एहसास मिलता है. इन समोसों को प्रतिष्ठान की खास ताजी चटनी के साथ परोसा जाता है, जो इसके जायके को और अधिक चटपटा और संतुलित बना देती है. सुबह से लेकर शाम तक इस खास स्वाद को चखने के लिए दूर-दराज से आए लोगों का तांता लगा रहता है.\n\nचाशनी में डूबी चंद्रकला और मावे की मिठास\nमिठाइयों की श्रेणी में 'प्राचीन मथुरा वाले' की चंद्रकला सबसे ज्यादा लोकप्रिय और सराही जाने वाली पेशकश है. शुद्ध देसी घी में धीमी आंच पर तैयार की जाने वाली चंद्रकला की ऊपरी परत खस्ता और कुरकुरी होती है. इसके भीतरी हिस्से में शुद्ध मावा, केसर के धागे और बारीक कटे सूखे मेवों का समृद्ध मिश्रण भरा जाता है. चाशनी की सौंधी मिठास में डूबी यह चंद्रकला खाने पर मुंह में घुल जाती है और इसमें केसर तथा मावे का संतुलित स्वाद उभरकर सामने आता है. गंगा दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु न केवल इस मिठाई का यहां आनंद लेते हैं, बल्कि अपने परिजनों और रिश्तेदारों के लिए भी इसे पैक करवाकर साथ ले जाते हैं.\n\nधीमी आंच पर घंटों पकती है सात्विक लौकी की लौज\nसब्जियों और मेवों के मेल से बनने वाली पारंपरिक मिठाइयों में यहां की लौकी की लौज यानी लौकी की मिठाई अपनी ताजगी के लिए जानी जाती है. इसे तैयार करने के लिए ताजी लौकी को शुद्ध मावे और देसी घी के साथ धीमी आंच पर घंटों तक पकाया जाता है, ताकि इसका पानी पूरी तरह सूख जाए और घी की महक भीतर तक समा जाए. इस मिठाई में चीनी की मात्रा बहुत संतुलित रखी जाती है, जिससे लौकी का अपना स्वाभाविक और प्राकृतिक स्वाद खत्म नहीं होता. उपवास और त्योहारों के मौकों पर श्रद्धालु इस शुद्ध और सात्विक मिठाई को पूर्ण विश्वास के साथ खरीदते हैं.\n\nभुने बेसन की सौंधी महक और मुलायम लड्डू\nदुकान पर बेसन से बनने वाली मिठाइयों को भी पारंपरिक विधियों के अनुसार ही कड़ाही में तैयार किया जाता है. शुद्ध देसी घी में धीमी आंच पर लंबे समय तक भुने गए बेसन की सौंधी खुशबू पूरे बाजार में फैल जाती है. बेसन के लड्डू अपनी बनावट और कोमलता के लिए प्रसिद्ध हैं. देसी घी और भुने बेसन का यह मेल इतना कोमल होता है कि लड्डू मुंह में रखते ही घुल जाता है. एक सदी पुरानी यह पाक कला आज भी उसी शुद्धता के साथ जीवित है, जिसके कारण दशकों से ग्राहक इस स्वाद के मुरीद बने हुए हैं.\n\nभगवान गणेश को प्रिय मोदक और विरासत का एहसास\nविघ्नहर्ता भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय माने जाने वाले मोदक भी यहां विशेष रूप से देसी घी और मावे के मिश्रण से बनाए जाते हैं. मोती बाजार की इस प्राचीन दुकान में बनने वाले प्रत्येक पकवान में आज भी वही पुराना ब्रिटिश कालीन स्वाद महसूस किया जा सकता है. सौ वर्षों से अपने स्वाद और शुद्धता के मानकों से कोई समझौता न करने वाली यह दुकान आज केवल एक कारोबारी प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि हरिद्वार के खानपान की एक जीवित विरासत बन चुकी है, जहां पहुंचकर लोग न केवल अपनी भूख शांत करते हैं बल्कि बीते दौर की मिठास को भी महसूस करते हैं.\n\nइसका आप पर असर\nहरिद्वार जाने वाले तीर्थयात्रियों और भोजन के शौकीनों के लिए इस ऐतिहासिक दुकान पर प्रामाणिक और सात्विक खानपान का विकल्प उपलब्ध है.\n\n• भारत में: यदि आप देश के किसी भी हिस्से से हरिद्वार धार्मिक यात्रा पर जा रहे हैं, तो पुरानी विरासत से जुड़े पारंपरिक व्यंजनों की सूची में इसे शामिल कर सकते हैं. यहां बनने वाले व्यंजन पूरी तरह शुद्ध देसी घी में तैयार होते हैं, जिन्हें घर ले जाने के लिए भी पैक करवाया जा सकता है.\n• हरिद्वार में: हर की पौड़ी के निकट मोती बाजार पहुंचने वाले स्थानीय लोग और यात्री पूजा के बाद आसानी से यहां भोजन का आनंद ले सकते हैं. बड़ा बाजार पार करके ठंडे कुएं के पास स्थित इस दुकान तक पैदल पहुंचने में घाट से मात्र दस मिनट का समय लगता है.\n• व्रत रखने वालों के लिए: उपवास के दिनों में शुद्ध और सात्विक फलाहार चाहने वाले श्रद्धालुओं के लिए यहां लौकी की लौज जैसी पारंपरिक मिठाइयां उपलब्ध रहती हैं. इन मिठाइयों में संतुलित मिठास और शुद्ध सामग्री के कारण यह उपवास के दौरान खाने के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं.\n• पारंपरिक स्वाद के पारखियों के लिए: आधुनिक मिलावट से दूर शुद्ध देसी घी के समोसे और काजू-किशमिश की भरावन वाले नमकीन का स्वाद यहां अनुभव किया जा सकता है. चंद्रकला और बेसन के लड्डू जैसी मिठाइयों के जरिए ब्रिटिश दौर की पारंपरिक पाक शैली का अनुभव मिलता है.\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह दुकान अपनी शुरुआत से लेकर आज तक एक सदी का सफर इसलिए तय कर पाई है क्योंकि इसने सामग्री की शुद्धता और निर्माण की मूल पद्धति में कभी बदलाव नहीं किया.\n\n• सामग्री की अटूट शुद्धता: ब्रिटिश काल में जब यह दुकान खुली, तब से लेकर आज तक यहां तेल या वनस्पति घी के बजाय केवल शुद्ध देसी घी का उपयोग किया जाता रहा है. यही कारण है कि बदलते दौर में भी इसकी गुणवत्ता और स्वाद का स्तर कभी नीचे नहीं गिरा.\n• पारंपरिक धीमी आंच की पाक शैली: बेसन की भुनाई और लौकी को मावे के साथ पकाने की प्रक्रिया आज भी घंटों धीमी आंच पर कड़ाही में पूरी की जाती है. मशीनी या तेज प्रक्रिया के बजाय धैर्यपूर्वक पकाने से मिठाइयों की बनावट और सोंधापन बरकरार रहता है.\n• हर की पौड़ी से भौगोलिक निकटता: हर की पौड़ी घाट से पैदल दूरी पर स्थित मोती बाजार तीर्थयात्रियों के मुख्य आवागमन का रास्ता है. गंगा स्नान के तुरंत बाद ताजा और सात्विक नाश्ते की तलाश करने वाले श्रद्धालु स्वाभाविक रूप से यहां पहुंचते हैं.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मोती बाजार में यह ऐतिहासिक दुकान किस नाम से जानी जाती है?\nयह 100 साल पुरानी दुकान 'प्राचीन मथुरा वाले' के नाम से प्रसिद्ध है.\n\n2. यह दुकान हरिद्वार में किस स्थान पर स्थित है?\nयह दुकान हर की पौड़ी से करीब 10 मिनट की पैदल दूरी पर मोती बाजार में ठंडे कुएं के पास स्थित है.\n\n3. यहां मिलने वाले समोसों के अंदर क्या भरा जाता है?\nशुद्ध देसी घी में तले जाने वाले इन समोसों में विशेष आलू की पिट्ठी के साथ काजू और किशमिश भरी जाती है.\n\n4. दुकान की सबसे लोकप्रिय पारंपरिक मिठाई कौन सी है?\nयहां की पारंपरिक चंद्रकला सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, जिसके अंदर मावा, केसर और सूखे मेवे भरे होते हैं.\n\n5. व्रत और उपवास के लिए यहां कौन सी मिठाई विशेष रूप से पसंद की जाती है?\nधीमी आंच पर शुद्ध मावे और देसी घी में बनने वाली लौकी की लौज को श्रद्धालु व्रत के दौरान खूब पसंद करते हैं.\n\n6. भगवान गणेश के प्रिय कौन से व्यंजन यहां मिलते हैं?\nदुकान पर विशेष रूप से शुद्ध देसी घी और मावे से तैयार किए गए मोदक उपलब्ध रहते हैं.",
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  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-09-20",
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