# हरिद्वार में नारायणी शिला पर श्राद्ध कर्म से दोनों कुलों की 100 पीढ़ियों को मिलती है मोक्ष की प्राप्ति

> भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले पितृ पक्ष में हरिद्वार स्थित प्राचीन नारायणी शिला पर तर्पण करने से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/haridwar-men-narayani-shila-para-shraddha-karma-se-donon-kulon-ki-100-pirhiyon-ko-milati-hai-moksha-ki-prapti-43333 · **Language:** Hindi
**Tags:** पितृ पक्ष, हरिद्वार, नारायणी शिला, श्राद्ध कर्म, पिंडदान, भगवान विष्णु, तर्पण, पितृ दोष

भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाले 16 दिवसीय पितृ पक्ष के दौरान हरिद्वार के विभिन्न घाटों और धार्मिक स्थलों पर पूर्वजों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। पितरों के प्रति गहरी आस्था और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किया जाने वाला यह विधान आत्मा की शांति और तृप्ति का मुख्य मार्ग माना जाता है। हिंदू धर्म में पूर्वजों की मुक्ति के लिए कई पवित्र धाम बताए गए हैं, जिनमें हरिद्वार स्थित प्राचीन नारायणी शिला का स्थान अत्यंत विशिष्ट माना जाता है।

## पौराणिक ग्रंथों में नारायणी शिला का धार्मिक महत्व
स्कंद पुराण, वायु पुराण और गरुड़ पुराण जैसे प्राचीन धर्मग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि नारायणी शिला पर किया गया श्राद्ध कर्म पूर्वजों को जन्म और मरण के सांसारिक चक्र से मुक्त कर वैकुंठ धाम का मार्ग प्रशस्त करता है। धार्मिक दृष्टिकोण से गया और बद्रीनाथ धाम की तरह ही हरिद्वार की इस पावन शिला की महत्ता सर्वोपरि मानी गई है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तीर्थराज गया में भगवान श्रीहरि के पावन चरण स्थित हैं, जबकि बद्रीनाथ धाम में प्रभु का ललाट क्षेत्र माना जाता है। इसके विपरीत, हरिद्वार की नारायणी शिला भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक का पवित्र वक्ष स्थल स्वरूप मानी गई है। यही कारण है कि इस शिला पर समर्पित जल और पिंडदान का संकल्प सीधे वैकुंठनाथ के हृदय तक पहुंचता है।

## प्रेत योनि से मुक्ति और पितृ दोष का निवारण
नारायणी शिला के मुख्य पुरोहित मनोज त्रिपाठी के अनुसार, यह शिला साक्षात भगवान नारायण का विग्रह रूप है। चूंकि यह प्रभु का हृदय स्थल है, इसलिए यहां किया गया कोई भी तर्पण सीधे प्रभु को समर्पित होता है। यदि किसी कारणवश परिवार के पूर्वज प्रेत योनि अथवा अन्य कष्टकारी योनियों में भटक रहे हों, तो इस शिला पर वैदिक विधि-विधान से पिंडदान करने पर भगवान विष्णु की विशेष अनुकंपा से उन्हें सभी कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।

## पितृ और मातृ पक्ष की पीढ़ियों का उद्धार
महालय पक्ष के इन पावन दिनों में यदि कोई व्यक्ति पूर्ण निष्ठा, शुचिता और भक्ति भाव से अपने पितरों का श्राद्ध करता है, तो उसके पितृ पक्ष की 100 पीढ़ियों और मातृ पक्ष की 100 पीढ़ियों के सभी दोष समाप्त हो जाते हैं। दोनों कुलों के कुल मिलाकर सैकड़ों पूर्वजों को परम शांति और सद्गति मिलती है। इसके साथ ही, श्रद्धापूर्वक यह अनुष्ठान संपन्न कराने वाले वंशजों को भी अपने जीवनकाल में अक्षय पुण्य, सुख-शांति और अंत में मोक्ष का पावन फल प्राप्त होता है।

## इसका आप पर असर
पितृ पक्ष के दौरान हरिद्वार की नारायणी शिला पर श्राद्ध और तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति और परिवार को पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

- **धार्मिक अनुष्ठान:** भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इन 16 दिनों में श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचकर विशेष तर्पण कर सकते हैं। समय रहते अनुष्ठान संपन्न करने से पूर्वजों की आत्मा को सद्गति मिलती है।
- **पारिवारिक कल्याण:** विधि-विधान से पिंडदान करने पर मातृ और पितृ दोनों पक्षों के कुल दोष शांत होते हैं। इससे परिवार में सुख, शांति और आध्यात्मिक शुचिता का वातावरण बनता है।
- **तीर्थ यात्रा की योजना:** जो लोग पूर्वजों के मोक्ष के लिए गया या बद्रीनाथ जाने की योजना बना रहे हैं, वे हरिद्वार स्थित नारायणी शिला को भी प्रमुखता दे सकते हैं। वहां पहुंचने से पहले स्थानीय पुरोहितों से अनुष्ठान की विधि समझ लेना उपयोगी रहता है।
- **आध्यात्मिक संतुष्टि:** श्रद्धापूर्वक किया गया यह कर्म व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में मानसिक शांति प्रदान करता है। वंशजों को जीते जी पुण्य और मोक्ष का आशीर्वाद मिलता है।

## ऐसा क्यों हुआ
हिंदू धर्मग्रंथों में हरिद्वार की नारायणी शिला को भगवान विष्णु का हृदय स्वरूप माना गया है, जिससे यहां किए गए तर्पण का विशेष फल प्राप्त होता है।

- **पौराणिक विग्रह स्वरूप:** स्कंद, वायु और गरुड़ पुराण के अनुसार यह पावन शिला भगवान विष्णु के कंठ से नाभि तक का हिस्सा है। इसलिए यहां अर्पित किया गया जल और पिंडदान सीधे प्रभु के हृदय तक पहुंचता है।
- **त्रि-तीर्थों का समन्वय:** पौराणिक मान्यताओं के तहत गया में प्रभु के चरण और बद्रीनाथ में ललाट का वास है। हरिद्वार की नारायणी शिला पर भगवान का वक्ष स्थल होने के कारण इसे पितृ मुक्ति का केंद्र माना गया है।
- **प्रेत बाधा का निवारण:** धार्मिक मान्यता है कि यदि कोई पूर्वज अशांत योनि में भटक रहा हो, तो इस शिला पर किए गए श्राद्ध से उसे तत्काल मुक्ति मिल जाती है। मुख्य पुरोहित मनोज त्रिपाठी के अनुसार यह प्रक्रिया दोनों कुलों की 100 पीढ़ियों को तृप्त करती है।

## सवाल-जवाब

### 1. पितृ पक्ष कब से कब तक मनाया जाता है?
पितृ पक्ष का पर्व भाद्रपद पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन माह की अमावस्या तक पूरे 16 दिनों तक चलता है।

### 2. हरिद्वार की नारायणी शिला का धार्मिक महत्व क्या है?
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार नारायणी शिला भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक का विग्रह स्वरूप है, जहां किया गया श्राद्ध सीधे प्रभु के हृदय तक पहुंचता है।

### 3. गया, बद्रीनाथ और नारायणी शिला में क्या अंतर बताया गया है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार गया में भगवान विष्णु के चरण और बद्रीनाथ में ललाट स्थित है, जबकि हरिद्वार की नारायणी शिला पर प्रभु का वक्ष स्थल है।

### 4. नारायणी शिला पर श्राद्ध कर्म करने से कितनी पीढ़ियों का उद्धार होता है?
यहां पूर्ण श्रद्धा से पिंडदान करने पर पितृ पक्ष और मातृ पक्ष दोनों कुलों की 100-100 पीढ़ियों को पितृ दोष से मुक्ति और सद्गति मिलती है।

### 5. किन धर्मग्रंथों में नारायणी शिला का उल्लेख मिलता है?
स्कंद पुराण, वायु पुराण और गरुड़ पुराण सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों में नारायणी शिला की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है।

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