# नैनीताल में कैसे बसा तिब्बत का समुदाय, इंदिरा गांधी को चिट्ठी और पलायन की पूरी दास्तान

> उत्तराखंड के नैनीताल में बसी तिब्बती संस्कृति और तिब्बती मार्केट के पीछे पलायन, इंदिरा गांधी को लिखे पत्र और कड़े संघर्ष का एक लंबा इतिहास जुड़ा है।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/how-the-tibetan-community-settled-in-nainital-from-1959-exodus-to-indira-gandhi-letter-50488 · **Language:** Hindi
**Tags:** नैनीताल, तिब्बती मार्केट, उत्तराखंड इतिहास, तिब्बती समुदाय, इंदिरा गांधी

नैनीताल अपनी मनमोहक झील, प्राकृतिक खूबसूरती और ऐतिहासिक धरोहर के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। हालांकि, इस पर्यटन नगरी की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ पहाड़ी संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां तिब्बती संस्कृति की एक गहरी छाप भी मौजूद है। नैनीताल की मशहूर तिब्बती मार्केट, यहां का कारोबारी इतिहास और तिब्बती समाज का जीवन संघर्ष, विस्थापन और खुद को बचाने की एक दिलचस्प कहानी बयां करता है। भारत और तिब्बत के बीच हिमालय हमेशा से व्यापार, तीर्थयात्रा और सांस्कृतिक मेलजोल का जरिया रहा है। कुमाऊं क्षेत्र का भी तिब्बत के साथ प्राचीन काल से व्यापारिक रिश्ता रहा है, जहां से व्यापारी और यात्री आते-जाते थे। इस ऐतिहासिक जुड़ाव ने ही हिमालयी इलाकों में अलग-अलग संस्कृतियों के घुलने-मिलने का रास्ता साफ किया था।

## साल 1959 के बाद शुरू हुई स्थायी बसावट
नैनीताल में तिब्बती समुदाय के हमेशा के लिए बसने की शुरुआत मुख्य रूप से साल 1959 के बाद हुई। तिब्बत के राजनीतिक हालात बिगड़ने के कारण भारी संख्या में तिब्बती नागरिकों को अपना घर-बार छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद देश के अलग-अलग कोनों में तिब्बती बस्तियां बसने लगीं। नैनीताल भी उन्हीं चुनिंदा जगहों में शामिल रहा, जहां इन परिवारों ने धीरे-धीरे अपनी नई दुनिया बसाई और जिंदगी की शुरुआत की।

## साल 1960 से 1970 के दशक में बढ़ी आबादी
नैनीताल तिब्बती मार्केट फेडरेशन के प्रमुख यशी थुप्तेन के अनुसार, साल 1960 के आसपास कुछ तिब्बती लोग नैनीताल आने लगे थे। शुरुआती दौर में उनका यहां रुकना कुछ समय के लिए ही होता था। वे गर्मियों में यहां रहते और सर्दियों के मौसम में हल्द्वानी, हरिद्वार और धर्मशाला जैसी जगहों पर चले जाते थे। उनके मुताबिक, साल 1960 से 1970 के बीच नैनीताल में इस समुदाय की आबादी और मौजूदगी बढ़ने लगी थी। हालांकि, उस वक्त इन परिवारों के सामने रोजी-रोटी कमाने और स्थाई तौर पर टिके रहने की बड़ी चुनौती थी। शुरुआत में ये लोग घर-घर जाकर ऊनी कपड़े और सामान बेचा करते थे। कई लोग नैनीताल की माल रोड के अलावा भीमताल और भवाली जैसे पास के इलाकों में भी घूम-घूमकर व्यापार करते थे।

## इंदिरा गांधी को खत लिखने के बाद मिली दुकानें
यशी थुप्तेन बताते हैं कि शुरुआती सालों में तिब्बती दुकानदारों को अक्सर स्थानीय प्रशासन से कारोबार करने की इजाजत नहीं मिलती थी। ऐसे में समुदाय के सामने पक्का रोजगार और कारोबार चलाने की व्यवस्था करना बेहद जरूरी हो गया था। इसी मकसद से साल 1970 में उनके पिता ने नैनीताल में तिब्बती यूथ कांग्रेस की एक शाखा की शुरुआत की। उनकी जानकारी के मुताबिक, तिब्बती यूथ कांग्रेस की सबसे पहली शाखा धर्मशाला में खुली थी। इसके बाद नैनीताल के तिब्बतियों ने अपनी स्थायी दुकानों के लिए आवाज उठाई और देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा। यशी थुप्तेन के अनुसार, आगे चलकर साल 1983 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के जरिए तिब्बती समाज के लोगों को दुकानें आवंटित की गईं। इसके बाद से तिब्बती मार्केट में पूरे बारह महीने दुकानें सजने लगीं और लोगों को कमाई का एक पक्का जरिया मिल गया।

## आज भी नैनीताल की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है समुदाय
यशी थुप्तेन के मुताबिक, साल 1983 के दौरान नैनीताल में लगभग 45 तिब्बती परिवार रहते थे। वक्त के साथ इनमें से कुछ परिवार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला और उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों में शिफ्ट हो गए। उनके अनुसार, आज के समय में नैनीताल में लगभग 38 तिब्बती परिवार रह रहे हैं। आज के दौर में यह तिब्बती मार्केट सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं है, बल्कि इस शहर की मिली-जुली संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। यहां की दुकानें इस समुदाय के संघर्ष, कड़ी मेहनत और अपनी संस्कृति को बचाए रखने के जज्बे की कहानी सुनाती हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
नैनीताल में तिब्बती समुदाय के बसने और वहां तिब्बती मार्केट के वजूद में आने के पीछे राजनीतिक उथल-पुथल, प्रशासनिक संघर्ष और अधिकारों की मांग का एक लंबा इतिहास रहा है।

- **राजनीतिक पलायन:** वर्ष 1959 में तिब्बत की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में तिब्बती लोगों को अपना देश छोड़कर भारत आना पड़ा, जिससे देश के कई हिस्सों में उनकी बसावट हुई।
- **आजीविका का संघर्ष:** नैनीताल पहुंचने वाले शुरुआती तिब्बती परिवारों के सामने स्थायी रोजगार का संकट था, जिसके चलते वे सर्दियों में दूसरे शहरों का रुख करते थे और फेरी लगाकर ऊनी कपड़े बेचते थे।
- **प्रशासनिक बाधाएं:** शुरुआती वर्षों में स्थानीय प्रशासन द्वारा दुकानें लगाने की अनुमति न मिलने के कारण समुदाय को स्थायी व्यापार की व्यवस्था के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा।
- **राजनीतिक हस्तक्षेप:** वर्ष 1970 में तिब्बती यूथ कांग्रेस की शाखा बनने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखा गया, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1983 में राज्यपाल के हाथों दुकानें आवंटित की गईं।

## सवाल-जवाब

### 1. नैनीताल में तिब्बती समुदाय की स्थायी बसावट मुख्य रूप से कब शुरू हुई?
नैनीताल में तिब्बती समुदाय की स्थायी बसावट का मुख्य दौर वर्ष 1959 के बाद शुरू हुआ जब तिब्बत में राजनीतिक परिस्थितियों के कारण लोगों को भारत आना पड़ा।

### 2. नैनीताल तिब्बती मार्केट फेडरेशन के अध्यक्ष कौन हैं?
नैनीताल तिब्बती मार्केट फेडरेशन के अध्यक्ष यशी थुप्तेन हैं।

### 3. शुरुआती दौर में तिब्बती परिवारों की आजीविका का साधन क्या था?
शुरुआती दौर में तिब्बती लोग घर-घर जाकर ऊन से बने उत्पाद और कपड़े बेचते थे तथा माल रोड व आसपास के इलाकों में फेरी लगाते थे।

### 4. तिब्बती यूथ कांग्रेस की नैनीताल शाखा की स्थापना कब हुई थी?
नैनीताल में तिब्बती यूथ कांग्रेस की शाखा की स्थापना वर्ष 1970 में यशी थुप्तेन के पिता द्वारा की गई थी।

### 5. तिब्बती समुदाय के लोगों को स्थायी दुकानें कब और किसके द्वारा आवंटित की गईं?
वर्ष 1983 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के हाथों तिब्बती समुदाय के लोगों को दुकानें आवंटित की गईं।

### 6. वर्तमान में नैनीताल में कितने तिब्बती परिवार रह रहे हैं?
वर्तमान में नैनीताल में करीब 38 तिब्बती परिवार निवास कर रहे हैं।

## प्रेरणा और सबक
नैनीताल के तिब्बती समुदाय के संघर्ष और इतिहास से कई प्रेरणादायक बातें सीखी जा सकती हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती हैं।

- **कठिन समय में जुझारूपन:** विस्थापन और अजीविका के संकट के बावजूद तिब्बती समुदाय ने हार नहीं मानी और फेरी लगाकर अपनी शुरुआत की।
- **संगठित होकर प्रयास करना:** अधिकारों की मांग के लिए तिब्बती यूथ कांग्रेस की शाखा स्थापित कर सामूहिक रूप से आवाज उठाई गई।
- **नेतृत्व और संवाद:** तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक अपनी बात पहुंचाकर स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए गए।
- **संस्कृति को जीवित रखना:** संघर्षों के बीच भी अपनी पारंपरिक पहचान और संस्कृति को नई पीढ़ी तक सहेज कर रखा गया।

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