उत्तराखंड का कौसानी दिलाएगा भीड़भाड़ से राहत, महात्मा गांधी ने दिया था भारत के स्विट्जरलैंड का नाम उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित कौसानी प्राकृतिक नजारों और शांत माहौल के लिए प्रसिद्ध है, जहां ऐतिहासिक अनासक्ति आश्रम में रहकर पर्यटक हिमालय की चोटियों का दीदार कर सकते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों में अगर आप सामान्य पर्यटन स्थलों की भीड़ से अलग किसी शांत ठिकाने की तलाश कर रहे हैं, तो बागेश्वर जिले में बसा कौसानी एक बेहतरीन विकल्प साबित होता है। घने जंगलों, दूर तक फैली हरियाली और हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बसा यह खूबसूरत पर्वतीय कस्बा अपनी प्राकृतिक छटा के लिए पहचाना जाता है। इस स्थान की पहचान सिर्फ इसके मौसम और नजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन काल से भी जुड़ा हुआ है। यहां स्थित ऐतिहासिक अनासक्ति आश्रम इतिहास प्रेमियों और मानसिक शांति की चाह रखने वाले यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। भागदौड़ भरी शहरी जिंदगी से दूर निकलने वाले मुसाफिरों के लिए अनासक्ति आश्रम का परिसर किसी सुकून भरे केंद्र की तरह काम करता है। हिमालय की शांत वादियों के बीच स्थित इस आश्रम में नियमित रूप से प्रार्थना, ध्यान और पठन-पाठन की विशेष सुविधाएं मौजूद हैं। यही कारण है कि पर्वतीय पर्यटन के साथ-साथ आत्मिक शांति और एकांत की तलाश में निकलने वाले लोग यहां कुछ समय बिताना बेहद पसंद करते हैं। महात्मा गांधी का कौसानी प्रवास और ऐतिहासिक जुड़ाव इस आश्रम के ऐतिहासिक महत्व को लेकर स्थानीय जानकार पूरन दोसाद बताते हैं कि अनासक्ति आश्रम का संबंध सीधे तौर पर महात्मा गांधी से जुड़ा है। वर्ष 1929 के दौरान महात्मा गांधी कौसानी पहुंचे थे और यहां लगभग 14 दिनों तक ठहरे थे। अपने इस 14 दिवसीय प्रवास के दौरान उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के गहन अध्ययन से प्रेरित होकर प्रसिद्ध ग्रंथ अनासक्ति योग की रचना की थी। कौसानी की मनोरम वादियों, शुद्ध आबोहवा और गहरी शांति ने गांधीजी को गहराई से प्रभावित किया था। यहां के शांत और सुंदर वातावरण से मुग्ध होकर उन्होंने कौसानी को भारत का स्विट्जरलैंड कहकर पुकारा था। वर्तमान समय में भी इस आश्रम परिसर में गांधीजी के प्रवास से जुड़ी दुर्लभ स्मृतियां, उनका साहित्य और ऐतिहासिक धरोहरें आने वाले आगंतुकों के मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। प्रार्थना कक्ष, ध्यान और समृद्ध पुस्तकालय की सुविधा अनासक्ति आश्रम की दिनचर्या बेहद अनुशासित और शांत वातावरण के अनुरूप संचालित होती है। आश्रम में हर रोज सुबह और शाम के समय सामूहिक प्रार्थना सभाओं का आयोजन किया जाता है। आंतरिक शांति की साधना के इच्छुक लोगों के लिए यहां एक समर्पित ध्यान कक्ष बनाया गया है, जहां बैठकर शांतिपूर्वक ध्यान लगाया जा सकता है। इसके साथ ही परिसर में एक समृद्ध पुस्तकालय भी स्थापित है, जहां अध्ययनशील पर्यटक विभिन्न विषयों की पुस्तकों का अध्ययन कर सकते हैं। शांत वातावरण में बैठकर ध्यान लगाना अथवा किसी अच्छी किताब के पन्नों को पलटना यहां आने वाले लोगों को रोजमर्रा के तनाव से एकदम अलग अनुभव प्रदान करता है। आश्रम परिसर के खुले हिस्सों से हिमालय की विशाल बर्फ से ढकी चोटियों और चारों ओर पसरी हरी-भरी ढलानों का विहंगम दृश्य साफ नजर आता है, जो इस स्थान को अद्वितीय बनाता है। आश्रम में रात्रि विश्राम और ठहरने का प्रबंध कौसानी में केवल एक दिन का भ्रमण करके लौटने के बजाय जो यात्री कुछ दिन यहां ठहरकर इस शांत वातावरण को महसूस करना चाहते हैं, उनके लिए आश्रम परिसर में लगभग 24 कमरे तैयार किए गए हैं। आश्रम प्रबंधन के अनुसार यहां रुकने की योजना बनाने वाले पर्यटकों को पहले से कमरों की उपलब्धता और आश्रम के निर्धारित नियमों की पूरी जानकारी जुटा लेनी चाहिए। इसके अतिरिक्त भोजन व्यवस्था और ठहरने से संबंधित अन्य आवश्यक औपचारिकताओं के लिए आश्रम से सीधे पूर्व संपर्क करना उचित रहता है, क्योंकि मौसम और समय के आधार पर कमरों की उपलब्धता बदल सकती है। यह आश्रम कौसानी के मुख्य बाजार क्षेत्र से महज 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मुख्य बाजार से स्थानीय टैक्सियों अथवा छोटे वाहनों की मदद से आसानी से आश्रम तक पहुंचा जा सकता है। आसपास का शांत पहाड़ी इलाका पैदल सैर करने के लिए भी काफी सुरक्षित और सुहावना माना जाता है, जहां टहलते हुए हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं का नजारा लिया जा सकता है। कौसानी पहुंचने के प्रमुख रास्ते और यात्रा मार्ग यातायात के दृष्टिकोण से कौसानी तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग सबसे सुगम माध्यम माना जाता है। जिला मुख्यालय बागेश्वर से कौसानी की कुल सड़क दूरी करीब 35 किलोमीटर बैठती है। रेल मार्ग से यात्रा करने वाले सैलानी निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम तक ट्रेन के माध्यम से पहुंच सकते हैं। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से कौसानी की दूरी लगभग 135 से 140 किलोमीटर है, जिसे टैक्सी अथवा बस के जरिए तय किया जा सकता है। वहीं हवाई मार्ग चुनने वाले पर्यटकों के लिए पंतनगर एयरपोर्ट सबसे नजदीकी विकल्प है। पंतनगर एयरपोर्ट पर उतरने के बाद टैक्सी या सड़क परिवहन सेवाओं की मदद से कौसानी पहुंचा जा सकता है। पंतनगर से इस पर्वतीय स्थल की दूरी लगभग 170 किलोमीटर है। यात्रा का सबसे अनुकूल समय कौसानी और अनासक्ति आश्रम में साल के बारहों महीने सैलानियों की आवाजाही बनी रहती है। फिर भी भ्रमण की दृष्टि से मार्च से जून के महीने और मानसून के बाद सितंबर से नवंबर के बीच की अवधि सबसे सुहावनी मानी जाती है। इन महीनों में मौसम साफ रहता है और हिमालय की चोटियां बादलों के बिना बेहद स्पष्ट दिखाई देती हैं। प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक विरासत और मानसिक शांति का यह अनूठा संगम कौसानी को एक विशेष गंतव्य बनाता है। इसका आप पर असर कौसानी की यात्रा की योजना बनाने वाले पर्यटकों और मानसिक शांति की तलाश कर रहे लोगों के लिए यह खबर ठहरने और यात्रा कार्यक्रम तय करने में सीधी मदद करती है। • भारत में: देश भर से शांतिपूर्ण और कम भीड़ वाले पर्वतीय स्थलों की तलाश कर रहे यात्री कौसानी को अपने यात्रा कार्यक्रम में शामिल कर सकते हैं। काठगोदाम रेलवे स्टेशन और पंतनगर एयरपोर्ट से सीधी टैक्सी कनेक्टिविटी यात्रा को आसान बनाती है। • उत्तराखंड में: नैनीताल और मसूरी जैसे व्यस्त हिल स्टेशनों से हटकर कुमाऊं क्षेत्र के बागेश्वर जिले में यह एक व्यवस्थित और शांत विकल्प पेश करता है। स्थानीय बाजार से केवल 1 किलोमीटर दूर आश्रम में 24 कमरों की उपलब्धता बजट अनुकूल और शांत प्रवास की सुविधा देती है। • आश्रम ठहरने के नियम: आश्रम परिसर में रात्रि प्रवास के इच्छुक लोगों को पहले से कमरे और भोजन की उपलब्धता की जांच करनी चाहिए। नियमों की पूर्व जानकारी से मौके पर पहुंचने पर कमरे न मिलने की परेशानी से बचा जा सकता है। • मौसम और दर्शनीयता: मार्च से जून और सितंबर से नवंबर के दौरान जाने से हिमालय की चोटियों के साफ दीदार का लाभ उठाया जा सकता है। इस अवधि में मौसम सुहावना रहने से यात्रा अधिक सुखद और यादगार बन जाती है। ऐसा क्यों हुआ कौसानी की पहचान एक शांत पर्यटन स्थल और ऐतिहासिक केंद्र के रूप में महात्मा गांधी के ऐतिहासिक प्रवास तथा यहां के अद्वितीय प्राकृतिक परिवेश के कारण बनी है। • महात्मा गांधी का ऐतिहासिक प्रवास: वर्ष 1929 में महात्मा गांधी ने कौसानी में लगभग 14 दिनों तक प्रवास किया था। इसी शांतिपूर्ण वातावरण में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता से प्रेरित होकर अपने प्रसिद्ध ग्रंथ अनासक्ति योग की रचना की थी। • अद्वितीय प्राकृतिक सौंदर्य: कौसानी की हरी-भरी वादियों और हिमालय की विस्तृत श्रृंखलाओं ने गांधीजी को इतना सम्मोहित किया कि उन्होंने इसे भारत का स्विट्जरलैंड कहा। यही ऐतिहासिक उपमा आज भी सैलानियों को इस स्थान की ओर खींचती है। • आश्रम की सुव्यवस्थित दिनचर्या: अनासक्ति आश्रम में आज भी प्रार्थना, ध्यान और पठन-पाठन की शांत परंपरा को सुरक्षित रखा गया है। भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर एकांत चाहने वाले लोगों के लिए यह केंद्र एक सुरक्षित शरणस्थली का काम करता है। सवाल-जवाब 1. कौसानी उत्तराखंड के किस जिले में स्थित है? कौसानी उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित है और यह जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। 2. महात्मा गांधी कौसानी में कब और कितने दिन ठहरे थे? महात्मा गांधी वर्ष 1929 में कौसानी पहुंचे थे और वहां लगभग 14 दिनों तक ठहरे थे। 3. गांधीजी ने कौसानी प्रवास के दौरान किस पुस्तक का लेखन किया था? गांधीजी ने कौसानी में रहकर भगवद्गीता से प्रभावित होकर अनासक्ति योग नामक ग्रंथ का लेखन किया था। 4. गांधीजी ने कौसानी को क्या नाम दिया था? कौसानी की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने इसे भारत का स्विट्जरलैंड कहा था। 5. अनासक्ति आश्रम में ठहरने के लिए कितने कमरे उपलब्ध हैं? अनासक्ति आश्रम परिसर में पर्यटकों और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए लगभग 24 कमरे उपलब्ध हैं। 6. काठगोदाम रेलवे स्टेशन से कौसानी की दूरी कितनी है? काठगोदाम रेलवे स्टेशन से सड़क मार्ग के जरिए कौसानी की दूरी लगभग 135 से 140 किलोमीटर है। 7. कौसानी घूमने के लिए सबसे अच्छा मौसम कौन सा माना जाता है? कौसानी घूमने के लिए मार्च से जून और सितंबर से नवंबर का समय सबसे सुहावना माना जाता है जब हिमालय की चोटियां साफ दिखाई देती हैं। https://trendkia.com/uttarakhand/kausani-dilaega-bhirabhara-se-rahata-mahatma-gandhi-ne-diya-tha-bharata-ke-switzerland-ka-nama-44834 TrendKia — Har trend, sabse pehle.