उत्तराखंड में खादी का विरोधाभास: देश में बढ़ रही बिक्री, लेकिन कुमाऊं के गांधी आश्रमों पर ताले लटकने का संकट देशभर में खादी की रिकॉर्ड बिक्री के बावजूद उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में गांधी आश्रम भारी वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। धन की कमी, लंबित रिबेट और कम मांग के कारण कत्तिन और बुनकर पारंपरिक काम छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी जिलों में स्थित खादी संस्थानों की आर्थिक सेहत लगातार चिंताजनक होती जा रही है। नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत जैसे क्षेत्रों में संचालित गांधी आश्रमों के सामने उत्पादन घटने, पूंजी की कमी और बिक्री में गिरावट जैसी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इसका सीधा असर उन तमाम कारीगरों, कत्तिनों और बुनकरों की आजीविका पर पड़ रहा है जो पीढ़ियों से इस पारंपरिक उद्योग से जुड़े हुए हैं। हल्द्वानी केंद्र की स्थिति और बदलते बाजार की चुनौतियां क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम हल्द्वानी लंबे समय से कुमाऊं क्षेत्र में खादी के निर्माण और विपणन का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। यह संस्था सूती, ऊनी और पॉली खादी के साथ कई अन्य ग्रामोद्योग उत्पाद तैयार करती है और इससे बड़ी संख्या में कामगार जुड़े हैं। हालांकि, आधुनिक बाजार में सस्ते कपड़ों और रेडीमेड वस्त्रों के बढ़ते चलन ने पारंपरिक खादी की मांग को काफी हद तक प्रभावित किया है, जिससे इन संस्थानों का संचालन मुश्किल होता जा रहा है। घटते बुनकर और आजीविका का संकट कामकाज मंद पड़ने के कारण कारीगरों को सालभर नियमित रोजगार मिलना बंद हो गया है। पूर्व में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, हल्द्वानी क्षेत्र में ही छह वर्षों के भीतर बुनकरों की संख्या 1100 से घटकर लगभग 450 के करीब आ गई थी। कच्चे माल की खरीद के लिए धन का अभाव और समय पर सरकारी रिबेट न मिलने से स्थिति और गंभीर हो गई है। बागेश्वर गांधी आश्रम के प्रबंधक कमल बघरी ने बताया कि आर्थिक तंगी का सीधा असर कामगारों की कमाई पर पड़ा है। पर्याप्त मेहनताना न मिलने के कारण बीते तीन वर्षों में करीब 800 कत्तिन और बुनकर इस काम से दूर हो चुके हैं और कई लोगों ने अपने चरखे भी वापस लौटा दिए हैं। लंबित रिबेट और राष्ट्रीय आंकड़ों का विरोधाभास चनौदा जैसे ऐतिहासिक और पुराने गांधी आश्रम भी लंबे समय से घाटे का बोझ उठा रहे हैं। इन संस्थानों की सबसे बड़ी शिकायत यह रही है कि सरकारी सहायता और छूट की राशि समय पर नहीं मिलती, जिससे उत्पादन और रोजगार दोनों मोर्चों पर संकट खड़ा हो जाता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक तरफ जहां पूरे देश में खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री रिकॉर्ड ऊंचाई छू रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर संचालित ये आश्रम बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में खादी उत्पादों की कुल बिक्री बढ़कर 1.87 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई है, लेकिन इस राष्ट्रीय वृद्धि का लाभ कुमाऊं के इन छोटे केंद्रों तक नहीं पहुंच पा रहा है। संकट से उबरने के लिए जरूरी कदम खादी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों और प्रबंधकों का मानना है कि इन आश्रमों को बचाने के लिए नीतिगत स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। सरकारी अनुदान और रिबेट का समय पर भुगतान, सुलभ कच्चा माल, आधुनिक फैशन के अनुकूल नए डिजाइन, ऑनलाइन बिक्री के विकल्प और बेहतर विपणन रणनीतियां इस उद्योग को फिर से पटरी पर ला सकती हैं। यदि युवाओं को खादी से जोड़ने के लिए विशेष प्रयास किए जाएं, तो न केवल इन संस्थानों का कारोबार सुधर सकता है, बल्कि कुमाऊं की पारंपरिक हस्तकला और रोजगार को भी बचाया जा सकता है। इसका आप पर असर खादी और ग्रामोद्योग क्षेत्र में चल रहे इस संकट का सीधा असर स्थानीय कारीगरों और पारंपरिक कुटीर उद्योगों की आजीविका पर पड़ रहा है। • भारत में: देशभर में खादी की रिकॉर्ड बिक्री होने के बावजूद ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों के छोटे उत्पादन केंद्र वित्तीय उपेक्षा का शिकार हैं। इससे पारंपरिक हथकरघा और कुटीर उद्योगों का दायरा सिमटता जा रहा है। • उत्तराखंड में: कुमाऊं के नैनीताल, बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे जिलों में कत्तिनों और बुनकरों के लिए रोजगार के अवसर तेजी से खत्म हो रहे हैं। समय पर रिबेट न मिलने और काम कम होने से कारीगरों को पारंपरिक पुश्तैनी काम छोड़कर अन्य मजदूरी की तलाश करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसा क्यों हुआ कुमाऊं के गांधी आश्रमों में आर्थिक बदहाली और कामकाज ठप होने के पीछे कई प्रशासनिक और बाजार से जुड़ी वजहें जिम्मेदार हैं। • बढ़ता प्रतिस्पर्धात्मक दबाव: बाजार में सस्ते रेडीमेड कपड़ों और आधुनिक फैशन के आने से पारंपरिक हाथ से बने खादी उत्पादों की मांग में भारी गिरावट आई है। • कार्यशील पूंजी की कमी: कच्चे माल की खरीद के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध न होने के कारण आश्रम बड़े पैमाने पर उत्पादन जारी रखने में असमर्थ हैं। • लंबित सरकारी रिबेट: सरकार की ओर से मिलने वाली छूट और अनुदान राशि समय पर न मिलने से संस्थानों का नकदी प्रवाह पूरी तरह चरमरा गया है। • कारीगरों का पलायन: कम मेहनताना और नियमित काम न मिलने के कारण सैकड़ों कत्तिनों और बुनकरों ने इस पारंपरिक पेशे से दूरी बना ली है। सवाल-जवाब 1. कुमाऊं में किन जिलों के गांधी आश्रम प्रभावित हैं? नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों के गांधी आश्रम प्रभावित हैं। 2. हल्द्वानी क्षेत्र में बुनकरों की संख्या में कितनी गिरावट आई थी? हल्द्वानी क्षेत्र में छह वर्षों के दौरान बुनकरों की संख्या 1100 से घटकर करीब 450 रह गई थी। 3. कितने कत्तिन और बुनकर पिछले तीन वर्षों में काम से दूर हुए हैं? पिछले तीन वर्षों के दौरान लगभग 800 कत्तिन और बुनकर काम छोड़कर दूर हो चुके हैं। 4. वित्त वर्ष 2025-26 में देश में खादी उत्पादों की बिक्री कितनी रही? वित्त वर्ष 2025-26 में खादी एवं ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 1.87 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। 5. बागेश्वर गांधी आश्रम के प्रबंधक कौन हैं? बागेश्वर गांधी आश्रम के प्रबंधक कमल बघरी हैं। https://trendkia.com/uttarakhand/khadi-paradox-in-uttarakhand-record-national-sales-contrast-with-closure-threats-for-kumaon-gandhi-ashrams-29571 TrendKia — Har trend, sabse pehle.