# कॉर्पोरेट की 6 लाख की नौकरी छोड़ बागेश्वर लौटीं विजया कोरंगा, बनीं जिला पंचायत सदस्य

> देहरादून में कॉर्पोरेट करियर और सालाना छह लाख रुपये का पैकेज छोड़कर विजया कोरंगा अपने गृह क्षेत्र बागेश्वर लौटीं और जिला पंचायत सदस्य बनकर जनसेवा की राह चुनी।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/korporeta-ki-6-lakha-ki-naukari-chhora-bageshwar-lautin-vijaya-koranga-banin-jila-pnchayata-sadasya-46858 · **Language:** Hindi
**Tags:** विजया कोरंगा, बागेश्वर, जिला पंचायत सदस्य, पलायन, शामा वार्ड, उत्तराखंड

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों से रोजगार और बेहतर जिंदगी की चाह में शहरों की ओर होने वाला पलायन एक आम तस्वीर बन चुका है, लेकिन बागेश्वर की विजया कोरंगा ने विपरीत दिशा में कदम बढ़ाकर नई नजीर पेश की है। देहरादून में सालाना छह लाख रुपये के पैकेज वाली अपनी कॉर्पोरेट नौकरी को अलविदा कहकर विजया अपने पैतृक गांव लौटीं। आज वह बागेश्वर जिला पंचायत के अंतर्गत शामा क्षेत्र यानी वार्ड संख्या 10 से निर्वाचित सदस्य के रूप में ग्रामीण समस्याओं के समाधान में जुटी हैं।

## शिक्षा, मेडिकल क्षेत्र का अनुभव और कॉर्पोरेट सफर
विजया कोरंगा की प्रारंभिक शिक्षा उनके गृह क्षेत्र शामा में ही पूरी हुई थी। उन्होंने अपनी हाईस्कूल की पढ़ाई शामा इंटर कॉलेज से की और इसके बाद विवेकानंद विद्या मंदिर से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाते हुए उन्होंने हल्द्वानी स्थित आम्रपाली संस्थान से स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके उपरांत उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय से मेडिकल के क्षेत्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद विजया ने लगभग चार वर्षों तक मेडिकल क्षेत्र में अपनी सेवाएं दीं।

मेडिकल क्षेत्र के इस अनुभव के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट जगत का रुख किया और देहरादून में सरसा ग्रुप ऑफ कंपनीज में काम शुरू किया। यहां उन्हें प्रति वर्ष करीब छह लाख रुपये का वेतन पैकेज मिल रहा था। एक सुरक्षित नौकरी और शहर की तमाम आधुनिक सुविधाओं के बावजूद विजया का मन अपने गांव और पहाड़ की जमीनी हकीकत से जुड़ा रहा। अंततः उन्होंने सुख-सुविधाओं से भरा शहरी जीवन छोड़कर अपने क्षेत्र में लौटने का फैसला किया, ताकि वह अपने लोगों के लिए तन, मन और धन से सेवा कार्य कर सकें।

## ग्रामीण मुद्दों और पलायन के खिलाफ मुखर आवाज
पहाड़ लौटने के पीछे विजया का मुख्य उद्देश्य गांव में रहकर स्थानीय नागरिकों और नौजवानों के अधिकारों के लिए कार्य करना था। पंचायत प्रतिनिधि बनने के बाद वह क्षेत्र में सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्थानीय रोजगार और महिला सशक्तिकरण जैसे बुनियादी विषयों पर निरंतर आवाज उठा रही हैं। इसके अलावा ग्रामीण जनहित से जुड़े कई मामलों में, जिनमें स्थानीय शराब की दुकान का विरोध भी शामिल है, वह ग्रामीणों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही हैं।

विजया का स्पष्ट मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओं को अपने ही इलाकों में सम्मानजनक रोजगार और विकास के पर्याप्त साधन उपलब्ध करा दिए जाएं, तो पहाड़ों से होने वाले भारी पलायन पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है। उनका पूरा प्रयास क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और जनसमस्याओं को प्रशासनिक स्तर पर हल कराने पर केंद्रित है।

## भूपेंद्र सिंह कोरंगा का सहयोग और सामाजिक सरोकार
विजया के इस सामाजिक और सार्वजनिक सफर में उनके सहयोगी तथा सामाजिक कार्यकर्ता भूपेंद्र सिंह कोरंगा ने निरंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्कूल के दिनों से ही भूपेंद्र उनका साथ देते आ रहे हैं और जब विजया ने शहर छोड़कर वापस गांव लौटने का विचार किया, तब भी भूपेंद्र ने उनके इस फैसले का पूरा समर्थन किया। दोनों लंबे अरसे से इलाके में विभिन्न सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में मिलकर भागीदारी निभा रहे हैं।

भूपेंद्र सिंह कोरंगा ने विजया के इस कदम को बेहद साहसिक बताया। उनका कहना है कि शहर की चमक-दमक और सुरक्षित करियर को त्यागकर पहाड़ के कठिन संघर्ष को अपनाना आसान नहीं होता। वह विजया को महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण मानते हैं और उनका मानना है कि जनहित के प्रति विजया का समर्पण क्षेत्र की अन्य युवतियों और नौजवानों को भी समाज सेवा के लिए प्रेरित करता है।

## सगाई और भविष्य में व्यापक जनसेवा का संकल्प
निजी जीवन की बात करें तो विजया कोरंगा और भूपेंद्र सिंह कोरंगा की सगाई पारंपरिक कुमाऊंनी रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न हो चुकी है और दोनों भविष्य में परिणय सूत्र में बंधने जा रहे हैं। दोनों का यह दृढ़ निश्चय है कि पारिवारिक जीवन की शुरुआत के साथ-साथ वे अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों और जनता से जुड़े मुद्दों पर पहले की तरह सक्रिय रहेंगे।

विजया राजनीति को केवल एक पद या सत्ता पाने का माध्यम नहीं मानतीं, बल्कि उनके लिए यह जनसमस्याओं को मंच देने और उनके ठोस समाधान तलाशने का एक सशक्त जरिया है। उनका कहना है कि यदि जनता भविष्य में उन्हें अवसर प्रदान करती है, तो वह बड़े स्तर पर समाज सेवा और सक्रिय राजनीति में भागीदारी निभाने के लिए पूरी तरह तत्पर रहेंगी। एक प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट नौकरी से जिला पंचायत सदस्य तक का उनका यह सफर यह साबित करता है कि संकल्प मजबूत हो तो गांव में रहकर भी बदलाव लाया जा सकता है।

## इसका आप पर असर
यह खबर दर्शाती है कि उच्च शिक्षित युवा कॉर्पोरेट करियर छोड़कर स्थानीय स्वशासन और ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं।

- **उत्तराखंड में:** युवाओं का अपने गृह क्षेत्र लौटकर काम करना राज्य में लंबे समय से जारी पलायन की समस्या को कम करने की दिशा में सकारात्मक संदेश देता है। इससे अन्य शिक्षित युवाओं को भी स्थानीय स्तर पर सामाजिक और आर्थिक अवसर तलाशने की प्रेरणा मिलेगी।
- **बागेश्वर में:** शामा क्षेत्र वार्ड संख्या 10 के ग्रामीणों को सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए एक सक्रिय और शिक्षित जनप्रतिनिधि मिला है। स्थानीय शराब की दुकान के विरोध और बुनियादी सुविधाओं की मांग को अब पंचायत स्तर पर मजबूत आवाज मिल सकेगी।
- **पर्वतीय युवाओं के लिए:** यह पहल दर्शाती है कि केवल बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र में रहकर भी सामाजिक प्रभाव पैदा किया जा सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में महिला नेतृत्व और सामुदायिक भागीदारी को नया बल मिलेगा।
- **स्थानीय प्रशासन पर प्रभाव:** एक उच्च शिक्षित पंचायत प्रतिनिधि के होने से ग्राम स्तर की योजनाओं और विकास कार्यों की निगरानी अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगी। इससे सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंद ग्रामीणों तक तेजी से पहुंचेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
विजया कोरंगा ने अपने गृह क्षेत्र की जमीनी समस्याओं के समाधान और युवाओं के लगातार पलायन को रोकने के उद्देश्य से कॉर्पोरेट करियर छोड़कर गांव लौटने का फैसला किया।

- **पलायन की समस्या:** उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों से शिक्षा और रोजगार के अभाव में बड़े पैमाने पर युवा शहरों का रुख कर रहे हैं, जिससे गांव खाली हो रहे हैं। विजया का मानना था कि स्थानीय स्तर पर अवसर और बुनियादी ढांचा मजबूत किए बिना इस पलायन को रोकना संभव नहीं है।
- **सरोकार और जनसेवा की इच्छा:** मेडिकल शिक्षा और देहरादून में छह लाख रुपये के कॉर्पोरेट पैकेज के बावजूद वह अपने क्षेत्र के लोगों के लिए सीधे काम करना चाहती थीं। इसी उद्देश्य से उन्होंने नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक सामाजिक कार्य और पंचायत चुनाव लड़ने का रास्ता चुना।
- **सामाजिक सहयोगी का संबल:** उनके सहयोगी भूपेंद्र सिंह कोरंगा ने स्कूल के दिनों से उनका मार्गदर्शन किया और पहाड़ लौटने के उनके फैसले का समर्थन किया, जिससे उन्हें जनसेवा के मैदान में उतरने का आत्मविश्वास मिला।

## सवाल-जवाब

### 1. विजया कोरंगा कौन हैं?
विजया कोरंगा बागेश्वर जिला पंचायत के शामा क्षेत्र (वार्ड संख्या 10) से निर्वाचित सदस्य हैं, जो कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर गांव लौटी हैं।

### 2. विजया ने देहरादून में किस कंपनी की नौकरी छोड़ी और उनका पैकेज क्या था?
उन्होंने देहरादून में सरसा ग्रुप ऑफ कंपनीज में काम किया, जहां उन्हें सालाना करीब छह लाख रुपये का पैकेज मिल रहा था।

### 3. विजया कोरंगा की शैक्षणिक योग्यता क्या है?
उन्होंने आम्रपाली संस्थान हल्द्वानी से स्नातक और गढ़वाल विश्वविद्यालय से मेडिकल क्षेत्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है।

### 4. कॉर्पोरेट क्षेत्र से पहले विजया ने किस क्षेत्र में काम किया था?
पढ़ाई पूरी करने के बाद विजया ने लगभग चार साल तक मेडिकल लाइन में काम किया था।

### 5. विजया कोरंगा किन प्रमुख मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं?
वह क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, महिला सशक्तिकरण और स्थानीय शराब की दुकान के विरोध जैसे मुद्दों पर सक्रिय हैं।

### 6. भूपेंद्र सिंह कोरंगा की इस यात्रा में क्या भूमिका रही है?
भूपेंद्र सिंह कोरंगा सामाजिक कार्यकर्ता और विजया के सहयोगी हैं, जिन्होंने स्कूल के समय से उनका साथ दिया और पहाड़ लौटने के फैसले में अहम भूमिका निभाई।

## प्रेरणा और सबक
विजया कोरंगा का सफर यह साबित करता है कि व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर समाज के लिए किया गया कार्य ही वास्तविक संतोष और पहचान दिलाता है।

- **जड़ों से जुड़ाव:** चाहे आप कितनी भी ऊंची शिक्षा या बड़ा कॉर्पोरेट पैकेज हासिल कर लें, अपनी जड़ों और समाज की जरूरतों को कभी नहीं भूलना चाहिए। विजया ने साबित किया कि अपनी जमीन पर लौटकर बदलाव की शुरुआत की जा सकती है।
- **कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने का साहस:** महानगर की सुरक्षित और आरामदायक नौकरी छोड़कर ग्रामीण क्षेत्र के संघर्ष को चुनना साहस की मांग करता है। वास्तविक नेतृत्व वही है जो कठिन रास्तों पर चलकर समाज को दिशा दिखाए।
- **महिला नेतृत्व और सशक्तिकरण:** ग्रामीण और पारंपरिक परिवेश में महिलाओं का पंचायत और राजनीति के मंच पर आगे आना अन्य युवतियों के लिए प्रेरणा बनता है। दृढ़ संकल्प के साथ जनहित के मुद्दों पर खड़े होना ही सशक्तिकरण है।
- **सार्थक उद्देश्य की प्राथमिकता:** पद या प्रतिष्ठा पाने के बजाय लोगों की बुनियादी समस्याओं, जैसे सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा के समाधान को प्राथमिकता देना ही सच्ची जनसेवा की पहचान है।

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