# मां के संकल्प और नाविक के तंज से खड़ा हुआ ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला, हरिद्वार की ऐतिहासिक धर्मशाला से जुड़ा है किस्सा

> ऋषिकेश के प्रतिष्ठित लक्ष्मण झूले की नींव एक नाविक के व्यंग्य और एक मां के दृढ़ संकल्प से जुड़ी है, जिसका निर्माण सेठ सूरजमल परिवार ने करवाया था।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-15 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/maa-ke-sankalp-aur-navik-ke-tanj-se-khada-hua-rishikesh-ka-laxman-jhula-haridwar-ki-aetihasik-dharamshala-se-juda-hai-kissa-47806 · **Language:** Hindi
**Tags:** लक्ष्मण झूला, ऋषिकेश, हरिद्वार, सेठ सूरजमल धर्मशाला, बदरीनाथ केदारनाथ, उत्तराखंड इतिहास, गंगा नदी, चारधाम यात्रा

उत्तराखंड में गंगा नदी पर बना ऋषिकेश का विख्यात लक्ष्मण झूला केवल इंजीनियरिंग का नमूना नहीं है, बल्कि इसके अस्तित्व में आने के पीछे मां के स्वाभिमान और सेवा भाव की एक बेहद दिलचस्प गाथा छिपी है। इस प्रतिष्ठित झूला पुल का ऐतिहासिक संबंध हरिद्वार के अपर रोड पर मौजूद लगभग 250 वर्ष पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला से गहराई से जुड़ा हुआ है। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दौर में जब बदरीनाथ और केदारनाथ की दुर्गम तीर्थयात्रा शुरू होती थी, तब तेज बहाव वाली उफनती गंगा नदी को पार करना तीर्थयात्रियों के लिए जीवन और मरण का जोखिम भरा संघर्ष हुआ करता था। श्रद्धालुओं के इस कष्ट को महसूस करते हुए दानवीर सेठ सूरजमल परिवार ने गंगा पर मजबूत लोहे के तारों वाला यह ऐतिहासिक झूला पुल तैयार करवाया था। इस पूरे प्रयास का उद्देश्य यही था कि चारधाम यात्रा के लंबे मार्ग पर चलने वाले श्रद्धालुओं को सिर छुपाने के लिए पक्की सुरक्षित छत और नदी पार करने के लिए सुगम मार्ग मिल सके।

## नाविक का कड़वा व्यंग्य और मां का स्वाभिमान
इस पुल के निर्माण की पृष्ठभूमि हरिद्वार में संचालित सेठ सूरजमल धर्मशाला के संचालक श्रीनिवास पांडे द्वारा साझा किए गए ऐतिहासिक प्रसंग से स्पष्ट होती है। एक समय सेठ सूरजमल ने अपनी माताजी को बदरीनाथ और केदारनाथ की पवित्र यात्रा पर रवाना किया था। उस कालखंड में गंगा की जलधारा पार करने का एकमात्र जरिया नावें ही थीं। सेठ की मां जब नौका में सवार हुईं और मल्लाह ने नाव को किनारे से आगे बढ़ाया, तब उन्होंने गौर किया कि उनके दल के कुछ साथी पीछे घाट पर ही छूट गए हैं। उन्होंने फौरन मल्लाह से नौका को वापस किनारे की ओर मोड़ने का निवेदन किया। हालांकि नाविक ने साफ मना कर दिया और कहा कि एक बार घाट छोड़ देने के बाद नाव उल्टे पांव नहीं लौटती।

इसके बावजूद जब सेठ की माता ने साथी यात्रियों के लिए नाव वापस ले जाने की लगातार गुहार लगाई, तो नाविक झुंझला उठा। उसने तंज कसते हुए कड़वे स्वर में कह दिया कि यदि आपको इतनी ही परेशानी महसूस हो रही है, तो अपने लिए खुद का एक अलग पुल बनवा लीजिए। नाविक का यह व्यंग्य बाण सीधे बुजुर्ग मां के आत्मसम्मान पर लगा। उन्होंने उसी क्षण आगे की यात्रा स्थगित करने का निर्णय लिया और बदरी-केदार के दर्शन किए बिना ही उल्टे पांव घर वापसी की राह पकड़ ली।

## कलकत्ता वापसी और बेटे के सामने रखा कठिन संकल्प
तीर्थयात्रा बीच में छोड़कर जब सेठ की माता सीधे कोलकाता पहुंचीं, तो बेटे सूरजमल ने यात्रा अधूरी छूटने का कारण पूछा। इस पर मां ने पूरा वाकया सुनाते हुए साफ शब्दों में कहा कि वह बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के दर्शन अब तभी करेंगी, जब गंगा नदी के आर-पार जाने के लिए एक मजबूत पुल तैयार हो जाएगा। अपनी मां के इस अटल संकल्प और स्वाभिमान को सम्मान देने के लिए दानवीर सेठ सूरजमल के परिवार ने ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1929 में गंगा नदी के ऊपर मजबूत तारों वाला भव्य लक्ष्मण झूला पुल बनवाकर तैयार कर दिया।

## मरम्मत के लिए उस दौर में एक लाख की सावधि जमा
पुल केवल बना देना ही काफी नहीं था, बल्कि भविष्य में इसके रख-रखाव की पुख्ता व्यवस्था भी सेठ सूरजमल ने पहले ही सुनिश्चित कर दी थी। संचालक श्रीनिवास पांडे के विवरण के अनुसार, पुल की नियमित मरम्मत और देखरेख के लिए सेठ ने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत के पास एक लाख रुपये की भारी-भरकम राशि फिक्स डिपॉजिट यानी सावधि जमा के रूप में जमा करवाई थी। प्रशासन के साथ बकायदा यह औपचारिक समझौता किया गया था कि इस राशि से मिलने वाले ब्याज के पैसे से ही लक्ष्मण झूला पुल के निरंतर रख-रखाव और मरम्मत का खर्च उठाया जाएगा। इतना ही नहीं, लक्ष्मण झूले का निर्माण कराने से पहले भी इस परोपकारी परिवार ने हरिद्वार तथा लक्सर क्षेत्र में यात्रियों के विश्राम के लिए बड़ी धर्मशालाएं स्थापित की थीं, जो आज भी अडिग खड़ी रहकर तीर्थयात्रियों की सेवा कर रही हैं।

## इसका आप पर असर
तीर्थयात्रियों और आम यात्रियों के लिए यह ऐतिहासिक घटना दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और परोपकार से बुनियादी ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव संभव हैं।

- **भारत में:** उत्तराखंड के चारधाम तीर्थमार्ग पर बुनियादी ढांचे के ऐतिहासिक विकास को समझने में यह विवरण अहम संदर्भ देता है। श्रद्धालु यह जान पाते हैं कि कैसे पुराने दौर के व्यक्तिगत संकल्पों ने आज के लोकप्रिय धार्मिक पर्यटन को सुगम बनाया।
- **उत्तराखंड में:** ऋषिकेश और हरिद्वार आने वाले पर्यटकों के लिए लक्ष्मण झूले और सूरजमल धर्मशाला का महत्व केवल दर्शनीय स्थल से बढ़कर सांस्कृतिक विरासत के रूप में स्थापित होता है। स्थानीय लोग और आगंतुक इस क्षेत्र के ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक होते हैं।
- **तीर्थयात्रियों के लिए:** बदरी-केदार यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को यह याद दिलाता है कि सुगम रास्तों के पीछे लंबा संघर्ष और दान का इतिहास रहा है। यह अनुभव धार्मिक यात्रा के प्रति सम्मान और कृतज्ञता के भाव को गहरा करता है।
- **सार्वजनिक व्यवस्था के लिए:** दशकों पूर्व जनहित में निजी पूंजी से सार्वजनिक पुल निर्माण और उसके रखरखाव के लिए स्थायी वित्तीय कोष की व्यवस्था आज भी प्रेरणादायक मॉडल है। बुनियादी ढांचे के दीर्घकालिक रखरखाव के लिए ऐसे उपाय आज के नीति निर्माताओं के लिए भी प्रासंगिक हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
लक्ष्मण झूला पुल के निर्माण की नींव एक साधारण नौका यात्रा के दौरान उपजे आत्मसम्मान और नाविक की अशोभनीय टिप्पणी से जुड़ी है। गंगा के तीव्र बहाव के बीच उपजी इस परिस्थिति ने एक परिवार को नदी पर स्थायी पुल बनाने के लिए प्रेरित किया।

- **नाविक का व्यंग्य:** नाव में साथी यात्रियों के छूट जाने पर जब सेठ सूरजमल की मां ने नाव मोड़ने को कहा, तो नाविक ने लौटने से इनकार कर पुल बनवाने का तंज कस दिया। इसी अपमानजनक टिप्पणी ने उनकी मां के भीतर एक गहरा संकल्प पैदा कर दिया।
- **मां का कठोर प्रण:** अपमान से आहत होकर मां ने बिना दर्शन किए कलकत्ता लौटने का फैसला किया और गंगा पर पुल बनने तक बदरी-केदार न जाने का प्रण लिया। बेटे ने मां के इसी स्वाभिमान और वचन की रक्षा के लिए पुल का निर्माण कराने का फैसला किया।
- **तीर्थयात्रियों की पुरानी विपदा:** बीसवीं सदी की शुरुआत में उफनती गंगा को छोटी नावों से पार करना अत्यंत जोखिम भरा और थकाऊ काम था। तीर्थयात्रियों की इस सामान्य परेशानी को दूर करने की सोच ने भी इस बड़े निर्माण को गति दी।
- **परंपरागत दान और सेवाभाव:** सेठ सूरजमल का परिवार पहले से ही हरिद्वार और लक्सर में धर्मशालाएं बनाकर यात्रियों की सेवा में जुटा हुआ था। इसी सेवा संस्कृति के चलते परिवार ने न केवल 1929 में पुल बनाया, बल्कि उसके रख-रखाव के लिए एक लाख रुपये की सावधि जमा भी की।

## सवाल-जवाब

### 1. ऋषिकेश के लक्ष्मण झूले का निर्माण किस वर्ष हुआ था?
लक्ष्मण झूला पुल का निर्माण ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1929 में पूरा कराया गया था।

### 2. लक्ष्मण झूले का निर्माण किस परिवार ने करवाया था?
इस ऐतिहासिक झूला पुल का निर्माण दानवीर सेठ सूरजमल के परिवार ने करवाया था।

### 3. सेठ की माता ने बदरी-केदार यात्रा बीच में क्यों छोड़ दी थी?
नाविक द्वारा अपने साथियों को लेने के लिए नाव वापस मोड़ने से इनकार करने और तंज कसने के कारण उन्होंने यात्रा अधूरी छोड़ दी थी।

### 4. नाविक ने सेठ की माता को क्या ताना मारा था?
नाविक ने व्यंग्य करते हुए कहा था कि यदि उन्हें इतनी परेशानी है तो वे अपने लिए अलग पुल बनवा लें।

### 5. पुल की मरम्मत के लिए क्या व्यवस्था की गई थी?
सेठ ने तत्कालीन सरकार के पास एक लाख रुपये फिक्स डिपॉजिट में रखकर एग्रीमेंट किया था कि इसके ब्याज से पुल की मरम्मत होगी।

### 6. सेठ सूरजमल धर्मशाला कहां स्थित है?
यह लगभग 250 वर्ष पुरानी धर्मशाला हरिद्वार के अपर रोड पर स्थित है।

## प्रेरणा और सबक
यह प्रसंग सिखाता है कि किसी भी अपमान अथवा कड़वी चुनौती को सकारात्मक संकल्प में बदलकर समाज के लिए चिरस्थायी काम किया जा सकता है।

- **कड़वे तानों को प्रेरणा बनाएं:** नाविक के व्यंग्य पर विवाद करने के बजाय उसे एक बड़े निर्माण के संकल्प में तब्दील किया गया। जीवन में नकारात्मक टिप्पणियों पर ऊर्जा गंवाने के बजाय उसे रचनात्मक उपलब्धि का आधार बनाना चाहिए।
- **मातृभक्ति और पारिवारिक सम्मान:** सेठ सूरजमल ने मां के स्वाभिमान और उनके प्रण को पूरा करने के लिए विशाल साधन जुटाए। बड़ों के वचनों और उनके आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखना सफलता का सच्चा पैमाना है।
- **व्यक्तिगत पीड़ा से व्यापक जनकल्याण:** अपनी निजी परेशानी के समाधान को हजारों श्रद्धालुओं की सुरक्षित यात्रा से जोड़कर देखा गया। सच्चे परोपकारी अपनी कठिनाई से सीख लेकर पूरे समाज की राह आसान करते हैं।
- **भविष्य की सुरक्षा और दूरदर्शिता:** पुल बनाने के साथ-साथ उसकी उम्र भर मरम्मत के लिए सावधि जमा की व्यवस्था करना अद्भुत दूरदृष्टि का प्रमाण है। किसी भी बड़े काम को शुरू करने के साथ-साथ उसके दीर्घकालिक प्रबंधन की योजना बनाना आवश्यक है।

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