मॉल रोड के शोर से दूर पहाड़ों के सुकून की तलाश में हैं तो रुख करें मसूरी का बार्लोगंज मसूरी में भीड़भाड़ और ट्रैफिक से अलग शांति तलाश रहे सैलानियों के लिए बार्लोगंज एक बेहतरीन ठिकाना बनकर उभर रहा है। चीड़ के घने जंगल, ऐतिहासिक बोर्डिंग स्कूल, दून घाटी के दिलकश नजारे और शाम को दिखने वाली विंटर लाइन यहां के मुख्य आकर्षण हैं। उत्तराखंड के लोकप्रिय हिल स्टेशन मसूरी की बात आते ही आमतौर पर ज्यादातर सैलानियों का ध्यान सीधे मॉल रोड की ओर चला जाता है। छुट्टियों और पर्यटन सीजन के दौरान वहां भारी भीड़, गाड़ियों का लंबा जाम और लगातार शोर देखने को मिलता है। इस आपाधापी से दूर पहाड़ों की गोद में एक ऐसा शांत इलाका भी बसा है जहां प्रकृति का असली सुकून महसूस होता है। इस जगह की पहचान बार्लोगंज के रूप में है, जहां चीड़ के घने जंगलों से घिरे हरे-भरे रास्ते और निर्मल वातावरण यात्रियों को अपनी ओर खींचते हैं। ऊंचाई पर बसी इस बस्ती से नीचे फैली दून घाटी का मनमोहक और विस्तृत दृश्य भी साफ नजर आता है। प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही यह इलाका अपने सदियों पुराने इतिहास, ब्रिटिश वास्तुकला और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के लिए भी पहचाना जाता है। पुराने एस्टेट, पत्थरों से तराशी गई भव्य इमारतें और ऐतिहासिक बोर्डिंग स्कूल इस समूचे क्षेत्र को एक विशिष्ट पहचान देते हैं। यही वजह है कि पहाड़ों पर तसल्ली से वक्त बिताने की चाह रखने वाले लोग अब मुख्य बाजार को छोड़कर इस ऐतिहासिक कोने का रुख करने लगे हैं। कर्नल चार्ल्स ग्रांट बार्लो से जुड़ा है इस बस्ती का इतिहास इतिहासकार अजय शर्मा के मुताबिक, इस क्षेत्र का नामकरण कर्नल चार्ल्स ग्रांट बार्लो के नाम पर हुआ था। आज भी यहां ब्रिटिश शासनकाल की कई पुरानी हवेलियां, विशाल एस्टेट और पत्थरों की पारंपरिक कारीगरी से सजी इमारतें मौजूद हैं, जो उस गुजरे हुए दौर की वास्तुकला की गवाही देती हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों के हवाले से पता चलता है कि सन 1867 में शुरू की गई प्रसिद्ध क्राउन ब्रेवरी भी इसी इलाके में स्थापित थी। अजय शर्मा बताते हैं कि ब्रिटिश काल में देहरादून से मसूरी तक का सफर तय करने के लिए झड़ीपानी का रास्ता मुख्य मार्ग हुआ करता था, और बार्लोगंज इसी पारंपरिक रास्ते पर स्थित है। उस समय शासन देहरादून से मसूरी तक सीधी रेलवे लाइन बिछाने की योजना पर भी काम कर रहा था। इस रेल मार्ग के तहत बार्लोगंज में एक रेलवे स्टेशन बनाया जाना प्रस्तावित था, मगर एक गंभीर हादसे की वजह से यह पूरी परियोजना बीच में ही रोक दी गई और यहां तक कभी ट्रेन नहीं पहुंच सकी। आगे चलकर इस इलाके को एक शैक्षणिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया, जिसके तहत सेंट जॉर्ज कॉलेज, हिल बर्ड स्कूल और ओक ग्रोव स्कूल जैसे ख्यातिप्राप्त संस्थानों की नींव रखी गई। विरासत समेटे ऐतिहासिक बोर्डिंग स्कूल बार्लोगंज की ख्याति केवल इसके शांत मौसम और प्राकृतिक नजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के शिक्षा जगत में भी इसका बड़ा नाम रहा है। इस इलाके में सन 1870 में स्थापित ओक ग्रोव स्कूल स्थित है, जिसे देश का पहला रेलवे हिल स्कूल माना जाता है। इसके अलावा सन 1888 में शुरू हुआ प्रतिष्ठित सेंट जॉर्ज कॉलेज भी यहीं अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराता है। इन ऐतिहासिक स्कूलों के विशालकाय परिसर, पुरानी लाल रंग की ढलवां छतें, विस्तृत खेल के मैदान और चारों तरफ पसरी शांति यहां की पूरी आबोहवा को गरिमामय बनाती है। बार्लोगंज की सैर पर आने वाले लोग इन सदियों पुरानी शैक्षणिक इमारतों की भव्य वास्तुकला को देखने भी पहुंचते हैं। शांत माहौल, मैगी और घाटियों का विहंगम दृश्य नोएडा से मसूरी घूमने आईं पर्यटक हिमानी शर्मा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी यात्रा के शुरुआती तीन दिन मॉल रोड के पास बिताए थे, लेकिन वहां सैलानियों का बहुत ज्यादा जमावड़ा था। बार्लोगंज आने पर उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वे सही मायने में पहाड़ों की शांत वादियों के बीच पहुंची हैं। हिमानी के अनुसार यहां का मौसम मैदानी इलाकों के मुकाबले बेहद सुखद है और रास्तों के किनारे फैली प्राकृतिक हरियाली मन मोह लेती है। पहाड़ों के सफर के दौरान रास्तों पर मिलने वाली मैगी का स्वाद चखना और शाम के वक्त यहां की घुमावदार सड़कों पर टहलना सैलानियों को काफी भाता है। हिमानी बताती हैं कि यहां से दून घाटी का इतना साफ और खूबसूरत नजारा दिखाई देता है कि इंसान बिना थके घंटों बैठकर उसे निहार सकता है। बार्लोगंज के स्थानीय कैफे में बैठकर गर्म चाय की चुस्कियां लेना भी पर्यटकों के लिए एक यादगार अनुभव साबित हो रहा है। यही वजह है कि अब स्थानीय टूर गाइड भी पर्यटकों को इस शांत ठिकाने की सैर कराने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। शाम के समय आसमान में सजती है मनमोहक विंटर लाइन बार्लोगंज के आकर्षण में एक बेहद खास कुदरती नजारा भी शामिल है, जिसे विंटर लाइन कहा जाता है। सूरज ढलने के साथ ही पश्चिमी क्षितिज पर लाल, नारंगी और सुनहरे रंगों की एक सीधी समानांतर लकीर उभरती है। आसमान में रंगों की यह अनोखी छटा फोटोग्राफी के शौकीनों और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक अद्भुत दृश्य पेश करती है। यदि आप मसूरी की यात्रा पर जा रहे हैं और बाजार की गहमागहमी से दूर एकांत में कुछ वक्त बिताना चाहते हैं, तो बार्लोगंज की शांत वादियां, ऐतिहासिक रास्ते और दून घाटी का यह खूबसूरत कोना आपके सफर को हमेशा के लिए यादगार बना सकता है। इसका आप पर असर मसूरी की यात्रा की योजना बना रहे सैलानियों और स्थानीय यात्रियों के लिए बार्लोगंज एक शांत और सुगम विकल्प पेश करता है। • उत्तराखंड में: राज्य के पर्यटन मानचित्र पर बार्लोगंज जैसे शांत क्षेत्रों के जुड़ने से मुख्य हिल स्टेशनों पर गाड़ियों और भीड़ का दबाव घट सकता है। इससे सैलानियों को घंटों लंबे जाम में फंसे बिना प्रकृति के बीच शांत वातावरण का आनंद मिलता है। • पर्यटकों के लिए: अगर आप मॉल रोड के भारी शोर और भीड़भाड़ से बचना चाहते हैं, तो बार्लोगंज के शांत रास्तों और कैफे में सुकून से समय बिता सकते हैं। यहां दिन के समय ऐतिहासिक औपनिवेशिक इमारतों की सैर और शाम को विंटर लाइन देखने का अवसर मिलता है। • फोटोग्राफी और प्रकृति प्रेमियों के लिए: शाम के वक्त आसमान में बनने वाली रंगीन विंटर लाइन और दून घाटी के साफ नजारों को कैमरे में कैद करने के लिए यह जगह सबसे मुफीद है। यहां रुककर बिना किसी हलचल के घंटों तक सूर्यास्त का आनंद लिया जा सकता है। • स्थानीय गाइड और व्यवसायों के लिए: मुख्य बाजार से हटकर नए पर्यटन क्षेत्रों के लोकप्रिय होने से स्थानीय गाइडों और छोटे कैफे संचालकों के लिए आमदनी के नए अवसर बन रहे हैं। सैलानियों के इस रुख से पर्यटन का दायरा व्यापक हो रहा है। ऐसा क्यों हुआ बार्लोगंज का एक शांत और ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के रूप में उभरना इसके अतीत, भौगोलिक स्थिति और प्रमुख बाजारों में बढ़ती भीड़ का मिलाजुला परिणाम है। • मॉल रोड पर अत्यधिक दबाव: मसूरी के मुख्य बाजार और मॉल रोड पर हर मौसम में भारी भीड़, गाड़ियों के जाम और शोरगुल में लगातार बढ़ोतरी हुई है। इस वजह से पहाड़ों की यात्रा पर आने वाले सैलानी अब सुकून और शांति वाले वैकल्पिक रास्तों की तलाश करने लगे हैं। • रणनीतिक औपनिवेशिक मार्ग: ब्रिटिश काल में देहरादून से मसूरी तक पहुंचने के लिए झड़ीपानी के जिस पारंपरिक मार्ग का इस्तेमाल होता था, बार्लोगंज उसी रास्ते पर मौजूद था। इसी भौगोलिक अहमियत की वजह से यहां पुराने एस्टेट और बड़े शैक्षणिक परिसरों का निर्माण हुआ। • विफल रेल परियोजना का इतिहास: देहरादून से मसूरी तक ट्रेन चलाने की ब्रिटिश योजना के तहत बार्लोगंज में रेलवे स्टेशन बनना तय था, लेकिन एक अप्रत्याशित हादसे के चलते इस ट्रैक का काम बीच में ही रुक गया। इसके बाद यह क्षेत्र बड़े व्यावसायिक केंद्र के बजाय एक शांत शैक्षणिक और आवासीय बस्ती के रूप में विकसित हुआ। सवाल-जवाब 1. बार्लोगंज का नाम किस व्यक्ति के नाम पर रखा गया है? इतिहासकार अजय शर्मा के अनुसार, बार्लोगंज का नाम कर्नल चार्ल्स ग्रांट बार्लो के नाम पर पड़ा है। 2. बार्लोगंज में कौन से ऐतिहासिक बोर्डिंग स्कूल स्थित हैं? यहां 1870 में स्थापित ओक ग्रोव स्कूल, जिसे देश का पहला रेलवे हिल स्कूल कहा जाता है, और 1888 में बना सेंट जॉर्ज कॉलेज स्थित हैं। 3. ब्रिटिश काल में देहरादून से मसूरी जाने के लिए कौन सा रास्ता इस्तेमाल होता था? उस समय देहरादून से मसूरी जाने के लिए झड़ीपानी वाले रास्ते का इस्तेमाल होता था, जिस पर बार्लोगंज पड़ता है। 4. बार्लोगंज में प्रस्तावित रेलवे स्टेशन की परियोजना क्यों पूरी नहीं हो पाई थी? देहरादून से मसूरी तक रेलवे ट्रैक बिछाने और यहां स्टेशन बनाने की ब्रिटिश योजना एक हादसे के कारण बीच में ही रोक दी गई थी। 5. बार्लोगंज में शाम के समय दिखने वाली विंटर लाइन क्या है? शाम ढलते ही आसमान में नारंगी और लाल रंग की एक खूबसूरत प्राकृतिक लकीर दिखाई देती है, जिसे विंटर लाइन कहा जाता है। 6. मॉल रोड की तुलना में बार्लोगंज क्यों पर्यटकों को पसंद आ रहा है? मॉल रोड पर होने वाली भीड़भाड़ और जाम से दूर बार्लोगंज में चीड़ के जंगल, हरियाली, शांत माहौल और दून घाटी का मनमोहक नजारा मिलता है। https://trendkia.com/uttarakhand/mola-roda-ke-shora-se-dura-paharon-ke-sukuna-ki-talasha-men-hain-to-rukha-karen-mussoorie-ka-barlowganj-56257 TrendKia — Har trend, sabse pehle.