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  "type": "article",
  "title": "नैनीताल के जंगलों में क्यों बढ़ रही किंग कोबरा की तादाद, 15 साल में मिले 48 घोंसले",
  "summary": "उत्तराखंड के नैनीताल जिले में पिछले कुछ सालों में किंग कोबरा की मौजूदगी लगातार बढ़ी है, वन विभाग की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक यहां सांप की साइटिंग देहरादून और हरिद्वार से करीब ढाई गुना ज्यादा दर्ज हुई है।",
  "content": "उत्तराखंड का नैनीताल जिला अपनी हरी-भरी वादियों, घने जंगलों और सुहावने मौसम के लिए हमेशा से देश-विदेश के पर्यटकों को खींचता रहा है। लेकिन अब यहां के जंगलों में एक और बाशिंदे का बसेरा तेजी से बढ़ रहा है, दुनिया के सबसे जहरीले सांपों में शुमार किंग कोबरा। बीते कुछ सालों में नैनीताल के जंगलों और आसपास की बस्तियों तक इसकी मौजूदगी लगातार सामने आ रही है, और इस बदलाव पर वन विभाग से लेकर वन्यजीव विशेषज्ञों तक की नजर टिकी हुई है।\n\nअनुकूल जंगल बन रहे नया बसेरा\nवन विभाग और वन्यजीव जानकारों का कहना है कि नैनीताल के जंगल किंग कोबरा के लिए मुफीद साबित हो रहे हैं। घने बांज और चीड़ के पेड़, पर्याप्त नमी, पानी के स्रोत और शिकार के लिए भरपूर भोजन, यही वे वजहें हैं जो इस सांप को यहां खींच रही हैं। जो इलाका कभी सिर्फ पर्यटकों के लिए जाना जाता था, वह अब इस विशालकाय सांप के लिए भी अनुकूल ठिकाना बनता जा रहा है।\n\nदेहरादून और हरिद्वार से ढाई गुना ज्यादा सक्रियता\nउत्तराखंड वन विभाग की रिसर्च विंग की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि पारंपरिक रूप से किंग कोबरा जिन रेन फॉरेस्ट इलाकों में पाया जाता है, उनसे बाहर नैनीताल ऐसा जिला बनकर उभरा है जहां इसकी रिकॉर्डेड मौजूदगी सबसे ज्यादा दर्ज हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक देहरादून और हरिद्वार जैसे जिलों के मुकाबले नैनीताल में किंग कोबरा की साइटिंग करीब ढाई गुना ज्यादा दर्ज की गई है, जो साफ इशारा करती है कि इस जिले के जंगल इस सांप के लिए खास तौर पर अनुकूल बनते जा रहे हैं।\n\n2006 की पहली साइटिंग से मुक्तेश्वर के रिकॉर्ड तक\nउत्तराखंड में किंग कोबरा सबसे पहले साल 2006 में नैनीताल जिले की भवाली फॉरेस्ट रेंज में देखा गया था। इसके छह साल बाद, 2012 में मुक्तेश्वर में समुद्र तल से 2303 मीटर की ऊंचाई पर इसका एक घोंसला मिला, जो अपने आप में बड़ी बात थी क्योंकि इतनी ऊंचाई पर किंग कोबरा का घोंसला मिलना दुनिया भर में एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड माना गया। वन्यजीव शोधकर्ता जगजीवन सिंह धामी के मुताबिक उत्तराखंड में मुख्य रूप से स्पेक्टैकल्ड कोबरा और किंग कोबरा, ये दो प्रजातियां पाई जाती हैं। अब किंग कोबरा नैनीताल, ज्योलिकोट, रामगढ़ और आसपास के जंगलों में भी नजर आने लगा है। आमतौर पर यह गर्म और नम इलाकों को पसंद करता है, इसलिए पहाड़ों में इसकी बढ़ती मौजूदगी बदलते तापमान और जलवायु परिवर्तन की तरफ भी इशारा करती है।\n\n15 साल में मिले 48 घोंसले\nनैनीताल स्थित गोविंद बल्लभ पंत उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान के रेंजर आनंद लाल आर्या बताते हैं कि साल 2011 में ज्योलिकोट के पास आबादी वाले इलाके में ही किंग कोबरा का एक घोंसला मिला था। इसके बाद भवाली, रामगढ़ और कई अन्य जगहों से भी घोंसलों की जानकारी आती रही। उनके मुताबिक 2011 से अब तक करीब 48 किंग कोबरा के घोंसले दर्ज किए जा चुके हैं। यह सांप अपना घोंसला बांज और चीड़ के पिरूल यानी सूखी पत्तियों से तैयार करता है, और एक बार में करीब 16 से 18 अंडे देता है।\n\n18 फीट लंबा किंग कोबरा और मानसून का असर\nवन विभाग के स्नेक रेस्क्यू विशेषज्ञ निमीष दानू के अनुसार नैनीताल का बढ़ता तापमान और यहां के जंगलों की परिस्थितियां किंग कोबरा के लिए मुफीद साबित हो रही हैं। किंग कोबरा दूसरे सांपों का शिकार करता है, और नैनीताल के जंगलों में उसकी पसंद का भोजन भरपूर मात्रा में मौजूद है। मानसून के दौरान जब नमी बढ़ती है तो यह अपने बिलों से बाहर निकल आता है और कभी-कभी आबादी वाले इलाकों तक भी पहुंच जाता है। उन्होंने बताया कि अब तक नैनीताल में करीब 18 फीट लंबा किंग कोबरा भी सुरक्षित रेस्क्यू किया जा चुका है।\n\nसंरक्षित प्रजाति, अंडों की 80 से 100 दिन तक रखवाली\nकिंग कोबरा भारत में वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत संरक्षित प्रजाति है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह दुनिया का इकलौता सांप है जिसकी मादा अंडे देने से पहले खुद घोंसला तैयार करती है और करीब 80 से 100 दिनों तक अंडों की रखवाली करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अंडों से बच्चे निकलने से ठीक पहले मादा घोंसला छोड़कर चली जाती है।\n\nवन विभाग की अपील\nवन विभाग ने लोगों से अपील की है कि अगर कहीं किंग कोबरा दिखे तो उससे दूरी बनाए रखें, उसे पकड़ने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश बिल्कुल न करें और तुरंत वन विभाग को इसकी सूचना दें।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: किंग कोबरा जैसे संरक्षित सांपों की पहाड़ी इलाकों में बढ़ती मौजूदगी वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए जलवायु परिवर्तन का एक संकेत है, जो देशभर के पहाड़ी क्षेत्रों में वन्यजीवों के बदलते व्यवहार को समझने में मदद करता है।\n• नैनीताल में: स्थानीय लोगों और पर्यटकों को मानसून के दौरान भवाली, ज्योलिकोट, रामगढ़ और मुक्तेश्वर जैसे इलाकों में सतर्क रहना होगा, क्योंकि नमी बढ़ने पर किंग कोबरा बिलों से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. नैनीताल में किंग कोबरा की मौजूदगी क्यों बढ़ रही है?\nघने बांज और चीड़ के जंगल, पर्याप्त नमी, जलस्रोत और भरपूर भोजन जैसे अनुकूल हालात किंग कोबरा को नैनीताल की तरफ खींच रहे हैं।\n\n2. उत्तराखंड में किंग कोबरा सबसे पहले कब और कहां देखा गया था?\nउत्तराखंड में किंग कोबरा सबसे पहले साल 2006 में नैनीताल जिले की भवाली फॉरेस्ट रेंज में देखा गया था।\n\n3. नैनीताल में अब तक कितने किंग कोबरा घोंसले मिल चुके हैं?\nसाल 2011 से अब तक नैनीताल में करीब 48 किंग कोबरा के घोंसले दर्ज किए जा चुके हैं।\n\n4. क्या नैनीताल में देहरादून और हरिद्वार से ज्यादा किंग कोबरा दिखते हैं?\nहां, वन विभाग की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक नैनीताल में किंग कोबरा की साइटिंग देहरादून और हरिद्वार से करीब ढाई गुना ज्यादा दर्ज हुई है।\n\n5. नैनीताल में अब तक मिला सबसे लंबा किंग कोबरा कितना बड़ा था?\nवन विभाग के मुताबिक नैनीताल में करीब 18 फीट लंबा किंग कोबरा सुरक्षित रेस्क्यू किया जा चुका है।\n\n6. किंग कोबरा दिखने पर क्या करना चाहिए?\nवन विभाग की अपील है कि किंग कोबरा दिखने पर उससे दूरी बनाए रखें, उसे पकड़ने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश न करें और तुरंत वन विभाग को सूचना दें।",
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  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-07-14",
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    "नैनीताल",
    "किंग कोबरा",
    "उत्तराखंड वन विभाग",
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    "सांप का घोंसला"
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