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  "title": "नैनीताल में चिकित्सा व्यवस्था की नाकामी ने छीनी जान, 1.5 करोड़ के खर्च और इलाज के आभाव में तोड़ा दम",
  "summary": "नैनीताल के ज्योलिकोट क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और समय पर इलाज न मिलने से दो लोगों की मौत हो गई है, जिसमें 16 वर्षीय रितेश जीना भी शामिल है।",
  "content": "पहाड़ी इलाकों में किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आना महज एक शारीरिक कष्ट नहीं, बल्कि अस्पतालों की कमी, आर्थिक तंगी और समय पर उच्च स्तरीय चिकित्सा न मिल पाने की एक अंतहीन और दर्दनाक जंग बन जाता है। उत्तराखंड के नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाले ज्योलिकोट इलाके में हाल ही में सामने आई मौतों ने इन व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। गांजा क्षेत्र के सड़ियाताल गांव के रहने वाले 16 साल के किशोर रितेश जीना की पेट से जुड़ी गंभीर बीमारी के कारण मौत हो गई। इसके अलावा इसी क्षेत्र की रहने वाली 26 साल की नीमा जोशी ने भी उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। इन दो असमय मौतों के बाद पूरे इलाके में न केवल खौफ का माहौल है, बल्कि क्षेत्र की लचर स्वास्थ्य सेवाओं और पेयजल आपूर्ति पर भी गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। रितेश के परिवार के सदस्यों का कहना है कि उसे सबसे पहले पेट में दर्द की शिकायत हुई थी, जिसके बाद वे उसे तुरंत हल्द्वानी के मैट्रिक्स अस्पताल ले गए। वहां आपातकालीन कक्ष में उसका इलाज किया गया और उसे ड्रिप लगाई गई, जिससे उसकी हालत में थोड़ा सुधार दिखा और परिवार उसे घर ले आया, लेकिन कुछ ही वक्त के अंतराल पर उसकी तबीयत फिर से बिगड़ने लगी। रितेश की चाची शोभा जीना ने बताया कि रक्षाबंधन के दिन अचानक उसकी हालत बहुत ज्यादा खराब हो गई, जिसके बाद परिवार उसे दोबारा अस्पताल ले गया और चिकित्सकों ने उन्हें किसी पेट के विशेषज्ञ से परामर्श लेने की सलाह दी। इसके बाद हल्द्वानी के नीलकंठ अस्पताल में डॉ. गौरव सिंघल की देखरेख में उसका इलाज कराया गया।\n\nदिल्ली के अस्पतालों के चक्कर और इलाज का भारी खर्च\nपरिजनों के अनुसार, जब रितेश की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और उसकी हालत लगातार नाजुक बनी रही, तब डॉक्टरों ने उसे दिल्ली ले जाने की सलाह दी। परिवार उसे लेकर दिल्ली पहुंच गया, लेकिन वहां भी उनकी मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही थीं। रितेश के चचेरे भाई रोहित जीना ने बताया कि परिवार ने एम्स और आईएलबीएस समेत कई बड़े अस्पतालों में उसे भर्ती कराने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन किसी भी जगह से तत्काल दाखिला नहीं मिल सका। उन्होंने आरोप लगाया कि हल्द्वानी के जिस निजी अस्पताल में पहले उसका इलाज हुआ था, उन्होंने पर्चे पर यह लिख दिया था कि रितेश के लीवर और अन्य मुख्य अंग पूरी तरह से काम करना बंद कर चुके हैं और डैमेज हो चुके हैं, इसी कारण कई बड़े अस्पतालों ने इस केस को अपने हाथ में लेने से मना कर दिया। काफी दौड़-भाग के बाद दिल्ली के एक अन्य अस्पताल में उसे दिखाया गया, जहां के डॉक्टरों ने परिवार को बताया कि अब रितेश को बचाने के लिए लीवर ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत है।\n\nफंड जुटाने की जद्दोजहद और वेंटिलेटर पर संघर्ष\nशोभा जीना ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि अस्पताल के अधिकारियों की ओर से करीब 40 लाख रुपये पहले जमा कराने की बात कही गई और कुल इलाज का खर्च लगभग 1 से 1.5 करोड़ रुपये तक आने का अनुमान जताया गया। एक सामान्य परिवार के लिए इतनी बड़ी धनराशि का इंतजाम कर पाना लगभग असंभव था, फिर भी बच्चे की जान बचाने की खातिर परिवार ने अपनी सारी जमापूंजी, एफडी तोड़ने और अपनी ज्वैलरी तक बेचने का मन बना लिया था। शोभा जीना का कहना है कि उस वक्त उनके लिए पैसे का कोई महत्व नहीं था, उनकी सिर्फ एक ही कोशिश थी कि किसी तरह उनका बच्चा ठीक होकर घर लौट आए, मगर अस्पताल में भर्ती होने के लिए उन्हें दर-दर भटकना पड़ा। अंततः भारी मशक्कत के बाद रितेश को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां बेड मिलने के लिए भी लगभग 6 घंटे लंबा इंतजार करना पड़ा, इस देरी की वजह से उसकी स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई और अंततः उसे वेंटिलेटर पर रखना पड़ा, लेकिन तमाम मेडिकल कोशिशों के बावजूद वह जिंदगी की इस जंग में हार गया।\n\nपरिवार का दर्द और स्थानीय व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल\nरोहित जीना का कहना है कि रितेश उनके परिवार का एक बेहद होनहार और लाडला सदस्य था, जो पढ़ाई में भी काफी आगे था। रोहित का मानना है कि यदि ज्योलिकोट या हल्द्वानी के स्तर पर ही उसे समय रहते सही और सटीक उपचार मिल जाता, तो शायद आज वह उनके बीच सुरक्षित होता। अब यह परिवार सिर्फ अपने प्रिय को खोने के गहरे सदमे से नहीं जूझ रहा, बल्कि वे यह भी जानना चाहते हैं कि बीमारी के शुरुआती दौर में ही इस पर गंभीरता से ध्यान क्यों नहीं दिया गया। रोहित ने स्थानीय स्तर पर फैली गंदगी और सीवर तथा पेयजल की खराब व्यवस्था पर भी तीखे सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार उन्हें ऐसी जानकारी मिली है कि इलाके का कोई सीवर प्लांट बुरी तरह ओवरफ्लो हो गया था, और परिवार का यह सीधा सवाल है कि यदि ऐसा हुआ था तो इसकी निगरानी करने वाले अधिकारी कौन थे और समय रहते इस खामी को दूर क्यों नहीं किया गया, जबकि आज भी गांव के कई लोग अलग-अलग बीमारियों से जूझ रहे हैं।\n\nइन तमाम घटनाओं के सामने आने के बाद हरकत में आए स्वास्थ्य विभाग ने ज्योलिकोट क्षेत्र में कड़ा अलर्ट जारी कर दिया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. रश्मि पंत ने एक वीडियो संदेश जारी कर स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य विभाग की विशेष टीमें लगातार क्षेत्र में निगरानी रख रही हैं। सभी आशा कार्यकर्ताओं को यह सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे घर-घर जाकर लोगों के स्वास्थ्य का जायजा लें और यदि कोई भी संदिग्ध मरीज मिलता है तो उसकी सूचना तुरंत विभाग को दी जाए। ज्योलिकोट के ब्लॉक प्रमुख डॉ. हरीश बिष्ट ने बताया कि इस क्षेत्र में जून के आखिरी हफ्ते से ही बीमारियों के फैलने की शुरुआत हो गई थी। उनका कहना है कि शुरुआत में डायरिया और उल्टी-दस्त के मामले सामने आए थे और अब टायफाइड तथा पीलिया जैसी गंभीर बीमारियों ने स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ वहां की पेयजल व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि भविष्य में गांव का कोई भी व्यक्ति बीमार पड़ेगा तो उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया जाएगा। इसके अलावा सभी जलस्रोतों पर वाटर फिल्टर लगाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है और सीएमओ से कहकर घर-घर क्लोरीन की गोलियां बंटवाने का निर्देश दिया गया है।\n\nज्योलिकोट में हुई इन मौतों के बाद सबसे बड़ा और मुख्य सवाल इस बीमारी के असली कारणों को लेकर बना हुआ है। लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या इसके पीछे दूषित पेयजल मुख्य वजह है, या फिर सीवर प्रबंधन में बरती गई किसी बड़ी लापरवाही ने इन हालात को पैदा किया, या फिर कोई दूसरा अज्ञात संक्रमण इसके पीछे सक्रिय है। इन तमाम सवालों के पुख्ता जवाब विस्तृत जांच के बाद ही बाहर आ सकेंगे। फिलहाल एक परिवार ने अपना 16 साल का होनहार बेटा गंवा दिया है और दूसरा परिवार दो छोटी बच्चियों की मां के बिना रह गया है, और हर जुबान पर बस यही एक टीस है कि यदि समय पर सही इलाज मिल जाता तो आज उनका अपना उनके बीच जिंदा होता।\n\nइसका आप पर असर\nज्योलिकोट और नैनीताल क्षेत्र में सामने आई स्वास्थ्य संबंधी लापरवाहियों और मौतों ने स्थानीय निवासियों के लिए समय पर इलाज और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता पर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।\n\n• भारत में: सरकारी और निजी अस्पतालों में अत्यधिक महंगे इलाज तथा आपातकालीन स्थिति में बेड मिलने में होने वाली देरी देश के आम नागरिकों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस तरह के मामलों से स्वास्थ्य तंत्र की खामियां उजागर होती हैं।\n• नैनीताल में: ज्योलिकोट और सड़ियाताल क्षेत्र के स्थानीय लोगों को दूषित पेयजल और सीवर ओवरफ्लो जैसी समस्याओं के तत्काल समाधान की सख्त जरूरत है। क्षेत्रवासियों को सलाह दी जाती है कि वे स्वास्थ्य विभाग द्वारा बांटी जा रही क्लोरीन गोलियों का उपयोग करें और किसी भी गंभीर लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह घटना किस क्षेत्र की है?\nयह घटना उत्तराखंड के नैनीताल जिले के ज्योलिकोट क्षेत्र और सड़ियाताल गांव की है।\n\n2. मृतक रितेश जीना की उम्र कितनी थी?\nरितेश जीना की उम्र 16 वर्ष थी और वह पेट से जुड़ी बीमारी से पीड़ित था।\n\n3. रितेश के इलाज के लिए किस अस्पताल में सलाह दी गई थी?\nहल्द्वानी के अस्पतालों से रितेश को दिल्ली के बड़े अस्पतालों में ले जाने की सलाह दी गई थी।\n\n4. इलाज का कुल खर्च कितना बताया गया था?\nअस्पताल के अनुसार रितेश के लीवर ट्रांसप्लांट और कुल इलाज का खर्च लगभग 1 से 1.5 करोड़ रुपये आने वाला था।\n\n5. स्वास्थ्य विभाग ने क्या कदम उठाए हैं?\nसीएमओ ने वीडियो जारी कर निगरानी बढ़ाई है और आशा कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर सर्वे करने के निर्देश दिए गए हैं।",
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  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-09-06",
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