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  "type": "article",
  "title": "नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड का आरोपी सुरेंद्र कोली हरिद्वार में फंदे पर झूला, सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बाद चला रहा था चाय की दुकान",
  "summary": "निठारी कांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली ने हरिद्वार में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली है। अदालत से पूरी तरह बरी होने के बाद वह वहां एक चाय की दुकान चला रहा था।",
  "content": "नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड ने एक समय पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। मासूम बच्चों और महिलाओं के साथ हुई बर्बरता की इस कहानी का अंत अब तीर्थ नगरी हरिद्वार में एक चाय की दुकान पर बेहद नाटकीय तरीके से हुआ है। मामले के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली, जिसे हाल ही में अदालत से पूरी तरह बरी कर दिया गया था, ने हरिद्वार में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। लगभग दो दशकों तक जेल की कालकोठरी में रहने और कई बार फांसी के फंदे के बिल्कुल नजदीक पहुंचने के बाद, बरी होकर बाहर आए सुरेंद्र कोली का इस तरह से अंत होना इस पूरे घटनाक्रम में एक और बड़ा मोड़ लेकर आया है। कानून के लंबे संघर्ष और कई कानूनी पेचीदगियों से गुजरने के बाद आखिरकार इस खौफनाक अध्याय का अंत हो गया है।\n\n \n\nसेक्टर-31 की कोठी नंबर D-5 से सामने आया खौफनाक सच\n\nदिसंबर की कड़ाके की ठंड के बीच 29 दिसंबर 2006 का वह दिन नोएडा के इतिहास में कभी न भूलने वाला दिन बन गया। सेक्टर-31 में स्थित कोठी नंबर D-5 के बाहर अचानक पुलिस की गाड़ियों और मीडियाकर्मियों का जमावड़ा लगने लगा। यह कोठी स्थानीय कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर की थी। पुलिस ने जब कोठी के पिछले हिस्से में मौजूद नाले और उसके आसपास के इलाके में खुदाई और तलाशी अभियान शुरू किया, तो वहां से जो कुछ भी बरामद हुआ उसने देखने वालों के रोंगटे खड़े कर दिए। नाले के भीतर से बड़ी संख्या में इंसानी खोपड़ियां, बच्चों के कंकाल, हड्डियां और उनके फटे-पुराने कपड़े बरामद किए गए। इस वीभत्स दृश्य को देखकर पूरा देश स्तब्ध रह गया था और शांत रहने वाला यह रिहायशी इलाका अचानक देश के सबसे बड़ा क्राइम सीन में बदल गया।\n\n \n\nएक लाचार पिता की तलाश ने खोला राज\n\nइस कोठी के भीतर चल रहे खौफनाक खेल का पर्दाफाश उत्तराखंड से आए एक गरीब पिता नंदलाल के संघर्ष के कारण हुआ था। नंदलाल अपनी बेटी की तलाश में भटक रहे थे, जो 7 मई 2006 को काम की तलाश में घर से निकली थी। उसने अपने परिवार को बताया था कि कोठी मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर ने उसे काम देने के बहाने बुलाया है। जब वह देर रात तक वापस नहीं लौटी, तो नंदलाल अपनी बेटी को ढूंढते हुए पंढेर की कोठी पर पहुंचे। लेकिन वहां मौजूद लोगों ने साफ कह दिया कि ऐसी कोई लड़की वहां नहीं आई थी। नंदलाल ने स्थानीय पुलिस से मदद की गुहार लगाई, लेकिन शुरुआती दौर में पुलिस ने उनकी शिकायत पर ध्यान देने से साफ इनकार कर दिया।\n\nपुलिस के अड़ियल रवैये के बाद नंदलाल ने हार नहीं मानी और अदालत का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट के कड़े रुख के बाद, धारा 156/3 के तहत सेक्टर-20 नोएडा थाने में 8 मई 2006 को गुमशुदगी का मुकदमा दर्ज किया गया। जांच के दौरान यह बात भी सामने आई कि निठारी इलाके से कई अन्य बच्चे और महिलाएं भी लगातार गायब हो रहे थे। पुलिस ने जब इन कड़ियों को जोड़ा, तो शक की सुई कोठी नंबर D-5 की तरफ घूमी। आखिरकार 29 दिसंबर 2006 को पुलिस टीम इस कोठी पर पहुंचे और नाले से नरकंकाल मिलने का सिलसिला शुरू हुआ। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जनवरी 2007 में इस पूरे केस की जांच CBI को सौंप दी गई थी।\n\n \n\nसुरेंद्र कोली की खौफनाक कार्यप्रणाली और नरभक्षिता का खुलासा\n\nCBI की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, कोठी के भीतर हुए अत्याचारों की ऐसी कहानियां सामने आईं जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। जांच में साबित हुआ कि इस पूरे नरसंहार का मुख्य कर्ताधर्ता मोनिंदर सिंह पंढेर का घरेलू नौकर और रसोइया सुरेंद्र कोली था। कोली का शिकार करने का तरीका बेहद शातिराना था। वह कोठी के पास से गुजरने वाले छोटे बच्चों और महिलाओं को टॉफी, चॉकलेट या पैसों का लालच देकर कोठी के भीतर बुलाता था। कई बार वह उन्हें डरा-धमकाकर भी अंदर ले जाता था। कोठी के भीतर पहुंचते ही वह उनके साथ दुष्कर्म जैसी घिनौनी वारदात को अंजाम देता था और फिर बेरहमी से उनकी हत्या कर देता था। इसके बाद जो खुलासे हुए वे और भी अधिक भयावह थे। सुरेंद्र कोली ने पुलिस और अदालत के सामने कबूल किया था कि वह शवों के टुकड़े-टुकड़े करता था और उनके अंगों को पकाकर खाता था। वह पीड़ितों के कपड़ों और अन्य सामानों को नाले में फेंककर सबूत मिटा देता था।\n\n \n\n2014 की वह रात जब टल गई थी फांसी\n\nसुरेंद्र कोली को निचली अदालतों ने उसके कबूलनामे और बरामदगी के आधार पर दोषी मानते हुए निठारी कांड के 13 मामलों में मौत की सजा सुनाई थी। साल 2014 के सितंबर महीने में उसकी फांसी की तारीख भी तय हो गई थी। रविवार, 7 सितंबर 2014 को मेरठ सेंट्रल जेल से यह खबर आई कि सोमवार को कोली को फांसी के फंदे पर लटकाया जाएगा। चूंकि उस दिन रविवार था और अदालतें बंद थीं, इसलिए कोली के पास अपील करने का कोई जरिया नहीं बचा था। ऐसे नाजुक समय में देश की प्रसिद्ध वकील इंदिरा जय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा से संपर्क किया और रात में ही इस मामले की सुनवाई का अनुरोध किया।\n\nमामले की गंभीरता को देखते हुए चीफ जस्टिस ने अनुमति दी और रात के करीब 1:00 बजे सीनियर जस्टिस एचएल दत्तू के आवास पर विशेष अदालत लगाई गई। रात के अंधेरे में चली इस सुनवाई के बाद अदालत ने सुरेंद्र कोली की फांसी पर एक हफ्ते की रोक लगा दी। इस नाटकीय घटनाक्रम ने कोली को फांसी के फंदे से महज कुछ घंटों पहले बचा लिया था।\n\n \n\nअदालती फैसलों में उलटफेर और अंतिम बरी होना\n\n2014 की उस रात को मिली राहत के बाद सुरेंद्र कोली के कानूनी मामले में बड़े बदलाव आने शुरू हुए। साल 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुरेंद्र कोली को 12 मामलों में बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों के तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए थे। अदालत का कहना था कि कोली को लगभग 60 दिनों तक पुलिस हिरासत में रखने के बाद जो कबूलनामा दर्ज किया गया था, उसे पूरी तरह स्वैच्छिक और विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। इसके अलावा कोठी से हुई बरामदगी की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए गए।\n\nइस फैसले के खिलाफ जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंचा, तो 30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के बरी करने के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद कोली के खिलाफ केवल एक अंतिम मामला बचा था। 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उस अंतिम मामले में भी कोली की सजा को रद्द कर उसे पूरी तरह बरी कर दिया। इस प्रकार, कई वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद सुरेंद्र कोली को कानूनन आजाद कर दिया गया।\n\n \n\nहरिद्वार की चाय की दुकान पर आखिरी सांस\n\nजेल से छूटने के बाद सुरेंद्र कोली ने अपनी पुरानी पहचान छोड़कर एक सामान्य जीवन जीने का प्रयास किया। वह उत्तराखंड के हरिद्वार शहर में आ गया और भूपतवाला इलाके में रहने लगा। अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए उसने वहां एक छोटी सी चाय की दुकान खोली थी। लेकिन उसकी यह नई जिंदगी ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। अचानक खबर आई कि कोली ने अपनी इसी चाय की दुकान पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। स्थानीय लोगों की सूचना पर हरिद्वार कोतवाली पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है और आत्महत्या के कारणों की जांच शुरू कर दी है। इसके साथ ही देश के सबसे चर्चित और डरावने आपराधिक मामलों में से एक का मुख्य पात्र हमेशा के लिए खामोश हो गया।\n\nइसका आप पर असर\nइस घटना का असर आपराधिक मामलों की जांच और समाज में हाशिए पर रह रहे परिवारों की सुरक्षा नीतियों पर पड़ेगा।\n\n• राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा: देश में बच्चों की सुरक्षा और उनके गायब होने के मामलों में पुलिस की त्वरित कार्रवाई पर अब देशव्यापी बहस तेज हो सकती है। इसके जरिए कानून व्यवस्था को और अधिक संवेदनशील बनाने की मांग उठेगी।\n• कानूनी हिरासत के नियम: लंबे समय तक पुलिस हिरासत में रखकर लिए गए कबूलनामों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से देश में जांच की गुणवत्ता सुधरेगी। अब पुलिस को केवल मौखिक कबूलनामों के बजाय वैज्ञानिक और ठोस सबूतों पर निर्भर रहना होगा।\n• उत्तर प्रदेश में पुलिस सुधार: निठारी कांड में नोएडा पुलिस की शुरुआती लापरवाही को देखते हुए स्थानीय प्रशासन गुमशुदगी के मामलों में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाएगा। अब उत्तर प्रदेश में बच्चों के गायब होने की सूचना पर तुरंत एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य होगा।\n• उत्तराखंड में सुरक्षा: उत्तराखंड के हरिद्वार में बिना सत्यापन के रहने वाले बाहरी लोगों और प्रवासियों की निगरानी को और सख्त किया जाएगा। स्थानीय निवासियों और व्यापारियों को अब अपने कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन कराना जरूरी होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह घटना पुलिस प्रशासन की शुरुआती कोताही, कमजोर वर्गों की असुरक्षा और दोषपूर्ण कानूनी जांच का परिणाम थी, जिसने पूरे मामले को इस मोड़ पर खड़ा किया।\n\n• प्रशासनिक शिथिलता: नोएडा पुलिस ने शुरुआत में लापता बच्चों की रिपोर्ट दर्ज करने में भारी कोताही बरती। यदि पीड़ित पिता नंदलाल की शिकायत पर तुरंत कार्रवाई की जाती, तो इस नरसंहार को बहुत पहले रोका जा सकता था।\n• असुरक्षित सामाजिक माहौल: निठारी इलाके के गरीब और प्रवासी परिवारों के बच्चों को सुरेंद्र कोली आसानी से बहला-फुसला लेता था। इन बच्चों की सुरक्षा और निगरानी के लिए कोई मजबूत सुरक्षात्मक ढांचा मौजूद नहीं था।\n• दोषपूर्ण पुलिस जांच: जांच एजेंसियों ने वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने के बजाय कोली के हिरासत में लिए गए कबूलनामे पर पूरा केस टिका दिया। यही कारण था कि न्यायालय ने 60 दिन की लंबी पुलिस हिरासत में दर्ज इस बयान को खारिज कर दिया, जिससे सारे मामले कोर्ट में गिर गए।\n• मानसिक और सामाजिक दबाव: जेल से बरी होने के बाद समाज में दोबारा पहचान स्थापित करना और अतीत के साये से बाहर आना बेहद कठिन था। इस मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव के कारण उसने हरिद्वार में खुदकुशी का रास्ता चुना।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुरेंद्र कोली कौन था?\nसुरेंद्र कोली नोएडा के कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर का घरेलू नौकर और रसोइया था, जो निठारी नरसंहार का मुख्य दोषी था।\n\n2. निठारी कांड का खुलासा कब और कैसे हुआ था?\nइस कांड का खुलासा 29 दिसंबर 2006 को हुआ था, जब नोएडा के सेक्टर-31 में कोठी नंबर D-5 के पीछे नाले से बच्चों की खोपड़ियां और नरकंकाल मिले थे।\n\n3. सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली को क्यों बरी किया?\nकोर्ट ने 60 दिनों की लंबी पुलिस हिरासत में दर्ज किए गए कोली के कबूलनामे को अविश्वसनीय माना और सबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया।\n\n4. 2014 में सुरेंद्र कोली की फांसी कैसे टली थी?\nसितंबर 2014 में फांसी से ऐन पहले वकील इंदिरा जय सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने रात 1 बजे विशेष सुनवाई कर फांसी पर रोक लगा दी थी।\n\n5. सुरेंद्र कोली की मृत्यु कैसे हुई?\nजेल से बरी होने के बाद सुरेंद्र कोली हरिद्वार के भूपतवाला इलाके में चाय की दुकान चला रहा था, जहां उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।",
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  "publishedAt": "2026-09-18",
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