# पितरों के तर्पण के लिए क्यों खास है हरिद्वार की नारायणी शिला, जानिए गयासुर और भगवान के कमलासन की कथा

> पितृपक्ष की शुरुआत के साथ ही हरिद्वार स्थित प्राचीन नारायणी शिला पर पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं का तांता लग रहा है, जिसका संबंध भगवान विष्णु के कमलासन से जुड़ा है।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-09-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/pitaron-ke-tarpana-ke-lie-kyon-khasa-hai-haridwar-ki-narayani-shila-janie-gayasura-aura-bhagavana-ke-kamalasana-ki-katha-39252 · **Language:** Hindi
**Tags:** पितृपक्ष, नारायणी शिला, हरिद्वार, पिंडदान, तर्पण, सर्वपितृ अमावस्या, भगवान विष्णु, गयासुर

भाद्रपद पूर्णिमा के उपरांत आश्विन कृष्ण पक्ष की शुरुआत के साथ ही पितरों को समर्पित पावन पखवाड़ा आरंभ हो चुका है। पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और आत्मिक शांति अर्पित करने का यह काल आगामी 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन पूरा होगा। इन 16 दिनों के दौरान वंशज अपने पूर्वजों की तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज जैसे कर्मकांड संपन्न करते हैं। सनातन परंपरा में इस कालखंड के दौरान गंगा स्नान और तीर्थ स्थलों पर पिंडदान का अत्यंत गहरा महत्व माना गया है। यूं तो उत्तराखंड की पावन नगरी हरिद्वार को मोक्षदायिनी और हर की पौड़ी के लिए जाना जाता है, परंतु पितृ तर्पण के संदर्भ में यहां स्थित नारायणी शिला का स्थान सबसे अलग और विलक्षण है।

## विष्णु के हृदय स्वरूप में प्रतिष्ठित है यह शिला
गंगा किनारे विराजमान यह पावन स्थल पितृ कर्मों के लिए समूचे भारत में विख्यात है। धार्मिक मान्यताओं में बिहार के गयाजी के पश्चात नारायणी शिला को ही पितरों की मुक्ति का सबसे फलदायी केंद्र स्वीकार किया गया है। यही कारण है कि पितृपक्ष के आरंभ होते ही देश के कोने-कोने से और विदेशों से भी हजारों श्रद्धालु अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के निमित्त यहां पहुंचते हैं। स्कंद पुराण के प्रमाणों के अनुसार, यह शिला साक्षात भगवान विष्णु के विग्रह का हृदय मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस पावन शिला पर बैठकर जो भी प्रार्थना अथवा तर्पण किया जाता है, वह सीधे श्रीहरि के श्रीचरणों तक पहुंचता है और पितृ ऋण से मुक्ति दिलाकर पूर्वजों को सीधे मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

## पौराणिक आख्यान: गयासुर और कमलासन का संग्राम
इस शिला की स्थापना के पीछे वायु पुराण और स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित एक अत्यंत रोचक पौराणिक वृत्तांत जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार, गयासुर नामक असुर अपने संचित पापों के बोझ से मुक्ति पाना चाहता था और उसने इसके निवारण का उपाय देवर्षि नारद से पूछा। देवर्षि ने उसे समझाया कि पापों से छुटकारा केवल दो ही मार्गों से संभव है, या तो प्रभु की घोर तपस्या में लीन हो जाया जाए अथवा साक्षात भगवान के साथ युद्ध करके उनके अस्त्र से प्राण त्याग दिए जाएं। तामसिक और असुर स्वभाव के वशीभूत होकर गयासुर ने दूसरा मार्ग चुना और वह सीधे बद्रीधाम पहुंच गया।

वहां पहुंचने पर जब उसने देखा कि भगवान बदरीनाथ के मंदिर के कपाट बंद हैं, तो वह प्रचंड क्रोध में आ गया। अहंकार और आवेश में आकर वह श्रीहरि के पवित्र कमलासन को ही अपनी भुजाओं में उठाकर ले जाने लगा। जब भगवान विष्णु ने उसे केस-लोचन तीर्थ के निकट रोका, तो दोनों के मध्य भीषण युद्ध छिड़ गया। युद्ध के दौरान जब भगवान ने अपनी गदा से असुर पर प्रहार किया, तो गयासुर ने आत्मरक्षा के लिए उस दिव्य कमलासन को ढाल के रूप में आगे कर दिया। भगवान की गदा की भीषण चोट से वह कमलासन तीन टुकड़ों में टूटकर बिखर गया।

## कमलासन के तीन खंड और उनकी पावन प्रतिष्ठा
गदा के प्रहार से खंडित हुए कमलासन का प्रथम भाग हरिद्वार में गंगा के तट पर गिरा, जहां आज नारायणी शिला मंदिर स्थापित है और श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक शीश नवाते हैं। उसका दूसरा भाग बद्रीनाथ क्षेत्र में स्थित ब्रह्मकपाल पर जाकर गिरा, जिसे भी पितृ विसर्जन के लिए परम पावन तीर्थ माना जाता है। वहीं, कमलासन का तीसरा अंश गयाजी में गिरा, जो सनातन परंपरा में पिंडदान का सबसे प्रमुख केंद्र बना। यही कारण है कि नारायणी शिला को गयाजी और ब्रह्मकपाल के समतुल्य ही मोक्ष का परम पावन द्वार माना जाता है।

## वर्ष 2026 में तिथियों का गणित और श्राद्ध का विधान
धार्मिक पंचांग के नियमानुसार पितृपक्ष की शुरुआत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से मानी जाती है और इसका समापन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि यानी सर्वपितृ अमावस्या पर होता है। वर्ष 2026 में यह पवित्र अवधि 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर शनिवार को संपन्न होगी। इस वर्ष काल गणना में एक विशेष संयोग देखने को मिल रहा है। तिथि क्षय होने की वजह से कुल 15 दिनों के भीतर ही 16 दिनों के श्राद्ध संपन्न कराए जाएंगे। पंचांग के अनुसार 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन आयोजित होगा। वैदिक व्यवस्था के अनुसार परिवार के दिवंगत सदस्यों का श्राद्ध उनकी मृत्यु की तिथि के दिन ही किया जाता है, किंतु जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनके निमित्त सर्वपितृ अमावस्या के दिन पिंडदान और तर्पण किया जाना शास्त्र सम्मत है।

## इसका आप पर असर
पितृपक्ष के आरंभ होने से देश भर के श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के श्राद्ध कर्म की योजना बनाने और सही तिथि का चयन करने में मदद मिलेगी।

- **भारत में:** पंचांग में तिथि क्षय के चलते इस बार 15 दिनों में ही 16 दिनों के श्राद्ध संपन्न करने होंगे। जिन परिवारों में चतुर्थी या पंचमी तिथि का श्राद्ध होता है, उन्हें 30 सितंबर को ही दोनों तिथियों के निमित्त कर्मकांड पूर्ण करने होंगे।
- **हरिद्वार में:** धर्मनगरी में नारायणी शिला और गंगा घाटों पर श्राद्ध अनुष्ठान के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। स्थानीय प्रशासन और मंदिर समितियों द्वारा भीड़ प्रबंधन, पिंडदान सामग्री और तर्पण की विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं।
- **अज्ञात तिथियों का समाधान:** जिन परिजनों को अपने पूर्वजों की सटीक देहावसान तिथि ज्ञात नहीं है, वे 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर अनुष्ठान कर सकते हैं। उस दिन किया गया दान और तर्पण सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों तक पहुंचता है।
- **आचरण और नियम:** इस 16 दिवसीय अवधि के दौरान नए मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है और सात्विक जीवन शैली अपनाने का विधान है। दैनिक जीवन में जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और जल दान करने से पारिवारिक शांति प्राप्त होती है।

## ऐसा क्यों हुआ
नारायणी शिला का तीर्थ महत्व और इस पखवाड़े का आयोजन प्राचीन पौराणिक आख्यानों और वैदिक काल गणना पर आधारित है।

- **पौराणिक कारण:** असुर गयासुर ने भगवान विष्णु के कमलासन को ढाल बनाया था, जिस पर गदा का प्रहार होने से वह तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। इसका एक पवित्र भाग हरिद्वार में गिरा, जिसके कारण यह स्थान भगवान विष्णु के हृदय का प्रतीक बन गया।
- **स्कंद पुराण का विधान:** धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस शिला पर किए गए कर्मकांड सीधे भगवान विष्णु तक पहुंचते हैं। इसी कारण इसे गयाजी और ब्रह्मकपाल के समतुल्य मोक्ष का परम साधन स्वीकार किया गया है।
- **पंचांग की गणना:** सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर आश्विन कृष्ण पक्ष में तिथि क्षय होने से दो तिथियों का संयोग एक ही दिन बन रहा है। इस ज्योतिषीय घटना के कारण 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी दोनों का श्राद्ध एक साथ निर्धारित किया गया है।

## सवाल-जवाब

### 1. वर्ष 2026 में पितृपक्ष कब से कब तक रहेगा?
साल 2026 में पितृपक्ष 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन समाप्त होगा।

### 2. हरिद्वार की नारायणी शिला का संबंध किस पौराणिक कथा से है?
यह शिला भगवान विष्णु के उस दिव्य कमलासन का टूटा हुआ भाग है, जो असुर गयासुर के साथ युद्ध के दौरान गदा के प्रहार से यहां गिरा था।

### 3. कमलासन के बाकी दो टुकड़े किन स्थानों पर गिरे थे?
कमलासन का दूसरा टुकड़ा बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में और तीसरा टुकड़ा बिहार के गयाजी में गिरा था।

### 4. इस वर्ष 15 दिनों में 16 दिन के श्राद्ध क्यों संपन्न किए जा रहे हैं?
तिथि क्षय होने के कारण 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध कर्म एक ही दिन आयोजित किया जाएगा।

### 5. यदि किसी परिजन की मृत्यु तिथि याद न हो तो उनका श्राद्ध कब करना चाहिए?
जिन दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो, उनका श्राद्ध कर्म सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जाता है।

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