# उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित बूंदी गांव से सड़क बनने के बाद छीना पड़ाव का दर्जा, फिर भी सैलानियों की पहली पसंद

> पिथौरागढ़ जिले में करीब नौ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बूंदी गांव कभी कैलाश-मानसरोवर यात्रा का मुख्य पड़ाव हुआ करता था, लेकिन सड़क बनने के बाद भले ही यह दर्जा छिन गया हो, फिर भी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण यह पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहा है।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/pithauragarha-men-sthita-bundi-ganva-se-saraka-banane-ke-bada-chhina-parava-ka-darja-phira-bhi-sailaniyon-ki-pahali-pasnda-49746 · **Language:** Hindi
**Tags:** पिथौरागढ़, बूंदी गांव, कैलाश मानसरोवर यात्रा, उत्तराखंड पर्यटन, लिपुलेख दर्रा, आदि कैलाश

कैलाश-मानसरोवर यात्रा मार्ग पर बसा बूंदी गांव कभी इस पूरी यात्रा का सबसे अहम और मुख्य पड़ाव हुआ करता था। पिथौरागढ़ जिले में लगभग नौ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह बॉर्डर का वह आखिरी गांव है, जो उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रवेश करने से पहले आखिरी मानवी बस्ती के रूप में नजर आता है। लिपुलेख दर्रे तक जाने वाले रास्ते में छियालेख की बेहद कठिन और खड़ी चढ़ाई को पार करने से पहले यात्री इसी स्थान पर अपनी थकान मिटाया करते थे।

## व्यापार और यात्रा का पुराना इतिहास
करीब दो सौ परिवारों की आबादी वाले इस गांव की अपनी एक ऐतिहासिक महत्ता रही है। यह स्थान केवल धार्मिक यात्राओं का केंद्र नहीं था, बल्कि भारत और चीन के बीच होने वाले व्यापार के लिए भी एक प्रमुख ठहराव का काम करता था। इस गांव के ठीक सामने नेपाल का प्रसिद्ध अपी पर्वत खड़ा हुआ है। इसी अपी पर्वत के आसपास दुर्लभ कीड़ा जड़ी भी पाई जाती है, जो यहां के स्थानीय बाशिंदों के लिए आय और आजीविका का एक बहुत बड़ा साधन मानी जाती है। मौसम की दुश्वारियों के चलते यहां के ग्रामीण सर्दियों के मौसम में मैदानी और निचले इलाकों की तरफ पलायन कर जाते हैं, जिसके कारण यह पूरा गांव सालभर में केवल छह महीने ही आबाद रह पाता है।

## सड़क निर्माण के बाद बदला स्वरूप
साल 2020 में जब लिपुलेख दर्रे को जोडने वाली सड़क का निर्माण कार्य पूरा हुआ, तो इस इलाके की पूरी तस्वीर ही बदल गई। सड़क बन जाने के बाद से यात्रियों और पर्यटकों का काफिला अब बूंदी गांव में रुकने के बजाय सीधे गुंजी की तरफ निकल जाता है, जिससे बूंदी का पारंपरिक पड़ाव वाला दर्जा समाप्त हो गया। हालांकि इसके बावजूद इस सीमावर्ती क्षेत्र का सामरिक और रणनीतिक महत्व आज भी पूरी तरह से बरकरार है। इस गांव के बिल्कुल नीचे से भारत और नेपाल की सीमाओं को अलग करने वाली काली नदी का प्रवाह है। राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील होने के कारण यहां सशस्त्र सीमा बल के जवान हर समय मुस्तैद रहते हैं और सीमा से आने-जाने वाले हर शख्स पर पैनी नजर रखते हैं।

## पर्यटन के नए द्वार और होम स्टे संस्कृति
यात्री पड़ाव छिन जाने के बावजूद आदि कैलाश, कैलाश-मानसरोवर और ॐ पर्वत के दर्शनों के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं व पर्यटकों का आना-जाना यहां पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। इस इलाके की दिलकश प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देता है, जो यात्रा के दौरान यहां कुछ पल बिताने जरूर आते हैं। पर्यटकों की इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर कई होम स्टे शुरू कर दिए गए हैं। होम स्टे संचालक हरीश रायपा का कहना है कि पहले जब सड़क नहीं थी, तब यात्रा सीजन के दौरान पूरे गांव में भारी चहल-पहल हुआ करती थी और यात्री रात के वक्त यहीं विश्राम करते थे। अब भले ही मुख्य पड़ाव गुंजी बन गया हो, लेकिन प्रकृति प्रेमी और घूमने के शौकीन सैलानी आज भी अपनी यात्रा के दौरान बूंदी गांव में ही रुकना पसंद करते हैं, और यही होम स्टे इस क्षेत्र के लोगों के लिए पूरे साल की आजीविका कमाने का मुख्य जरिया बन चुके हैं।

## इसका आप पर असर
पिथौरागढ़ के सीमावर्ती इलाकों की यात्रा करने वाले पर्यटकों और स्थानीय कारोबारियों के लिए यह स्थिति सीधे तौर पर आजीविका और यात्रा के नए अनुभवों को प्रभावित करती है।

- **उत्तराखंड में:** आदि कैलाश और मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को अब नए सड़क मार्गों के जरिए सफर तय करना होता है, जिससे यात्रा के पारंपरिक पड़ाव बदल गए हैं। सड़क संपर्क बेहतर होने से हालांकि आवागमन तेज हुआ है, लेकिन पुराने पड़ाव वाले गांवों के स्थानीय कारोबार को नए सिरे से खुद को ढालना पड़ रहा है।
- **पिथौरागढ़ में:** बूंदी गांव के होम स्टे संचालकों और स्थानीय ग्रामीणों के लिए पर्यटन ही छह महीने की आजीविका का मुख्य आधार है। सड़क बनने से भले ही बड़े यात्री जत्थे सीधे आगे निकल जाते हैं, लेकिन प्रकृति प्रेमियों के रुकने से स्थानीय स्तर पर आतिथ्य व्यवसाय को गति मिल रही है।

## ऐसा क्यों हुआ
भौगोलिक स्थिति में बदलाव और सामरिक जरूरतों के तहत क्षेत्र में हुए बुनियादी ढांचे के विकास के कारण इस गांव की भूमिका में यह बदलाव आया है।

- **सड़क मार्ग का निर्माण:** साल 2020 में लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली सड़क के बन जाने से उच्च हिमालयी क्षेत्र तक वाहनों की सीधी आवाजाही संभव हो गई।
- **यात्री आवागमन में बदलाव:** सड़क बनने से पहले पैदल चलने वाले यात्रियों और व्यापारियों का काफिला मजबूरन बूंदी गांव में विश्राम करता था, जो अब वाहनों के जरिए सीधे आगे के पड़ावों तक पहुंच जाता है।
- **सामरिक महत्ता:** भारत-नेपाल सीमा पर स्थित होने और काली नदी के करीब होने के कारण इस क्षेत्र की भौगोलिक सुरक्षा प्राथमिकता हमेशा से उच्च स्तर पर रही है।

## सवाल-जवाब

### 1. बूंदी गांव कहाँ स्थित है?
बूंदी गांव उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में लगभग नौ हजार फीट की ऊंचाई पर कैलाश-मानसरोवर यात्रा मार्ग पर बसा है।

### 2. बूंदी गांव में लोग साल में कितने महीने रहते हैं?
मौसम की कठिनाइयों के कारण ग्रामीण सर्दियों के दौरान निचले इलाकों में आ जाते हैं, जिससे यह गांव साल में केवल छह महीने ही आबाद रहता है।

### 3. बूंदी गांव का पारंपरिक महत्व क्या था?
यह गांव पहले कैलाश-मानसरोवर यात्रा और भारत-चीन व्यापार के लिए एक मुख्य पड़ाव हुआ करता था।

### 4. साल 2020 के बाद इस गांव में क्या बदलाव आया?
लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली सड़क बनने के बाद यात्रियों का पड़ाव बदलकर सीधे गुंजी हो गया, जिससे बूंदी का मुख्य ट्रांजिट स्टेटस बदल गया।

### 5. यहाँ के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन क्या है?
यहाँ के लोगों की आजीविका मुख्य रूप से नेपाल के अपी पर्वत के पास मिलने वाली कीड़ा जड़ी और सैलानियों के लिए चलाए जाने वाले होम स्टे पर निर्भर है।

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