# पितृ पक्ष में सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध केवल नवमी तिथि पर करने का है शास्त्रीय विधान

> पितृ पक्ष के दौरान सुहागिन महिलाओं के श्राद्ध के लिए शास्त्रों में आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि तय की गई है। हरिद्वार के ज्योतिषी पंडित मनोज मिश्रा के अनुसार गलत तिथि पर तर्पण करने से अनुष्ठान का फल नहीं मिलता।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/pitru-paksha-men-saubhagyavati-striyon-ka-shradh-kevala-navami-tithi-para-karane-ka-hai-shastriya-vidhana-42694 · **Language:** Hindi
**Tags:** पितृ पक्ष, श्राद्ध, नवमी श्राद्ध, गरुड़ पुराण, हरिद्वार, हिंदू धर्म

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक का सोलह दिवसीय पितृ पक्ष पूर्वजों के स्मरण, उनकी आत्मिक शांति और आशीर्वाद पाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इन सोलह दिनों की अवधि में परिजन तर्पण, पिंडदान तथा हवन जैसे अनुष्ठानों के माध्यम से अपने पितरों की संतुष्टि के लिए यत्न करते हैं। धार्मिक परंपराओं में दिवंगत आत्माओं की सद्गति के लिए अलग-अलग और सुनिश्चित नियम बताए गए हैं। यदि किसी दिवंगत सुहागिन अथवा सौभाग्यवती स्त्री का श्राद्ध शास्त्रों में वर्णित विधियों के अनुकूल न किया जाए, तो परिवार को पितृ दोष, अशांति और कई व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

## सुहागिन स्त्रियों के श्राद्ध का विशेष शास्त्रीय नियम
हरिद्वार के ज्योतिषी पंडित मनोज मिश्रा के अनुसार, जो महिलाएं अपने पति के जीवनकाल में ही इस नश्वर संसार को छोड़ जाती हैं, उन्हें सौभाग्यवती या सुहागिन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में ऐसी मातृ शक्तियों के श्राद्ध कर्म के लिए आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को ही शास्त्रीय रूप से अधिकृत किया गया है। यदि कोई परिजन अपनी दिवंगत सौभाग्यवती माता, दादी या पत्नी का श्राद्ध उनकी मृत्यु की सामान्य तिथि पर करता है, तो शास्त्रों के मुताबिक उस अनुष्ठान का अभीष्ट फल प्राप्त नहीं हो पाता।

## गलत तिथि पर अनुष्ठान करने के दुष्परिणाम
पंडित मनोज मिश्रा के अनुसार यदि निर्धारित नवमी तिथि पर तर्पण और पिंडदान न किया जाए, तो दिवंगत आत्मा अतृप्त रह जाती है और उसे प्रेत योनि में भटकना पड़ता है। ऐसी स्थिति बनने पर परिवार के वंशजों के जीवन में मांगलिक कार्यों में अड़चनें उत्पन्न होने लगती हैं। घर में निरंतर कलह, अशांति, कार्यों में गतिरोध और कई अन्य प्रकार की बाधाएं बनी रहती हैं, जिससे पारिवारिक प्रगति रुक जाती है।

## धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख और सही पूजन विधि
इस शास्त्रीय परंपरा का विस्तृत वर्णन हिंदू धर्म के विभिन्न ग्रंथों और विशेष रूप से गरुड़ पुराण में मिलता है। ग्रंथों में स्पष्ट किया गया है कि सौभाग्यवती मातृ शक्तियों के लिए नवमी का दिन ही सर्वोपरि है। इस तिथि पर गंगा घाट अथवा पवित्र जल के निकट पिंडदान और तर्पण करने का विधान है। इसके साथ ही किसी जीवित सुहागिन स्त्री को आदरपूर्वक भोजन कराना चाहिए और उसे सुहाग की सामग्री भेंट स्वरूप दान करनी चाहिए। इस विधि से किया गया पूजन मातृ ऋण से मुक्ति प्रदान करता है और पूरे कुल में सुख, समृद्धि तथा सौभाग्य का संचार करता है।

## इसका आप पर असर
यह जानकारी उन सभी परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जो पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण अनुष्ठान आयोजित करते हैं।

- **भारत में:** जिन परिवारों में माता, दादी या पत्नी का निधन उनके पति के जीवित रहते हुआ हो, उन्हें उनका श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि के बजाय आश्विन कृष्ण नवमी को करना चाहिए। सही तिथि पर अनुष्ठान करने से अनुष्ठान का पूरा आध्यात्मिक फल मिलता है और पूजा व्यर्थ नहीं जाती।
- **पूजा विधि पर प्रभाव:** नवमी के दिन गंगा तट या किसी पवित्र जलाशय के किनारे पिंडदान और तर्पण करना अनिवार्य बताया गया है। इसके अलावा किसी सुहागिन महिला को भोजन कराकर सुहाग सामग्री दान करने की व्यवस्था पहले से करनी होगी।
- **पारिवारिक शांति:** शास्त्रों के अनुसार सही विधि से अनुष्ठान करने पर पितृ दोष और गृह क्लेश से बचाव होता है। इससे घर के मांगलिक कार्यों में आने वाली अड़चनें दूर होने की मान्यता है।
- **समय और योजना:** परिजनों को अपने वार्षिक श्राद्ध कैलेंडर में सुहागिन मातृ शक्तियों के लिए नवमी तिथि को विशेष रूप से चिह्नित कर लेना चाहिए। इससे सामान्य मृत्यु तिथि पर गलत अनुष्ठान करने की भूल से बचा जा सकेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह परंपरा हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित मातृ शक्तियों के सम्मान और उनकी आत्मिक शांति के विशेष नियमों पर आधारित है।

- **शास्त्रीय निर्धारण:** गरुड़ पुराण सहित अन्य धर्मग्रंथों में उन महिलाओं के लिए नवमी तिथि निश्चित की गई है जो सुहागिन अवस्था में संसार त्यागती हैं। शास्त्रों का मानना है कि इस विशिष्ट तिथि पर किया गया तर्पण ही उनकी आत्मा को पूर्ण संतुष्टि प्रदान करता है।
- **सामान्य तिथि का निषेध:** सामान्य मृत्यु तिथि पर अनुष्ठान करने से विधान अधूरा रह जाता है क्योंकि सौभाग्यवती मातृ शक्तियों के लिए अलग तिथि का विधान है। सही दिन का चयन न होने पर आत्मा अतृप्त रहती है और आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता।
- **मातृ ऋण की मुक्ति:** माता और कुल की पूर्वज स्त्रियों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए सुहाग सामग्री का दान और सुहागिन को भोजन कराना अनिवार्य अंग माना गया है। यह विधि परिवार को मातृ ऋण से मुक्त कराने के उद्देश्य से स्थापित की गई है।

## सवाल-जवाब

### 1. सुहागिन या सौभाग्यवती स्त्री किसे माना जाता है?
जिन स्त्रियों का देहावसान उनके पति के जीवित रहते हुए हो जाता है, उन्हें धर्मग्रंथों में सौभाग्यवती या सुहागिन कहा गया है।

### 2. सुहागिन स्त्री का श्राद्ध किस तिथि पर किया जाना चाहिए?
पितृ पक्ष में ऐसी मातृ शक्तियों का श्राद्ध आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को करने का नियम है।

### 3. यदि सामान्य मृत्यु तिथि पर श्राद्ध कर दिया जाए तो क्या होता है?
शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से अनुष्ठान का कोई लाभ नहीं मिलता, आत्मा अतृप्त रहती है और परिजनों को बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

### 4. इस नियम का प्रमाण किस धार्मिक ग्रंथ में मिलता है?
गरुड़ पुराण समेत कई अन्य प्रमुख हिंदू धर्मग्रंथों में नवमी तिथि के श्राद्ध का विस्तार से वर्णन दिया गया है।

### 5. नवमी के दिन किन-किन धार्मिक कार्यों को करना चाहिए?
इस दिन गंगा तट पर पिंडदान और तर्पण करने के साथ सुहागिन महिला को भोजन कराना और सुहाग सामग्री का दान करना चाहिए।

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