ऋषिकेश के ज्योतिषी ने बताया दिवाली के बाद मिट्टी के दीयों के निपटारे का सही तरीका दिवाली बीतने के बाद पूजा में प्रयुक्त मिट्टी के दीयों को कूड़ेदान में फेंकने के बजाय वास्तु नियमों के अनुसार सहेजना या विसर्जित करना चाहिए। दीपावली का पावन पर्व समाप्त होते ही घरों में साफ-सफाई और बची हुई पूजन सामग्री को व्यवस्थित करने का काम शुरू हो जाता है। रोशनी के इस महापर्व पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की विधि-विधान से आराधना की जाती है और पूरे घर को मिट्टी के दीपकों से रोशन किया जाता है। मुख्य द्वार, आंगन, छत, बालकनी और खिड़कियों पर कतारबद्ध तरीके से रखे गए दीये घर को दिव्यता प्रदान करते हैं। पर्व पूरा होने के बाद अधिकांश घरों में यह असमंजस रहता है कि इस्तेमाल किए जा चुके इन दीयों का क्या किया जाए। कुछ लोग इन्हें सामान्य कचरे में डाल देते हैं, जबकि कुछ लोग इन्हें यूं ही कहीं भी छोड़ देते हैं। ऋषिकेश के ज्योतिषी अखिलेश पांडेय के अनुसार मिट्टी के दीयों को कूड़े में फेंकना अनुचित है और वास्तु शास्त्र में इनके रख-रखाव तथा विसर्जन के स्पष्ट नियम बताए गए हैं। दीपावली पर प्रयुक्त दीपकों की विविधता और पूजन परंपरा दिवाली की संध्या पर लोग विभिन्न स्वरूपों और आकारों के दीपक प्रज्वलित करते हैं। घर के मंदिर में प्रायः शुद्ध देसी घी का दीपक जलाया जाता है, जबकि बाहरी हिस्सों, मुंडेरों और द्वार पर सरसों या तिल के तेल से दीप जलाए जाते हैं। इस दौरान श्रद्धालु पारंपरिक मिट्टी के दीयों के साथ-साथ पंचमुखी दीपक, रंग-बिरंगे कलात्मक दीपक और बड़े आकार के दीयों का प्रयोग करते हैं। जहां सजावट के लिए बाजार में मिलने वाले नक्काशीदार और पेंट किए गए दीये पसंद किए जाते हैं, वहीं मूल पूजन कर्म में सादे मिट्टी के पारंपरिक दीयों का ही सर्वाधिक महत्व होता है। वास्तु शास्त्र के दृष्टिकोण से दिवाली पर जलाए गए हर एक दीपक में सकारात्मक ऊर्जा का वास माना जाता है, इसलिए पर्व के उपरांत उनका आदरपूर्वक रख-रखाव करना अनिवार्य है। सुरक्षित दीयों को सहेजने और पुनः प्रयोग करने की विधि ज्योतिष और वास्तु मान्यताओं के मुताबिक पूजन में उपयोग किए गए दीपकों का कभी भी अनादर नहीं होना चाहिए और न ही उन्हें घर में इधर-उधर बिखरा रहने देना चाहिए। त्योहार की अगली सुबह जब दीये शांत हो जाएं, तो उनकी सावधानीपूर्वक छंटनी करनी चाहिए। जो दीपक पूरी तरह साबुत हैं और जिनमें किसी प्रकार की दरार नहीं आई है, उन्हें अलग निकाल लें। इन दीपकों को पानी से अच्छी तरह धोकर, साफ कपड़े से पोंछकर धूप में सुखा लेना चाहिए। पूरी तरह सूखने के बाद इन्हें एक स्वच्छ डिब्बे या टोकरी में सुरक्षित स्थान पर रख देना चाहिए। यदि ये दीये पूरी तरह सही स्थिति में हैं, तो आने वाले समय में किसी भी व्रत, दैनिक पूजन या अगली दिवाली पर इनका दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। टूटे और चटके हुए दीयों के विसर्जन के नियम छंटनी के दौरान जिन दीयों में दरारें आ गई हों या जो टूट गए हों, उन्हें तुरंत पूजन सामग्री से अलग कर देना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार खंडित वस्तुओं को घर के देवालय या आवासीय परिसर में संचित करके रखना अशुभ माना जाता है। ऐसे दीयों को भूलकर भी कूड़ेदान, गंदी नालियों या अपवित्र स्थानों पर नहीं फेंकना चाहिए। टूटे हुए दीयों के निपटान का सबसे शुद्ध और शास्त्रीय तरीका यह है कि उन्हें किसी स्वच्छ स्थान पर ले जाकर मिट्टी में दबा दिया जाए। मिट्टी से बने ये दीपक पुनः प्राकृतिक मिट्टी में विलीन हो जाते हैं, जिससे पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचता और धार्मिक मर्यादा का भी पूर्ण पालन होता है। इसका आप पर असर दिवाली के बाद प्रयुक्त पूजन सामग्री का सही प्रबंधन घर की स्वच्छता और धार्मिक मर्यादा दोनों को सुरक्षित रखता है। • सामग्रियों की बचत: साबुत दीयों को सुरक्षित रखने से भविष्य के पर्वों और पूजा अनुष्ठानों में नए दीये खरीदने का खर्च बचता है। परिवारों को चाहिए कि वे अच्छी स्थिति वाले दीयों को साफ कर धूप में सुखाकर सहेज लें। • पारिस्थितिक संतुलन: टूटे हुए मिट्टी के दीयों को कचरे में न डालकर मिट्टी में दबाने से कचरा प्रबंधन सुगम होता है। यह प्राकृतिक मिट्टी का उत्पाद होने के कारण पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना जमीन में मिल जाता है। • वास्तु अनुकूलता: घर में खंडित सामग्री को जमा न करने से नकारात्मक प्रभाव दूर रहते हैं। पूजा स्थल और मुंडेरों से टूटे दीयों को तुरंत हटाकर शुद्ध वातावरण बनाए रखा जा सकता है। • धार्मिक आदर: देवी-देवताओं के समक्ष जलाए गए दीयों को नालियों या कूड़ेदानों में फेंकने से बचना चाहिए। इस आसान नियम का पालन करके पूजन प्रतीकों के प्रति सम्मान सुनिश्चित किया जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ दीपावली पूजन में मिट्टी के दीपकों को मात्र रोशनी का साधन नहीं बल्कि पंचतत्वों और देव उपासना का माध्यम माना जाता है, इसलिए उनके निपटान के विशेष नियम हैं। • पंचतत्व और पवित्रता का प्रतीक: मिट्टी के दीये पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के सम्मिलन से बनते हैं और पूजन में उपयोग के बाद पूज्य हो जाते हैं। इसी कारण से शास्त्रों में इनका अनादर करने या इन्हें अशुद्ध स्थानों पर फेंकने से मना किया गया है। • वास्तु शास्त्र में खंडित वस्तुओं का निषेध: पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार चटके या टूटे हुए दीपक घर के भीतर नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। यही कारण है कि टूटे दीयों को घर में संचित करने के बजाय तुरंत बाहर मिट्टी में विसर्जित करने का विधान है। • प्रकृति से पुनर्मिलन की परंपरा: भारतीय पूजन परंपरा में प्राकृतिक तत्वों से बनी वस्तुओं को पुनः प्रकृति में ही लौटाने का नियम रहा है। मिट्टी के दीयों को स्वच्छ भूमि में दबाने से उनका प्राकृतिक चक्र संपन्न होता है और किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं फैलता। सवाल-जवाब 1. दिवाली के बाद सही सलामत दीयों का क्या करना चाहिए? साबुत दीयों को पानी से साफ करके धूप में सुखा लें और किसी स्वच्छ स्थान पर रख लें, ताकि भविष्य की पूजा या अगली दिवाली पर उनका दोबारा इस्तेमाल हो सके। 2. टूटे या चटके हुए दीयों का निपटारा कैसे करना चाहिए? टूटे हुए दीयों को कूड़े में फेंकने के बजाय किसी साफ स्थान पर मिट्टी में दबा देना चाहिए ताकि वे स्वाभाविक रूप से मिट्टी में मिल जाएं। 3. क्या पूजा में इस्तेमाल हुए दीयों को सामान्य कचरे या नाली में फेंक सकते हैं? नहीं, पूजा में प्रयुक्त दीयों को कूड़े के ढेर या गंदी नाली में फेंकना वास्तु और धार्मिक दृष्टि से अनुचित माना जाता है। 4. दिवाली पूजन के दौरान किस प्रकार के दीये जलाए जाते हैं? दिवाली पर मंदिर में घी और बाहर सरसों या तिल के तेल के दीये जलाए जाते हैं, जिनमें सादे मिट्टी के दीये, पंचमुखी दीये और कलात्मक दीपक शामिल हैं। https://trendkia.com/uttarakhand/rishikesh-ke-jyotishi-ne-bataya-divali-ke-bada-mitti-ke-diyon-ke-nipatare-ka-sahi-tarika-57433 TrendKia — Har trend, sabse pehle.