ऋषिकेश में होली ढलते ही मूर्तिकला में जुटता है राजस्थानी परिवार, हजार से ज्यादा प्राकृतिक प्रतिमाएं तैयार भनियावाला में रहने वाले लक्ष्मण सोलंकी राजपूत और उनका परिवार होली समाप्त होते ही भगवान गणेश की पर्यावरण अनुकूल मूर्तियां बनाने के काम में जुट जाता है। होली का पर्व समाप्त होते ही जहां अधिकांश लोग अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट जाते हैं, वहीं ऋषिकेश में भनियावाला के जॉली ग्रांट क्षेत्र में रहने वाला एक परिवार बिल्कुल अलग अभियान में व्यस्त हो जाता है। यह परिवार अपने घर को ही एक भव्य शिल्पशाला में तब्दील कर देता है, जहाँ महीनों तक भगवान गणेश और विभिन्न देवी-देवताओं की पर्यावरण अनुकूल मूर्तियों का निर्माण किया जाता है। इस पूरी अवधि में एक हजार से अधिक सुंदर मूर्तियों का निर्माण कर धार्मिक आयोजनों और आगामी त्योहारों के लिए संग्रह तैयार किया जाता है। पारंपरिक कला और परिवार का पूर्ण योगदान मूल रूप से राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले लक्ष्मण सोलंकी राजपूत का परिवार वर्षों से इस मूर्तिकला की परंपरा को सहेजे हुए है। उत्तराखंड के भनियावाला क्षेत्र में बसने के बाद भी उन्होंने अपने इस पुश्तैनी कौशल को जीवंत रखा है। मूर्ति के लिए मिट्टी तैयार करने से लेकर, आकार देने, रंग भरने और अंतिम सजावट तक का सारा कार्य घर के भीतर ही संपन्न होता है। इस रचनात्मक प्रक्रिया में परिवार का कोई भी सदस्य पीछे नहीं रहता। बड़े-बुजुर्गों के अनुभवों के साथ बच्चे भी अपनी क्षमता के अनुसार मिट्टी तराशने और रंग-रोगन में पूरा सहयोग करते हैं। मेहनत, समय और निर्माण की समय-सीमा एक साधारण मूर्ति को पूर्ण आकार देने में कम से कम 5 से 6 घंटे का समय लगता है। हालांकि, मूर्ति का आकार जितना बड़ा होता है और उसमें की जाने वाली नक्काशी या सजावट जितनी जटिल होती है, उसकी तैयारी में उतनी ही अधिक मेहनत और घंटों का समय लगता है। हर साल होली का त्यौहार बीतते ही मूर्तियों के ढांचे बनाने का काम शुरू कर दिया जाता है। शुरुआत में काम सामान्य गति से चलता है, लेकिन जैसे-जैसे गणेश चतुर्थी का पर्व नजदीक आता है, कार्य की गति कई गुना बढ़ जाती है। त्योहारों के समय मांग पूरी करने के लिए पूरा परिवार लगातार कई महीनों तक दिन-रात मेहनत करता है। विभिन्न आकार और उनकी कीमत वर्तमान में इस परिवार के पास लगभग 1000 मूर्तियां बनकर तैयार हो चुकी हैं। मूर्तियों की श्रृंखला में 1 फीट से लेकर बड़े आकार की कई प्रतिमाएं शामिल हैं। इनमें सवा फीट, 2 फीट, सवा 2 फीट, 3 फीट, 4 फीट और 5 फीट तक की मूर्तियां बनाई गई हैं। इस पूरी श्रृंखला में सबसे विशाल मूर्ति लगभग 7 फीट 5 इंच की है। मूर्तियों की दरें उनके आकार, मेहनत और नक्काशी के आधार पर निर्धारित की गई हैं। छोटे आकार की मूर्तियां 150 रुपये, 250 रुपये और 300 रुपये में उपलब्ध हैं। वहीं मध्यम और विस्तृत सजावट वाली मूर्तियों का मूल्य 500 रुपये से लेकर 3000 रुपये के बीच रखा गया है। विशेष रूप से निर्मित सबसे बड़ी प्रतिमाओं की कीमत साढ़े चार हजार रुपये से लेकर पांच हजार रुपये तक जाती है। पर्यावरण संरक्षण और घुलनशील सामग्री का प्रयोग इन मूर्तियों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी पूर्णतः पर्यावरण अनुकूल बनावट है। निर्माण में ऐसी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है जो विसर्जन के दौरान पानी में आसानी से घुल जाती है और जलाशयों को नुकसान नहीं पहुंचाती। मूर्तियों को मजबूत ढांचा प्रदान करने के लिए नारियल के जूट का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे मूर्ति टूटे बिना स्थिर बनी रहती है। नदियों और पर्यावरण के प्रति बढ़ती जनजागरूकता के कारण लोग अब प्लास्टर ऑफ पेरिस की जगह इन प्राकृतिक मूर्तियों को अत्यधिक पसंद कर रहे हैं। इसका आप पर असर ऋषिकेश और उत्तराखंड के निवासियों के लिए पर्यावरण अनुकूल मूर्तियों की उपलब्धता आसान हो गई है। • उत्तराखंड में: स्थानीय श्रद्धालु ऋषिकेश के भनियावाला में सीधे कारीगरों से प्राकृतिक मिट्टी की मूर्तियां खरीद सकते हैं। इससे नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों में विसर्जन के दौरान होने वाला प्रदूषण रुकेगा। • देश भर में: इको-फ्रेंडली मूर्तियों की मांग बढ़ने से पारंपरिक कारीगरों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिल रहा है। इससे आम उपभोक्ता 150 रुपये से लेकर 5000 रुपये के बजट में अपनी पसंद की प्रतिमा चुन सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह मौसमी उत्पादन चक्र त्योहारों की भारी मांग को समय पर पूरा करने के लिए आयोजित किया जाता है। • त्योहारों का समय चक्र: गणेश चतुर्थी जैसे बड़े त्योहारों के दौरान हजारों मूर्तियों की तात्कालिक मांग उठती है जिसे कुछ हफ्तों में पूरा करना असंभव होता है। • श्रमसाध्य निर्माण प्रक्रिया: प्रत्येक प्राकृतिक मूर्ति को ढालने, सुखाने और सजाने में 5 से 6 घंटे का समय लगता है, इसलिए होली के तुरंत बाद काम शुरू करना अनिवार्य होता है। • पर्यावरण जागरूकता: प्लास्टर ऑफ पेरिस पर बढ़ती पाबंदियों और जल निकायों के संरक्षण के चलते इको-फ्रेंडली मूर्तियों की मांग में तेजी आई है। सवाल-जवाब 1. ऋषिकेश में यह परिवार किस जगह मूर्तियां बनाता है? यह परिवार ऋषिकेश के भनियावाला में जॉली ग्रांट के पास अपने घर पर मूर्तियां तैयार करता है। 2. मूर्ति निर्माण की शुरुआत होली के बाद क्यों की जाती है? त्योहारों के सीजन में 1000 से ज्यादा मूर्तियों की मांग पूरी करने और हर मूर्ति में 5 से 6 घंटे का समय लगने के कारण काम समय पर शुरू किया जाता है। 3. इन मूर्तियों की कीमत कहां से शुरू होती है? छोटी मूर्तियों की कीमत 150, 250 और 300 रुपये से शुरू होकर बड़ी मूर्तियों के लिए 3000 से 5000 रुपये तक जाती है। 4. मूर्तियों को इको-फ्रेंडली बनाने के लिए क्या इस्तेमाल होता है? इनमें प्राकृतिक मिट्टी और मजबूती देने के लिए नारियल के जूट का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे वे विसर्जन के बाद पानी में घुल जाती हैं। 5. इस परिवार द्वारा बनाई गई सबसे बड़ी मूर्ति का आकार क्या है? परिवार द्वारा तैयार की गई सबसे बड़ी मूर्ति लगभग 7 फीट 5 इंच की है। प्रेरणा और सबक लक्ष्मण सोलंकी और उनके परिवार का प्रयास पारंपरिक कौशल और पर्यावरण निष्ठा का बेहतरीन उदाहरण है। • सामूहिक पारिवारिक श्रम: परिवार के सभी सदस्यों की भागीदारी से बड़े लक्ष्यों को बिना बाहरी संसाधन के हासिल किया जा सकता है। • पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व: अपनी कला को प्राकृतिक सीमाओं में रखकर समाज को स्वच्छ विकल्प प्रदान करना संभव है। • पुश्तैनी हुनर का संरक्षण: आधुनिक दौर में भी पारंपरिक कारीगरी को आजीविका का सशक्त साधन बनाया जा सकता है। https://trendkia.com/uttarakhand/rishikesh-men-holi-dhalate-hi-murtikala-men-jutata-hai-rajasthan-i-parivara-hajara-se-jyada-prakritika-pratimaen-taiyara-31818 TrendKia — Har trend, sabse pehle.