{
  "type": "article",
  "title": "उत्तराखंड के नैनीताल में कैसे होती है अनोखी दुर्गा पूजा, जानिए जलस्रोतों से जुड़े इस पर्व की खास परंपराएं",
  "summary": "नैनीताल में आयोजित होने वाला दुर्गा पूजा महोत्सव अपनी अनूठी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। इस उत्सव में नौ जलस्रोतों से पानी लाने, केले के पौधे को साड़ी पहनाने और संधि पूजा जैसे अनुष्ठान विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं।",
  "content": "उत्तराखंड का नैनीताल अपनी मनमोहक प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अनूठी धार्मिक परंपराओं के लिए भी देश-दुनिया में जाना जाता है। यहां हर साल आयोजित होने वाला दुर्गा पूजा महोत्सव गहरी आस्था, प्रकृति प्रेम और बंगाली संस्कृति के बहुत ही खूबसूरत संगम का एक बेहतरीन प्रतीक माना जाता है। इस पावन उत्सव के दौरान मां दुर्गा की विधिवत आराधना के साथ ऐसी कई प्राचीन परंपराएं भी देखने को मिलती हैं, जो इसे देश के दूसरे धार्मिक आयोजनों से एक अलग और अनूठी पहचान दिलाती हैं। नैनीताल में इस भव्य दुर्गा पूजा की शुरुआत शहर के विभिन्न नौ जलस्रोतों से पवित्र पानी एकत्र करने की एक बहुत पुरानी परंपरा से जुड़ी हुई है। इसके अलावा यहां होने वाली प्रसिद्ध धनुची आरती, संधि पूजा और केले के पौधे को पारंपरिक साड़ी पहनाने की अनूठी रस्म भी श्रद्धालुओं के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी रहती है।\n\nजलस्रोतों से कलश स्थापना और पुरानी परंपराएं\nनैनीताल दुर्गा पूजा समिति की वित्त सचिव डॉली भट्टाचार्य के अनुसार, इस पर्व की शुरुआत में शहर के नौ अलग-अलग जलस्रोतों से पानी एकत्र करने का बहुत ही खास धार्मिक महत्व होता है। हर साल षष्ठी के दिन एक भव्य कलश यात्रा निकालकर इन विभिन्न स्रोतों से जल एकत्र किया जाता है। इस पवित्र जल को फिर कलश में स्थापित करके पूरी विधि-विधान के साथ मां दुर्गा की आराधना की जाती है। पुराने समय के दौर में मां दुर्गा की भव्य मूर्तियां स्थापित करने के बजाय कलश की स्थापना करके ही उनकी पूजा करने का विधान हुआ करता था। उस समय ऐसी गहरी मान्यता थी कि नौ अलग-अलग नदियों या जलस्रोतों के जल और एक नारियल के साथ कलश की स्थापना करने से उसमें सीधे तौर पर मां का वास हो जाता है। यह प्राचीन परंपरा इस बात को दर्शाती है कि हमारा समाज प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच कितना गहरा और अटूट संबंध रखता है। ठीक इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में भी दुर्गा पूजा के दौरान पवित्र नदियों से जल एकत्र करने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी निभाई जाती है।\n\nकेले के पौधे को क्यों पहनाई जाती है साड़ी\nनैनीताल में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा के दौरान सप्तमी तिथि के दिन होने वाला विशेष अनुष्ठान भी बेहद खास और अलग महत्व रखता है। डॉली भट्टाचार्य बताती हैं कि धार्मिक मान्यता के अनुसार एक बार मां दुर्गा ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए यह कहा था कि जब उनके बेटे की बहू को अच्छी तरह स्नान कराकर और सजाकर पूजा की जाएगी, तभी वह वास्तव में प्रसन्न होंगी। यही मुख्य वजह है कि सप्तमी की सुबह सबसे पहले केले के पौधे को पूरी विधि के साथ स्नान कराया जाता है। इसके बाद उस पौधे पर हल्दी, तेल और चंदन का लेप लगाया जाता है और फिर उसे एक नई साड़ी पहनाकर भगवान गणेश की मूर्ति के ठीक बगल में स्थापित कर दिया जाता है। इस अनोखे अनुष्ठान को प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान और हमारी पारिवारिक परंपराओं से जोड़कर बहुत ही सकारात्मक रूप में देखा जाता है।\n\nसंधि पूजा का महत्व और पौराणिक कथाएं\nनैनीताल की इस प्रसिद्ध दुर्गा पूजा के दौरान अष्टमी और नवमी तिथि के संधिकाल में संधि पूजा का आयोजन किया जाता है। डॉली भट्टाचार्य के अनुसार, परंपरागत पंचांग गणना के अनुसार अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट के इस विशेष समय को संधि पूजा के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। ठीक इसी संधिकाल के दौरान मां दुर्गा ने महाकाली या चंडी का भयंकर रूप धारण करके चंड और मुंड नामक असुरों का वध किया था। इस विशेष अनुष्ठान के दौरान मां को शांत करने और उन्हें प्रसन्न करने के प्रतीक के रूप में कई स्थानों पर कद्दू की बलि भी दी जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार मां दुर्गा को पूरी तरह प्रसन्न करने के लिए भगवान श्रीराम ने 108 कमल के फूल अर्पित करने का संकल्प लिया था। जब पूजा के दौरान एक फूल कम पड़ गया, तब उन्होंने अपनी एक आंख ही मां को अर्पित करने का विचार बना लिया था, लेकिन तभी मां ने प्रकट होकर उन्हें रोक लिया और उनकी अनन्य भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुईं। यह प्राचीन कथा इस संधि पूजा से जुड़ी धार्मिक आस्था को और अधिक विशेष बना देती है।\n\nधनुची आरती और बंगाली संस्कृति की झलक\nनैनीताल की इस खास दुर्गा पूजा में पारंपरिक धनुची आरती का अपना एक अलग ही सांस्कृतिक आकर्षण होता है। इसमें एक पारंपरिक पात्र के अंदर धूप और नारियल की जटाएं जलाकर उससे मां दुर्गा की भव्य आराधना की जाती है। दूर तक गूंजने वाली ढाक की थाप और पूरी तरह भक्तिमय माहौल के बीच होने वाली यह आरती बंगाली संस्कृति की एक विशिष्ट और जीवंत पहचान मानी जाती है। नैनीताल की ही रहने वाली स्थानीय निवासी तनुश्री भट्टाचार्य बताती हैं कि यह पर्व प्रकृति को सीधे अध्यात्म से जोड़ता है और उन्हें तथा पूरे शहर को इस पावन पर्व का पूरे साल बेसब्री से इंतजार रहता है। उनके अनुसार ऐसी धार्मिक मान्यता है कि महिषासुर के साथ हुए भयंकर युद्ध के दौरान मां दुर्गा के महान संघर्ष और उनकी असीम शक्ति के प्रतीक के रूप में ही यह प्रसिद्ध धनुची नृत्य किया जाता है। इस आरती के दौरान सभी श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ मां की आराधना में तल्लीन हो जाते हैं और पूरा उत्सव पारंपरिक रंगों से सराबोर हो जाता है।\n\nइसका आप पर असर\nनैनीताल की इन अनूठी और पारंपरिक दुर्गा पूजा पद्धतियों का स्थानीय लोगों और पर्यटकों पर सांस्कृतिक और धार्मिक प्रभाव पड़ता है।\n\n• उत्तराखंड में: यह उत्सव राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक सांस्कृतिक आयोजनों के महत्व को बढ़ावा देता है। स्थानीय लोग इन प्राचीन रस्मों के जरिए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं।\n• नैनीताल में: शहर के निवासियों और आने वाले पर्यटकों के लिए यह आयोजन सामुदायिक मेलजोल और पर्यटन को बढ़ाने का मुख्य जरिया बनता है। स्थानीय जलस्रोतों के संरक्षण का संदेश भी इस पर्व के माध्यम से लोगों तक पहुंचता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनैनीताल में दुर्गा पूजा की इन विशिष्ट परंपराओं के पीछे पौराणिक मान्यताएं और प्राकृतिक तत्वों के प्रति सम्मान की भावना जुड़ी हुई है।\n\n• जलस्रोतों का महत्व: पुराने समय में मूर्तियां उपलब्ध न होने के कारण नौ प्राकृतिक जल स्रोतों के जल से कलश स्थापित कर मां की आराधना की परंपरा शुरू हुई थी।\n• केले के पौधे की पूजा: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पारिवारिक परंपराओं और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए सप्तमी के दिन विशेष रूप से यह अनुष्ठान किया जाता है।\n• संधि पूजा का आधार: पंचांग के अनुसार अष्टमी और नवमी के संधिकाल में मां दुर्गा द्वारा चंड और मुंड के वध की पौराणिक कथा इस विशेष पूजा का मुख्य आधार है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. नैनीताल में दुर्गा पूजा की शुरुआत किस रस्म से होती है?\nनैनीताल में दुर्गा पूजा की शुरुआत शहर के नौ जलस्रोतों से पानी एकत्र करने और कलश स्थापना से होती है।\n\n2. केले के पौधे को साड़ी पहनाने की परंपरा कब निभाई जाती है?\nकेले के पौधे को स्नान कराकर साड़ी पहनाने की रस्म सप्तमी तिथि की सुबह निभाई जाती है।\n\n3. संधि पूजा का समय क्या माना जाता है?\nअष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट के संधिकाल को संधि पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।\n\n4. धनुची आरती की क्या विशेषता है?\nधनुची आरती में पारंपरिक पात्र में धूप जलाकर ढाक की गूंज के साथ मां दुर्गा की आराधना की जाती है।\n\n5. पुराने समय में नैनीताल में किस प्रकार पूजा होती थी?\nपुराने समय में मूर्तियां बनाने के बजाय नौ जलस्रोतों के जल और नारियल के साथ कलश स्थापित कर पूजा की जाती थी।",
  "url": "https://trendkia.com/uttarakhand/unique-durga-puja-traditions-of-nainital-from-water-collection-to-banana-plant-rituals-48238",
  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-10-16",
  "tags": [
    "नैनीताल दुर्गा पूजा",
    "उत्तराखंड संस्कृति",
    "संधि पूजा",
    "धनुची आरती",
    "बंगाली परंपरा",
    "कलश यात्रा"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}