उत्तराखंड कांग्रेस में अंदरूनी कलह तेज, हरीश रावत की जनसंवाद मुहिम पर दिल्ली से लगी रोक पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की जनसंवाद यात्रा को लेकर कांग्रेस आलाकमान ने कड़ा रुख अपनाया है, जिसके बाद उन्होंने संगठन की सुस्ती पर तीखे सवाल उठाए हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय और मैदानी इलाकों में बदलते मौसम के बीच सियासी हलचल चरम पर पहुंच गई है। राज्य में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और कार्यशैली को लेकर पुरानी खींचतान एक बार फिर सतह पर आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा निकाली जा रही सार्वजनिक संपर्क मुहिम को लेकर पार्टी का केंद्रीय संगठन पूरी तरह सतर्क हो गया है। दिल्ली दरबार से मिले कड़े संदेशों के बाद सूबे की राजनीति में नए समीकरण बनने लगे हैं। प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की तरफ से चेतावनी भरा पत्र भेजे जाने के अलावा राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के रुख ने इस विवाद को खुला मंच दे दिया है। हरिद्वार से कुमाऊं तक शक्ति प्रदर्शन हरीश रावत ने अपनी इस खास मुहिम को धन्यवाद और जनसंवाद यात्रा का नाम दिया था। इसकी शुरुआत हरिद्वार की धरती से हुई और फिर यह राजधानी देहरादून की ओर बढ़ी। इसके बाद 5 अक्टूबर को यह काफिला सीधे कुमाऊं क्षेत्र के तराई भाबर इलाके में दाखिल हो गया। इस दौरान उन्होंने जसपुर, काशीपुर, रामनगर, कालाढूंगी और हल्द्वानी जैसे प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों में सघन संपर्क किया। इन इलाकों में उनके स्वागत के लिए जुटी भीड़ और पार्टी के कई स्थापित चेहरों की मौजूदगी ने प्रदेश संगठन के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं। इस पूरे सफर के दौरान कांग्रेस के कई प्रमुख नेता मंच साझा करते नजर आए। पूर्व पीसीसी चीफ प्रीतम सिंह, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के अलावा पूर्व प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष और वर्तमान विधायक तिलकराज बेहड़ ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। साथ ही विधायक आदेश चौहान, मनोज तिवारी, मदन बिष्ट, हरीश धामी और सुमित हृदयेश जैसे जनप्रतिनिधि भी जगह-जगह साथ खड़े दिखे। रामनगर क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन का नजारा उस वक्त और खास हो गया जब पार्टी से बाहर चल रहे पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी ने 10 जेसीबी मशीनों की मदद से फूलों की बारिश कराकर स्वागत किया। केंद्रीय हस्तक्षेप और रावत का कड़ा पलटवार इस बड़े शक्ति प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अचानक इस मुहिम पर विराम लगाने के निर्देश जारी कर दिए। आलाकमान की ओर से लगाई गई इस बंदिश पर हरीश रावत ने बेहद तीखे अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह जनसंपर्क पार्टी के हित में है और इससे आने वाले चुनावी संघर्ष की तैयारियों को नई मजबूती ही मिल रही थी। अपने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि लंबे समय तक बीमारी से जूझने के दौरान अनगिनत लोगों ने उनके लिए प्रार्थनाएं की थीं। इसके साथ ही उन्होंने केंद्रीय एजेंसी ईडी द्वारा परेशान किए जाने के दौर का भी जिक्र किया, जब आम जनता और निष्ठावान समर्थक चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे। इसी कृतज्ञता को प्रकट करने के लिए वह सड़कों पर उतरे थे। प्रदेश संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जब पार्टी की राज्य इकाई पूरी तरह निष्क्रिय बैठी है, तब उनके जैसा बुजुर्ग नेता यदि संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है तो इसमें किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। उन्होंने आलाकमान के पास शिकायतें पहुंचाने वाले नेताओं को चेतावनी भरे लहजे में आगाह किया कि यह नींद से जागने का वक्त है, क्योंकि यदि समय हाथ से निकल गया तो बड़ा नुकसान हो सकता है। रावत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस तरह की शिकायतों से उनका जनसंपर्क रुकने वाला नहीं है। वेणुगोपाल का संदेश और दिल्ली की अगली बैठक विवाद बढ़ने पर राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि चुनाव की तैयारियों पर चर्चा के लिए हरीश रावत से बातचीत हुई है। संगठन की नीति स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में पार्टी का कोई भी अभियान केवल मल्लिकार्जुन खड़गे और LOP राहुल गांधी के नेतृत्व में तथा आधिकारिक बैनर तले ही चलेगा। वेणुगोपाल ने साफ किया कि व्यक्तिगत स्तर पर चलाए जाने वाले कार्यक्रमों को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस सख्त रुख के बाद राज्य की राजनीति में आगे के घटनाक्रम को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है। आगामी 7 अक्टूबर को दोनों प्रमुख नेताओं के बीच देश की राजधानी दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक तय है। राजनीतिक जानकारों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि दिल्ली में होने वाली इस आमने-सामने की चर्चा के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अपने अगले राजनीतिक कदमों को क्या दिशा देते हैं। इसका आप पर असर विपक्षी दल के भीतर तेज होती इस संगठनात्मक रस्साकशी का सीधा असर जमीनी राजनीति और आम जनता के मुद्दों पर पड़ता है। • भारत में: राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन के प्रमुख घटक दल में अनुशासन और गुटबाजी का संतुलन चुनावी तैयारियों को सीधे प्रभावित करता है। केंद्रीय नेतृत्व द्वारा व्यक्तिगत प्रचार पर लगाई गई पाबंदी से अन्य चुनावी राज्यों में भी प्रादेशिक क्षत्रपों के लिए कड़ा संदेश तय हो गया है। • उत्तराखंड में: राज्य स्तर पर विपक्षी दल के शीर्ष नेताओं में टकराव बढ़ने से स्थानीय जनसमस्याओं और नीतिगत मुद्दों पर सरकार को घेरने की धार कमजोर पड़ सकती है। आम नागरिकों और पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए असमंजस की स्थिति बन गई है कि वे आधिकारिक प्रदेश संगठन के कार्यक्रमों से जुड़ें या वरिष्ठ नेताओं की निजी यात्राओं का समर्थन करें। ऐसा क्यों हुआ पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा प्रदेश संगठन से इतर समानांतर जनसंपर्क अभियान शुरू करने के कारण यह संगठनात्मक विवाद खड़ा हुआ। पार्टी की राज्य इकाई की शिकायतों के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने हस्तक्षेप करना जरूरी समझा। • सीधा कारण: हरीश रावत ने प्रदेश कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रमों से अलग होकर अपनी निजी जनसंवाद यात्रा निकाली, जिसमें कई मौजूदा विधायक और निष्कासित नेता भी शामिल हुए। राज्य इकाई की औपचारिक शिकायत के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए तुरंत रोकने के निर्देश दिए। • पृष्ठभूमि और परिस्थितियां: बीमारी से उबरने और केंद्रीय जांच एजेंसी के दबाव का सामना करने के बाद हरीश रावत अपने व्यक्तिगत समर्थक आधार को सक्रिय करना चाहते थे। दूसरी ओर, प्रदेश संगठन और उनके बीच लंबे समय से चली आ रही खींचतान ने इस शक्ति प्रदर्शन को टकराव के बिंदु तक पहुंचा दिया। • अनुशासन पर जोर: राष्ट्रीय संगठन ने स्पष्ट कर दिया कि चुनावी राज्यों में केवल पार्टी के आधिकारिक मंच और केंद्रीय नेतृत्व के दिशा-निर्देशों के तहत ही कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। किसी भी नेता को अपने दम पर स्वतंत्र चुनावी अभियान चलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। सवाल-जवाब 1. हरीश रावत ने किस नाम से अपनी यात्रा शुरू की थी? उन्होंने हरिद्वार से अपनी इस मुहिम को धन्यवाद और जनसंवाद यात्रा नाम देकर शुरू किया था। 2. कांग्रेस आलाकमान ने इस यात्रा पर रोक क्यों लगाई? केंद्रीय नेतृत्व का कहना है कि पार्टी व्यक्तिगत प्रचार अभियानों को अनुमति नहीं देगी और केवल आधिकारिक कार्यक्रमों को ही मान्य माना जाएगा। 3. हरीश रावत ने अपने इस अभियान का क्या औचित्य बताया? उन्होंने कहा कि बीमारी और जांच एजेंसी के दबाव के दौरान साथ देने वाली जनता का आभार जताने तथा पार्टी संगठन को सक्रिय करने के लिए यह यात्रा जरूरी थी। 4. इस विवाद के बाद अब अगला बड़ा कदम क्या है? हरीश रावत और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के बीच 7 अक्टूबर को नई दिल्ली में एक अहम बैठक तय की गई है। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-congress-men-andaruni-kalaha-teja-harish-rawat-ki-janasnvada-muhima-para-delhi-se-lagi-roka-43865 TrendKia — Har trend, sabse pehle.