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  "type": "article",
  "title": "उत्तराखंड के दून अस्पताल में कम स्टाइपेंड के खिलाफ डॉक्टरों का फूटा गुस्सा, एमबीबीएस के बाद भी आर्थिक तंगी झेल रहे इंटर्न हड़ताल पर डटे",
  "summary": "देहरादून के दून अस्पताल में एमबीबीएस इंटर्न और पीजी डॉक्टर पिछले एक हफ्ते से कम स्टाइपेंड के विरोध में धरना दे रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ 17 हजार रुपये के मानदेय में रोजाना 12 से 14 घंटे की कड़ी ड्यूटी करना और बुनियादी खर्च उठाना नामुमकिन हो गया है।",
  "content": "उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के प्रतिष्ठित दून अस्पताल में पिछले एक सप्ताह से जूनियर डॉक्टरों और एमबीबीएस (MBBS) इंटर्न का विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है। दिन-रात मरीजों की देखभाल में जुटे ये युवा चिकित्सक अपनी जायज मांगों को लेकर सड़क पर उतरने को मजबूर हो गए हैं। डॉक्टरों का आरोप है कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में उत्तराखंड में उन्हें मिलने वाला मानदेय यानी स्टाइपेंड बेहद कम है। भारी कार्यभार और प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच काम करने के बावजूद सरकार की ओर से उन्हें आर्थिक रूप से लगातार उपेक्षित किया जा रहा है, जिससे चिकित्सा कर्मियों में गहरा रोष व्याप्त है। प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक स्टाइपेंड बढ़ाने का कोई ठोस लिखित आश्वासन नहीं मिलता, वे अपना धरना समाप्त नहीं करेंगे।\n\nआर्थिक चुनौतियों और काम के भारी दबाव से जूझते युवा डॉक्टर\nदूरदराज के इलाकों से आकर देहरादून में चिकित्सा की पढ़ाई करने वाले इन प्रशिक्षु डॉक्टरों के सामने वर्तमान में गंभीर वित्तीय संकट खड़ा हो गया है। पौड़ी जिले के एक सामान्य ग्रामीण परिवार से ताल्लुक रखने वाली डॉ. श्रुति ने अपनी परिस्थितियों को साझा करते हुए बताया कि उनके माता-पिता ने बेहद कठिन संघर्षों के बाद उन्हें नीट (NEET) परीक्षा की तैयारी करवाकर चिकित्सा शिक्षा के लिए भेजा था। चार वर्षों की कठिन पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे इंटर्नशिप के चरण में पहुंचीं, तो उन्हें रोज 12 से 14 घंटे की थका देने वाली ड्यूटी करनी पड़ रही है। इस कठिन परिश्रम के बदले उन्हें केवल 17,000 रुपये का मासिक स्टाइपेंड मिलता है। उनका कहना है कि देहरादून जैसे शहर में रहने पर रोजाना का बुनियादी खर्च ही लगभग 550 रुपये आ जाता है, जिसमें भोजन और अन्य जरूरी चीजें शामिल हैं। इसके अलावा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के बीच की दूरी अधिक होने के कारण आवाजाही में भी काफी पैसा खर्च हो जाता है, जिससे अंत में उनके पास कुछ नहीं बचता।\n\nलाखों खर्च करने के बाद भी माता-पिता पर निर्भरता का दर्द\nहड़ताल में शामिल एक अन्य इंटर्न डॉ. निहारिका ने इस आर्थिक तंगी के मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक असर पर चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि परिवार द्वारा मेडिकल की महंगी पढ़ाई का खर्च उठाने के बाद भी, करियर के इस पड़ाव पर आकर दोबारा माता-पिता से पैसे मांगना बेहद निराशाजनक महसूस कराता है। हर परिवार लगातार आर्थिक बोझ उठाने की स्थिति में नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को सुधारने का जज्बा लेकर मेडिकल के क्षेत्र में आए ये युवा डॉक्टर अब स्वयं आर्थिक संकट के दलदल में फंस गए हैं। डॉक्टरों का तर्क है कि देश के अन्य हिस्सों जैसे कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश (यूपी) और महाराष्ट्र में इंटर्न और पीजी (PG) स्तर के डॉक्टरों को 60,000 रुपये से लेकर 1,00,000 रुपये तक का सम्मानजनक मानदेय प्रदान किया जा रहा है। बढ़ती महंगाई के इस दौर में उत्तराखंड सरकार द्वारा दिया जा रहा 17,000 रुपये का स्टाइपेंड नगण्य है। डॉक्टरों ने मांग की है कि राज्य सरकार उनकी सेवाओं का सम्मान करते हुए उन्हें गरिमापूर्ण और न्यायसंगत मानदेय दे, ताकि वे बिना किसी मानसिक और आर्थिक तनाव के मरीजों की बेहतर सेवा कर सकें।\n\nइसका आप पर असर\nइस हड़ताल और कम स्टाइपेंड के मुद्दे का आम लोगों और चिकित्सा क्षेत्र पर सीधा असर पड़ रहा है।\n\n• उत्तराखंड में मरीजों पर असर: दून अस्पताल में पीजी डॉक्टरों और इंटर्न की हड़ताल से ओपीडी और सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं में देरी हो सकती है। मरीजों को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।\n• आर्थिक सुरक्षा की चिंता: युवा डॉक्टरों के आंदोलन से यह साफ है कि चिकित्सा के क्षेत्र में आने के बाद भी वित्तीय असुरक्षा बनी हुई है। इससे आने वाले समय में प्रतिभाशाली युवा इस क्षेत्र में आने से बच सकते हैं।\n• ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रभाव: यदि डॉक्टरों की आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने के प्रति डॉक्टरों का रुझान कम हो सकता है। इससे ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा प्रभावित होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nप्रवेश द्वार यानी दून अस्पताल के डॉक्टरों का गुस्सा उनके न्यूनतम मानदेय और बढ़ते खर्चों के अंतर के कारण फूटा है।\n\n• असंतुलित स्टाइपेंड ढांचा: उत्तराखंड में मेडिकल इंटर्न को केवल 17,000 रुपये मासिक मानदेय मिलता है, जो पड़ोसी राज्यों की तुलना में बेहद कम है। यह राशि डॉक्टरों के दैनिक जीवनयापन के लिए भी नाकाफी साबित हो रही है।\n• कठिन कार्य परिस्थितियां: इंटर्न डॉक्टरों को प्रतिदिन 12 से 14 घंटे की लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है। इसके बावजूद उन्हें कोई अतिरिक्त भत्ता या प्रोत्साहन राशि नहीं दी जाती है।\n• महंगाई और परिवहन खर्च: मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के बीच की दूरी के कारण डॉक्टरों को भारी परिवहन खर्च उठाना पड़ता है। प्रतिदिन का बुनियादी खर्च 550 रुपये तक पहुंच जाने से उनकी पूरी आय समाप्त हो जाती है।\n• अन्य राज्यों से भारी असमानता: उत्तर प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में डॉक्टरों को मिलने वाला भारी-भरकम स्टाइपेंड उत्तराखंड के डॉक्टरों के असंतोष की मुख्य वजह बना है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दून अस्पताल में डॉक्टर क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं?\nडॉक्टर अपने बेहद कम मासिक स्टाइपेंड के विरोध में और इसे सम्मानजनक स्तर तक बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।\n\n2. उत्तराखंड में एमबीबीएस इंटर्न को कितना स्टाइपेंड मिलता है?\nउत्तराखंड में एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों को प्रति माह केवल 17,000 रुपये का स्टाइपेंड दिया जा रहा है।\n\n3. दून अस्पताल के डॉक्टरों की रोजाना की ड्यूटी कितने घंटे की होती है?\nयहां के इंटर्न डॉक्टरों को रोजाना 12 से 14 घंटे की कठिन ड्यूटी करनी पड़ती है।\n\n4. अन्य राज्यों में मेडिकल इंटर्न को कितना स्टाइपेंड मिल रहा है?\nहरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इंटर्न और पीजी डॉक्टरों को 60,000 रुपये से लेकर 1,00,000 रुपये तक का मानदेय मिलता है।",
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  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-09-14",
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    "देहरादून समाचार",
    "दून अस्पताल",
    "एमबीबीएस इंटर्न",
    "स्टाइपेंड बढ़ोतरी",
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