उत्तराखंड के इन अनोखे गांवों में एक महीने बाद क्यों जमकती है दीवाली, जानिए क्या है बूढ़ी दिवाली की परंपरा देशभर में दीवाली के जश्न के ठीक एक महीने बाद उत्तराखंड और हिमाचल के सीमावर्ती इलाकों में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। पांच दिनों तक चलने वाले इस पारंपरिक लोकपर्व में लकड़ी की मशालें जलाने से लेकर काठ के हाथी और हिरण नृत्य जैसे अनूठे आयोजन होते हैं। देशभर में इन दिनों रोशनी और आतिशबाजी के साथ दीपावली का पावन पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। लेकिन देश में कुछ ऐसे भी क्षेत्र मौजूद हैं जहां मुख्य दीवाली के ठीक एक महीने बाद यह त्योहार मनाने की परंपरा है। उत्तराखंड के जौनसार-बावर, रंवाई-जौनपुर और हिमाचल प्रदेश से लगे सीमावर्ती इलाकों में इस अनोखे पर्व को बूढ़ी दिवाली के रूप में मनाया जाता है। जब पूरा देश दीवाली के उल्लास में डूबा होता है, तब जनजातीय बहुल जौनसार-बावर, रवांई जौनपुर, उत्तरकाशी और हिमाचल के सिरमौर जिलों में इस उत्सव की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। इन पहाड़ी इलाकों में इस खास लोकपर्व को लेकर तैयारियां काफी पहले से आरंभ हो जाती हैं। पांच दिनों तक चलने वाले इस महापर्व की छटा इतनी निराली होती है कि देश के विभिन्न हिस्सों में रोजगार या नौकरी के सिलसिले में रह रहे लोग भी अपने पैतृक गांवों का रुख करने लगते हैं। स्थानीय निवासी गीता चौहान ने इस पर्व के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इन पर्वतीय क्षेत्रों की प्राचीन संस्कृति और अनूठी परंपराएं किसी को भी हैरान कर सकती हैं। पांच दिनों तक चलने वाले इस आयोजन के दौरान बिमल की लकड़ी से बनी विशेष मशालें जलाई जाती हैं। इसके साथ ही गांव के पंचायती आंगन में अखरोट फेंककर प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। इस पूरे उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण काठ का हाथी और विशेष हिरन नृत्य होता है, जिस पर गांव का मुखिया राजा की भांति सवार होकर पारंपरिक अंदाज में नृत्य करता है। इतिहासकार श्रीचंद शर्मा के अनुसार, इन क्षेत्रों में दीवाली एक महीने की देरी से मनाए जाने के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी मान्यताएं प्रचलित हैं। पहली मान्यता यह है कि भगवान राम के अयोध्या लौटने का संदेश इन दुर्गम और ऊंचे पहाड़ी इलाकों तक एक महीने की देरी से पहुंचा था, जिसके बाद यहां के ग्रामीणों ने मशालें जलाकर अपनी खुशी का इजहार किया था। दूसरी वजह यह है कि इस तय समय के दौरान ग्रामीण अपने खेतों की कटाई और मड़ाई के कार्य में व्यस्त रहते हैं, और उस काम को पूरी तरह निपटाने के बाद ही वे तन्मयता के साथ इस उत्सव को मनाते हैं। इसका आप पर असर इस अनूठी परंपरा का प्रभाव मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों के सामाजिक जीवन और क्षेत्रीय पर्यटन पर पड़ता है। • उत्तराखंड में: जौनसार-बावर और रंवाई-जौनपुर के स्थानीय लोगों को कृषि कार्यों के बाद अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का अवसर मिलता है। बाहर नौकरी कर रहे प्रवासियों को इस पांच दिवसीय आयोजन के दौरान अपने पैतृक गांवों लौटने का बड़ा मौका मिलता है। • पर्यटन के मोर्चे पर: इस अनूठे लोकपर्व को देखने के लिए सीमावर्ती और पहाड़ी जिलों में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ती है। इससे स्थानीय स्तर पर होमस्टे और पारंपरिक कलाओं को बढ़ावा मिलने की संभावना मजबूत होती है। ऐसा क्यों हुआ मुख्य दीवाली के ठीक एक महीने बाद मनाए जाने वाले इस पर्व के पीछे भौगोलिक कठिनाइयां और ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हैं। • ऐतिहासिक संदेश देरी से पहुंचना: इतिहासकारों के मुताबिक प्राचीन काल में अयोध्या से लौटने वाले भगवान राम की खबर दुर्गम पहाड़ियों तक पहुंचने में एक महीने का समय लग गया था। इसी ऐतिहासिक देरी के कारण यहां के निवासियों ने बाद में उसी दिन जश्न मनाना शुरू कर दिया। • कृषि व्यस्तताएं: मुख्य दीवाली के समय इन पहाड़ी इलाकों के किसान खेतों की कटाई और मड़ाई के कार्य में पूरी तरह व्यस्त होते हैं। किसान अपनी फसल समेटने के बाद ही फुर्सत से इस बड़े उत्सव की तैयारी करते हैं। सवाल-जवाब 1. बूढ़ी दिवाली मुख्य दिवाली के कितने समय बाद मनाई जाती है? बूढ़ी दिवाली मुख्य दीपावली के ठीक एक महीने बाद मनाई जाती है। 2. यह पर्व मुख्य रूप से किन क्षेत्रों में मनाया जाता है? यह लोकपर्व उत्तराखंड के जौनसार-बावर, रंवाई-जौनपुर, उत्तरकाशी और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जैसे सीमावर्ती इलाकों में मनाया जाता है। 3. बूढ़ी दिवाली कितने दिनों तक चलती है? यह महात्सव कुल पांच दिनों तक लगातार चलता है। 4. इस उत्सव के दौरान कौन से प्रमुख कार्यक्रम होते हैं? इस दौरान बिमल की लकड़ी से बनी मशालें जलाई जाती हैं, आंगन में अखरोट फेंके जाते हैं और काठ के हाथी तथा हिरण नृत्य का आयोजन होता है। 5. इतिहासकारों के अनुसार इस त्योहार को एक महीने बाद मनाने का क्या कारण है? इतिहासकारों के अनुसार भगवान राम के लौटने की खबर दुर्गम पहाड़ियों तक एक महीने देरी से पहुंचने और उस समय खेतों की कटाई में व्यस्त होने के कारण यह एक महीने बाद मनाई जाती है। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-ke-ina-anokhe-ganvon-men-eka-mahine-bada-kyon-jamakati-hai-divali-janie-kya-hai-budhi-diwali-ki-parnpara-57604 TrendKia — Har trend, sabse pehle.