उत्तराखंड के इस ऐतिहासिक मंदिर से थर-थर कांपकर भागे थे गोरखा, 40 किलो तांबे की प्लेट का है रहस्य पौड़ी गढ़वाल के कीर्तिखाल गांव में स्थित भैरव गढ़ी मंदिर का इतिहास राजाओं और गोरखा आक्रमण से जुड़ा है। यहां 2,400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस रहस्यमयी धाम में रोट का प्रसाद चढ़ाया जाता है। उत्तराखंड की हसीन वादियों में स्थित पौड़ी गढ़वाल का कीर्तिखाल गांव अपनी ऐतिहासिक धरोहरों और प्राचीन मंदिरों के लिए खास पहचान रखता है। इसी इलाके में पहाड़ों की गोद में बसा भैरव गढ़ी मंदिर देश-विदेश के पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र है। कुदरती खूबसूरती से घिरे इस प्राचीन स्थल को लेकर कई ऐसी पुरानी कहानियां जुड़ी हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं। गढ़वाल क्षेत्र में भगवान भैरव को क्षेत्र का मुख्य रक्षक माना जाता है और इस पावन स्थल की महिमा का अंदाजा इसके पुराने इतिहास से लगाया जा सकता है। समुद्र तल से ऊंचाई और भौगोलिक स्थिति यह धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल समुद्र तल से करीब 2,400 मीटर यानी 9,000 फीट की ऊंचाई पर एक शानदार पहाड़ी चोटी पर खड़ा है। इसे लंगूर गढ़ी के नाम से भी जाना जाता है और यह ऐतिहासिक रूप से गढ़वाल के 52 गढ़ों यानी किलों में से एक लंगूर गढ़ माना गया है। मंदिर परिसर के आसपास का वातावरण बेहद शांत और मनमोहक है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां सच्चे मन से दर्शन करने मात्र से ही जीवन की तमाम बाधाएं और नकारात्मक ऊर्जा हमेशा के लिए दूर हो जाती हैं। गोरखा आक्रमण और ऐतिहासिक घेराबंदी इस जगह के इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो पता चलता है कि 18वीं शताब्दी के अंतिम दौर यानी लगभग 1791 और 19वीं सदी की शुरुआत में नेपाल से आए गोरखाओं ने गढ़वाल के साथ-साथ कुमाऊं के इलाकों पर हमले किए थे। सामरिक लिहाज से बेहद अहम माने जाने वाले इस लंगूरगढ़ पर कब्जा जमाने के लिए गोरखाओं ने करीब दो साल तक घेराबंदी करके रखी थी। हालांकि हैरान करने वाली बात यह रही कि युद्ध शुरू होने के महज 28 दिनों के भीतर ही गोरखा सेना को मुंह की खानी पड़ी और उन्हें पीछे हटना पड़ा। इस बड़ी जीत के पीछे स्थानीय लोग कालभैरव की किसी चमत्कारिक और अदृश्य शक्ति का प्रभाव मानते हैं। चालीस किलो वजनी ताम्र-पत्र का रहस्य इस भीषण युद्ध के दौरान भैरवनाथ के चमत्कारों को नजदीक से देखने के बाद गोरखा सेना से जुड़े एक थापा अधिकारी ने अपनी हार स्वीकार की और मंदिर में लगभग 40 किलो वजनी एक ताम्र-पत्र यानी तांबे की प्लेट भेंट स्वरूप अर्पित की। इसी घटना के बाद से इस पूरे इलाके में भैरव गढ़ी को गढ़वाल के रक्षक के रूप में पूजा जाने लगा। इस ऊंची चोटी से चारों दिशाओं में फैली हिमालय की ऊंची-ऊंची चोटियां और बांझ, बुरांश तथा देवदार के पेड़ों से सजे घने जंगल साफ दिखाई देते हैं, जिनका 360-डिग्री नजारा सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देता है। प्रसाद और मेलों की परंपरा ऐसी गहरी मान्यता है कि यहां के कालनाथ भैरव को काले रंग की चीजें विशेष प्रिय हैं। यही वजह है कि मंदिर में भक्तों की ओर से मंडुए यानी रागी के आटे से तैयार की जाने वाली खास रोटी जिसे रोट कहा जाता है, उसका भोग लगाया जाता है। हर साल जून के महीने यानी ज्येष्ठ मास के दौरान यहां एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए दूर-दराज के इलाकों से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके अलावा सावन के महीने में भी इस पवित्र परिसर में विशेष कीर्तन और भंडारों का सिलसिला लगातार जारी रहता है। कैसे पहुंचें और ट्रेकिंग का रोमांच इस रहस्यमयी और आध्यात्मिक स्थल तक पहुंचना अपने आप में एक रोमांचक सफर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पर्यटकों और श्रद्धालुओं को लगभग 2 से 4 किलोमीटर लंबी चढ़ाई पार करनी पड़ती है और एक सुंदर ट्रेक से होकर गुजरना होता है। दुर्गम रास्तों और घने जंगलों के बीच से गुजरने वाला यह ट्रेक यात्रा के अनुभव को और भी ज्यादा यादगार बना देता है, जहां प्रकृति प्रेमी अपनी थकान भूलकर इस प्राचीन धरोहर के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। इसका आप पर असर इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल की यात्रा करने वाले पर्यटकों और स्थानीय निवासियों के लिए यात्रा से जुड़ी कई व्यावहारिक बातें महत्वपूर्ण हैं। • उत्तराखंड में: राज्य के पहाड़ी पर्यटन और धार्मिक स्थलों पर आने वाले पर्यटकों को दुर्गम ट्रेकिंग मार्गों के लिए शारीरिक रूप से तैयार रहना होगा। 2 से 4 किलोमीटर की चढ़ाई के दौरान मौसम और पैदल यात्रा के इंतजामों का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। • कीर्तिखाल और स्थानीय क्षेत्र में: स्थानीय निवासियों और आसपास के गांवों के लोगों के लिए ऐसे धार्मिक मेलों और आयोजनों से क्षेत्रीय संस्कृति को बढ़ावा मिलता है और पर्यटन गतिविधियों में तेजी आती है। जून और सावन के महीनों में यहां आने वाले श्रद्धालुओं को स्थानीय प्रशासन और परिवहन व्यवस्थाओं का सहयोग मिलता है। सवाल-जवाब 1. भैरव गढ़ी मंदिर कहां स्थित है? यह मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गांव में स्थित है। 2. मंदिर कितनी ऊंचाई पर बना हुआ है? यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 2,400 मीटर यानी 9,000 फीट की ऊंचाई पर एक पहाड़ी चोटी पर स्थित है। 3. भैरव गढ़ी मंदिर को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है? इस मंदिर को लंगूर गढ़ी के नाम से भी जाना जाता है और यह गढ़वाल के 52 गढ़ों में से एक है। 4. मंदिर में किस प्रकार का विशेष प्रसाद चढ़ाया जाता है? यहां मंडुए यानी रागी के आटे से तैयार की जाने वाली रोटी जिसे रोट कहा जाता है, उसका प्रसाद चढ़ाया जाता है। 5. मंदिर तक पहुंचने के लिए कितनी पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है? मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 2 से 4 किलोमीटर की चढ़ाई और ट्रेक करना पड़ता है। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-ke-is-aitihasik-mandir-se-thar-thar-kaampkar-bhage-the-gorkha-28788 TrendKia — Har trend, sabse pehle.