# उत्तराखंड के इस गुप्त सिद्धपीठ में देवराज इंद्र ने की थी तपस्या, रानीपुर के जंगलों में स्थित है मां सुरेश्वरी का प्राचीन मंदिर

> हरिद्वार के रानीपुर जंगलों में सुरकूट पर्वत पर स्थित प्राचीन सुरेश्वरी देवी मंदिर का इतिहास पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित इस पवित्र सिद्धपीठ में सच्चे मन से की गई पूजा से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-ke-is-gupt-siddhpeeth-mein-devraj-indra-ne-ki-thi-tapasya-49754 · **Language:** Hindi
**Tags:** सुरेश्वरी देवी मंदिर, हरिद्वार, स्कंद पुराण, राजाजी टाइगर रिजर्व, नवरात्रि, उत्तराखंड धर्म

हरिद्वार की पहचान केवल हर की पौड़ी और गंगा के घाटों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस धर्मनगरी में कई ऐसे प्राचीन सिद्धपीठ और पौराणिक स्थल भी मौजूद हैं जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में प्रमुखता से मिलता है। इन्हीं में से एक पवित्र और चमत्कारी स्थल देवी भगवती को समर्पित सुरेश्वरी देवी मंदिर है। यह ऐतिहासिक मंदिर मुख्य क्षेत्र से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर रानीपुर इलाके में राजाजी टाइगर रिजर्व के घने जंगलों के बीच सुरकूट पर्वत पर सुशोभित है। इस धार्मिक स्थल का विशेष महत्व स्कंद पुराण के केदारखंड में भी विस्तार से बताया गया है।

## सुरकूट पर्वत पर देवराज इंद्र की तपस्या का इतिहास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हरिद्वार में स्थित देवी भगवती का यह धाम बेहद चमत्कारी माना जाता है, जहां भक्तों की सच्ची आराधना का फल माता रानी बहुत जल्द प्रदान करती हैं। साल के दोनों प्रमुख नवरात्रों यानी चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां मां के दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर के पुजारी त्रिलोचन तिवारी ने स्कंद पुराण के केदारखंड में दर्ज प्राचीन कथा का जिक्र करते हुए बताया कि एक समय जब राजा रजी के पुत्रों ने देवलोक पर अधिकार कर लिया था, तब देवराज इंद्र भय के साये में इधर-उधर भटकने को मजबूर हो गए थे।

## भगवान विष्णु की सलाह पर पहुंचे थे हरिद्वार
पौराणिक प्रसंग के अनुसार भगवान विष्णु के मार्गदर्शन पर ही देवराज इंद्र ने हरिद्वार क्षेत्र में गंगा नदी के पश्चिमी छोर पर स्थित सुरकूट पर्वत का रुख किया था। वहां उन्होंने एक साधारण इंसान का रूप धारण करके देवी भगवती की कठिन तपस्या की थी। उनकी इस कठोर साधना से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें उनका खोया हुआ सिंहासन वापस पाने का आशीर्वाद प्रदान किया था। देवताओं यानी सुरों की देवी होने की वजह से इस पावन धाम का नाम सुरेश्वरी देवी पड़ा। पुजारी त्रिलोचन तिवारी का कहना है कि माता ने इंद्रदेव को यह वरदान दिया था कि इस पवित्र स्थान पर जो भी भक्त सच्चे भाव से प्रार्थना करेगा, उसकी मुराद अवश्य पूरी होगी। शारदीय नवरात्र के समय संतान प्राप्ति, धन और पारिवारिक सुख की कामना लेकर दूर-दूर से लोग यहां आते हैं। यदि कोई भक्त शारीरिक रूप से यहां नहीं पहुंच पाता है, तो वह घर पर रहकर भी मां का ध्यान करके अपनी मनोकामनाएं पूरी कर सकता है।

## श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और मन्नतें
दिल्ली से सुरेश्वरी देवी मंदिर में दर्शन करने पहुंचीं महिला श्रद्धालु सुगंध ने इस स्थान के चमत्कारों के बारे में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि हरिद्वार केवल गंगा स्नान तक सीमित नहीं है बल्कि सुरकूट पर्वत पर स्थित यह मंदिर अपनी चमत्कारिक ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध है। जिस तरह प्राचीन काल में देवराज इंद्र की कठिन तपस्या सफल हुई थी, उसी प्रकार आज भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है। उन्होंने कहा कि वह विशेष रूप से दिल्ली से आई हैं और मां की कृपा से उनकी तथा उनके साथियों की मनोकामनाएं पूरी हुई हैं। अपनी मन्नत पूरी होने के बाद वह दोबारा आभार व्यक्त करने और पूजा-अर्चना करने के लिए इस सिद्धपीठ में पहुंची हैं। स्कंद पुराण में उल्लिखित इस स्थल पर आने वाले हर श्रद्धालु का मां पर अटूट विश्वास रहता है।

## इसका आप पर असर
यह धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का समाचार है जिसका पाठकों के दैनिक जीवन पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता है, लेकिन यह आध्यात्मिक यात्रा से जुड़े लोगों को प्रभावित करता है।

- **उत्तराखंड में:** रानीपुर और राजाजी टाइगर रिजर्व के जंगलों के पास स्थित इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को यात्रा के दौरान वन विभाग के नियमों और सुरक्षा निर्देशों का पालन करना होगा। शारदीय और चैत्र नवरात्र के समय स्थानीय प्रशासन और मंदिर समिति को भारी भीड़ के प्रबंधन के लिए विशेष इंतजाम करने होते हैं।
- **भारत में:** देश भर से हरिद्वार आने वाले तीर्थयात्री इस पौराणिक सिद्धपीठ के दर्शन अपनी यात्रा योजना में शामिल कर सकते हैं। सनातन संस्कृति और प्राचीन ग्रंथों में रुचि रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थल धार्मिक पर्यटन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

## ऐसा क्यों हुआ
सुरेश्वरी देवी मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व हिंदू धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यह स्थान सदियों से सनातन आस्था का केंद्र रहा है।

- **पौराणिक संदर्भ:** स्कंद पुराण के केदारखंड में इस स्थान का विशेष उल्लेख मिलता है, जो इसे प्राचीन काल से एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र बनाता है।
- **ऐतिहासिक मान्यता:** किंवदंतियों के अनुसार देवराज इंद्र द्वारा संकट के समय यहां कठोर तपस्या किए जाने के कारण इस क्षेत्र को विशेष पवित्रता प्राप्त हुई।
- **धार्मिक परंपरा:** सनातन धर्म में नवरात्र के अवसरों पर शक्तिपीठों और देवी मंदिरों की यात्रा करने की प्राचीन परंपरा है, जिसके कारण यहां हर साल भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. सुरेश्वरी देवी मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर हरिद्वार में हर की पौड़ी से लगभग 10 किलोमीटर दूर रानीपुर क्षेत्र में राजाजी टाइगर रिजर्व के घने जंगलों के बीच सुरकूट पर्वत पर स्थित है।

### 2. इस मंदिर का उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है?
सुरेश्वरी देवी मंदिर का विशेष उल्लेख स्कंद पुराण के केदारखंड में मिलता है।

### 3. सुरेश्वरी देवी नाम क्यों पड़ा?
देवराज इंद्र ने सुरकूट पर्वत पर कठोर तपस्या की थी और देवी ने उन्हें वरदान दिया था। देवताओं यानी सुरों की देवी होने के कारण यह धाम सुरेश्वरी देवी कहलाया।

### 4. मंदिर में किन अवसरों पर सबसे अधिक भीड़ होती है?
चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां देवी मां की पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं।

### 5. मंदिर के पुजारी का क्या नाम है?
मंदिर के पुजारी त्रिलोचन तिवारी हैं जिन्होंने इस स्थल से जुड़ी पौराणिक कथा की जानकारी दी।

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