# उत्तराखंड के इस अनोखे क्षेत्र में रक्षाबंधन से अठारह दिन बाद मनाई जाती है राखी, जुड़ी है गौतम ऋषि की कथा

> उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में तिवारी समाज पारंपरिक श्रावण पूर्णिमा के बजाय उसके करीब 18 दिन बाद रक्षाबंधन का त्योहार मनाता है। इस अनोखी परंपरा के पीछे गौतम ऋषि से जुड़ी एक पुरानी पौराणिक कथा का जिक्र किया जाता है।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-08-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-ke-isa-anokhe-kshetra-men-raksha-bandhan-se-atharaha-dina-bada-manai-jati-hai-rakhi-juri-hai-gautam-rishi-ki-katha-24188 · **Language:** Hindi
**Tags:** उत्तराखंड, तिवारी समाज, रक्षाबंधन, गौतम ऋषि, कुमाऊं परंपरा, हरतालिका

देशभर में भाई और बहन के स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन का पावन पर्व मुख्य रूप से श्रावण पूर्णिमा के दिन ही मनाया जाता है। अलग-अलग राज्यों में इस उत्सव को मनाने के अपने विशेष रीति-रिवाज और तौर-तरीके हैं, जो इसकी सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं। हालांकि, उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के अंतर्गत एक ऐसा समुदाय भी निवास करता है, जहां सामान्य तिथि के लगभग 18 दिन बीत जाने के बाद राखी बांधने का विधान निभाया जाता है। यह अनूठी प्रथा मुख्य तौर पर तिवारी समाज की धार्मिक मान्यताओं और गौतम ऋषि के जीवन से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा पर आधारित मानी जाती है।

 इस वर्ष आम तौर पर रक्षाबंधन का उत्सव 28 अगस्त के दिन संपन्न हुआ था, किंतु तिवारी समुदाय के लोगों ने इस तिथि से करीब 18 दिन के अंतराल के बाद इस पर्व को मनाया। इस विशेष दिवस पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और परंपराएं भी सामान्य दिनों में मनाए जाने वाले रक्षाबंधन से काफी भिन्न होती हैं। यही कारण है कि उत्तराखंड की यह विशिष्ट संस्कृति देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग पहचान रखती है और लोगों के बीच कौतूहल का विषय बनी रहती है।

 

## गौतम ऋषि से जुड़ी पौराणिक मान्यता
 नैनीताल निवासी डॉ. ललित तिवारी के अनुसार, इस समुदाय की इस खास परंपरा का मूल आधार गौतम ऋषि से जुड़ी एक प्राचीन कथा में निहित है। ऐसी मान्यता है कि यह पूरा तिवारी समुदाय गौतम ऋषि का वंशज और अनुयायी है, और उनका गोत्र भी गौतम ही है। पौराणिक कथा का विवरण देते हुए बताया गया है कि एक बार श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर जनेऊ से जुड़े हुए विभिन्न धार्मिक कार्य चल रहे थे। उसी दौरान भारद्वाज ऋषि ने गौतम ऋषि को यह सुझाव दिया कि वे वहां मौजूद सभी ऋषियों को जनेऊ धारण करवाएं।

 गौतम ऋषि ने तो सभी अन्य ऋषियों को समय पर जनेऊ पहना दिया, लेकिन जब उनकी स्वयं की बारी आई, तब तक हस्त नक्षत्र का अति शुभ मुहूर्त पूरी तरह समाप्त हो चुका था। इसके पश्चात उनके लिए दोबारा से शुभ योग और मुहूर्त निकाला गया, जो कि लोक मान्यताओं के अनुसार ठीक 18 दिन बाद आया था। उसी निर्धारित शुभ दिवस पर गौतम ऋषि ने अपना जनेऊ धारण किया था। इसी धार्मिक प्रसंग और परंपरा के प्रभाव के कारण तिवारी समाज में श्रावण पूर्णिमा के 18 दिन बाद आने वाले इस दिन को बेहद खास और महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

## हरतालिका और रक्षाबंधन का धार्मिक मेल
 नैनीताल स्थित डीएसबी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग में कार्यरत प्रोफेसर डॉ. ललित तिवारी यह भी बताते हैं कि कुमाऊं अंचल में इस विशिष्ट परंपरा का सीधा संबंध हरतालिका व्रत से भी जोड़ा जाता है। उनके मुताबिक, सामान्य रक्षाबंधन के ठीक 18 दिन के पश्चात हरतालिका का पर्व मनाया जाता है। इस पावन दिन सुहागिन महिलाएं अपने जीवनसाथी की दीर्घायु और परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि की मंगल कामना करते हुए कठोर उपवास रखती हैं। हरतालिका के इस पावन अवसर पर मुख्य रूप से भगवान शिव और प्रथम पूज्य गणेश जी की आराधना की जाती है।

 व्रत रखने वाली महिलाएं नदी या शुद्ध मिट्टी से भगवान शिव और गणेश जी की सुंदर प्रतिमाएं बनाकर उनकी विधिवत पूजा-अर्चना करती हैं। इस दौरान कई महिलाएं बिना जल और अन्न ग्रहण किए पूरे दिन का कठिन उपवास रखती हैं। यह प्राचीन परंपरा केवल तिवारी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि त्रिपाठी और त्रिवेदी समुदायों में भी समान रूप से देखने को मिलती है। इन सभी समुदायों का संबंध मुख्य रूप से प्राचीन सामवेदी ब्राह्मण परंपरा से जोड़ा जाता है.

 

## अलग समय पर पर्व मनाने का चलन
 देश के मैदानी इलाकों में इस खास तिथि को आमतौर पर हरतालिका तीज के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है, जबकि कुमाऊं के पहाड़ी क्षेत्रों में इसे केवल हरतालिका के रूप में ही मनाए जाने की परंपरा चली आ रही है। इस विशेष अवसर पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ परिवार और समाज से जुड़ी पुरानी रीतियां भी पूरी निष्ठा से निभाई जाती हैं। तिवारी समाज में इसी खास दिन पर राखी बांधने की परंपरा होने के कारण भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का यह त्योहार सामान्य रक्षाबंधन की तारीख से अलग समय पर नजर आता है।

 बदलते दौर और आधुनिक होती जीवनशैली के बावजूद तिवारी समाज के भीतर यह अनोखी संस्कृति आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेहद मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। परिवार के बुजुर्ग लोग जहां इस प्राचीन कथा और संस्कृति के मूल स्वरूप को नई पीढ़ी तक पूरी ईमानदारी से पहुंचा रहे हैं, वहीं आज के युवा भी इससे जुड़े सभी पारंपरिक रीति-रिवाजों को पूरे उत्साह के साथ निभा रहे हैं।

## इसका आप पर असर
उत्तराखंड के इस पर्व से जुड़ा बदलाव स्थानीय सांस्कृतिक और पारिवारिक आयोजनों की तिथियों को प्रभावित करता है।

- **भारत में:** देश के अधिकांश हिस्सों में रक्षाबंधन तय पारंपरिक तिथि पर मनाया जाता है, जिससे पर्व की तिथियों में क्षेत्रीय विविधता समझ आती है।
- **उत्तराखंड में:** कुमाऊं अंचल के तिवारी, त्रिपाठी और त्रिवेदी समुदायों में इस विशेष तिथि पर पारिवारिक और धार्मिक अनुष्ठान सामान्य दिनों से अलग समय पर संपन्न किए जाते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. उत्तराखंड के किस क्षेत्र में रक्षाबंधन देर से मनाया जाता है?
उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में तिवारी समाज द्वारा रक्षाबंधन सामान्य तिथि के करीब 18 दिन बाद मनाया जाता है।

### 2. इस अनोखी परंपरा के पीछे मुख्य कथा किससे जुड़ी है?
इस परंपरा का संबंध गौतम ऋषि से जुड़ी पौराणिक कथा से है, जिन्होंने हस्त नक्षत्र का मुहूर्त निकल जाने के 18 दिन बाद जनेऊ धारण किया था।

### 3. कौन-कौन से समुदाय इस परंपरा का पालन करते हैं?
यह परंपरा तिवारी के अलावा त्रिपाठी और त्रिवेदी समुदायों में भी देखने को मिलती है, जिन्हें सामवेदी ब्राह्मण परंपरा से जोड़ा जाता है।

### 4. कुमाऊं में इस पर्व का संबंध किस अन्य व्रत से है?
कुमाऊं क्षेत्र में इस तिथि का संबंध हरतालिका पर्व से जोड़ा जाता है, जिस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं।

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