उत्तराखंड के नैनीताल में बारिश से दरक रहे पहाड़, आलूखेत और कृष्णापुर की बस्तियों पर गहराया भूस्खलन का संकट नैनीताल के आलूखेत और कृष्णापुर इलाकों में पहाड़ी खिसकने से करीब 80 परिवारों के मकानों पर खतरा मंडरा रहा है। कैलाखान के पास नैनीताल-भवाली मार्ग पर भी दरारें आ गई हैं, जिसके बाद प्रशासन ने तकनीकी सर्वे कराकर उपचार की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उत्तराखंड के पहाड़ी शहर नैनीताल में लगातार हो रही भारी बारिश के कारण भूस्खलन और भू-धंसाव की घटनाओं ने गंभीर मोड़ ले लिया है। शहर के आलूखेत और कृष्णापुर क्षेत्रों में पहाड़ियों के नीचे से खिसकने और जमीनी सतह पर गहरी दरारें पड़ने की वजह से स्थिति काफी संवेदनशील हो गई है। पहाड़ी के ऊपरी हिस्सों में बसे लगभग 80 परिवारों पर इस समय विस्थापन और मकान जमींदोज होने का सीधा खतरा मंडरा रहा है। इसके साथ ही नैनीताल-भवाली मार्ग पर कैलाखान के समीप सड़क की सतह पर हल्की दरारें दिखाई देने लगी हैं, जिससे स्थानीय निवासियों, यात्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। आलूखेत और कृष्णापुर की पहाड़ियों पर बढ़ता भूस्खलन का संकट नैनीताल के आलूखेत और कृष्णापुर इलाकों में स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। आलूखेत क्षेत्र में पहाड़ी के निचले हिस्से में लगातार मिट्टी और चट्टानें खिसक रही हैं। इस पहाड़ी के बिल्कुल ऊपरी छोर पर करीब 50 परिवार निवास करते हैं, जिनके घरों की नींव के नीचे से जमीन धीरे-धीरे खिसक रही है। यदि नीचे हो रहा कटाव इसी रफ्तार से जारी रहा, तो ऊपरी आबादी वाले हिस्से को भारी नुकसान पहुंच सकता है। दूसरी ओर, कृष्णापुर क्षेत्र के ऊपरी हिस्से में बसे लगभग 30 परिवार भी ऐसी ही भयानक आपदा की जद में आ गए हैं। इस इलाके में ढलान के नीचे की तरफ से भू-धंसाव तेज हो गया है। जब भी क्षेत्र में मूसलाधार बारिश होती है, तो निचले हिस्से की मिट्टी तेजी से कटकर बहने लगती है, जिससे ऊपर रहने वाले परिवारों की धड़कनें तेज हो जाती हैं। इसके अलावा, नैनीताल को भवाली से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग पर कैलाखान के पास सड़क में आई दरारें इस बात का संकेत दे रही हैं कि पहाड़ी का भू-तकनीकी संतुलन बिगड़ रहा है। स्थानीय लोगों का डर और जल्द वैज्ञानिक उपचार की मांग पहाड़ी ढलानों पर रहने वाले निवासियों में इस समय भारी डर का माहौल है। आलूखेत निवासी आकाश सोनकर ने बताया कि उनका घर पहाड़ी के सबसे ऊपरी हिस्से पर स्थित है, जबकि पहाड़ी के निचले हिस्से में लगातार भूस्खलन हो रहा है। उन्होंने कहा कि अगर भूस्खलन का दायरा इसी तरह बढ़ता रहा, तो ऊपर रहने वाले 50 परिवारों के लिए जान-माल का बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। उन्होंने समय रहते प्रशासनिक स्तर पर पहाड़ी के स्थायी उपचार की तत्काल आवश्यकता जताई। इसी इलाके के एक अन्य स्थानीय निवासी मुकेश कुमार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि पिछले साल भी इस क्षेत्र में भूस्खलन हुआ था, लेकिन इस बार की मानसूनी बारिश के दौरान स्लाइड की रफ्तार और तीव्रता कहीं अधिक बढ़ गई है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण क्षेत्रवासियों में भय व्याप्त है। उन्होंने मांग की है कि प्रशासन को बिना कोई समय गंवाए पहाड़ी को स्थिर करने का कार्य शुरू कर देना चाहिए। कृष्णापुर वार्ड के सभासद सुरेंद्र कुमार ने भी स्थिति की गंभीरता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों क्षेत्र में काफी तेज भूस्खलन हुआ है। हालांकि पिछले वर्ष भी यहां मिट्टी खिसकी थी, लेकिन इस बार की स्थिति अत्यधिक चिंताजनक दिखाई दे रही है। सुरेंद्र कुमार के अनुसार, पहाड़ी के ऊपरी हिस्से में लगभग 30 परिवार रहते हैं। यदि नीचे की तरफ खिसक रहा पहाड़ आगे बढ़ता है, तो इन परिवारों के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। उन्होंने शासन और प्रशासन से मांग की कि आधुनिक वैज्ञानिक तथा तकनीकी तरीकों को अपनाकर इस ढलान का जल्द से जल्द उपचार कराया जाए। सिंचाई विभाग की कार्रवाई और तकनीकी सर्वे की योजना बढ़ते खतरे को देखते हुए सिंचाई विभाग और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त टीम ने प्रभावित आलूखेत तथा कृष्णापुर क्षेत्रों का विस्तृत स्थलीय निरीक्षण किया है। सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता डीके सिंह ने भू-धंसाव की वर्तमान स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण विवरण साझा किए हैं। उन्होंने बताया कि 6 अगस्त को बलियानाला के समीप कृष्णापुर क्षेत्र में नीचे की तरफ पहला बड़ा भूस्खलन हुआ था, जिसके बाद सोमवार को भी इसी स्थान पर अत्यधिक मात्रा में मिट्टी और मलबा नीचे खिसका। अधिशासी अभियंता डीके सिंह ने स्वीकार किया कि पिछले साल की तुलना में इस बार की स्लाइड काफी अधिक गंभीर और व्यापक है। इस चुनौती से निपटने के लिए सिंचाई विभाग ने उत्तराखंड भूस्खलन प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र से संपर्क साधा है। विशेषज्ञों द्वारा प्रभावित क्षेत्र का गहन तकनीकी और भू-वैज्ञानिक निरीक्षण कराया गया है। इसके साथ ही संबंधित खतरनाक स्थानों के स्थायी समाधान के लिए योजना बनाने और डीपीआर (Detailed Project Report) तैयार करने का औपचारिक अनुरोध भेजा गया है। राज्य सरकार और संबंधित तकनीकी निकायों से डीपीआर की मंजूरी मिलने के तुरंत बाद आवश्यक इंजीनियरिंग उपचार कार्य धरातल पर शुरू कर दिया जाएगा। बलियानाला ट्रीटमेंट परियोजना की स्थिति और 298.93 करोड़ रुपये का ढांचा कृष्णापुर क्षेत्र में हो रहे भूस्खलन के कारण प्रसिद्ध बलियानाला ट्रीटमेंट परियोजना पर असर पड़ने की आशंकाएं जताई जा रही थीं, जिस पर अधिशासी अभियंता डीके सिंह ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि बलियानाला मुख्य साइट पर कोई नया भू-धंसाव नहीं हुआ है और इस विषय में आम जनता के बीच भ्रम फैला हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थानीय लोग आसपास के पूरे इलाके को बोलचाल की भाषा में बलियानाला कह देते हैं, जबकि असल में भूस्खलन आलूखेत और कृष्णापुर के विशिष्ट ढलानों पर हो रहा है। कृष्णापुर में नीचे की तरफ हुए भूस्खलन से बलियानाला ट्रीटमेंट साइट पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है और वर्तमान में मुख्य परियोजना पूरी तरह सुरक्षित है। डीके सिंह ने बलियानाला ट्रीटमेंट परियोजना की प्रगति के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लगभग 92 प्रतिशत काम सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है। सरकार द्वारा इस परियोजना को पूर्ण करने की अंतिम समय-सीमा जनवरी 2027 निर्धारित की गई है। इस समय साइट पर रॉक एंकरिंग और ढलान स्थिरीकरण का काम चल रहा है, हालांकि बारिश के कारण काम की गति में थोड़ी कमी आई है। इसके बावजूद अधिकारियों का दावा है कि परियोजना का शेष कार्य निर्धारित लक्ष्य यानी जनवरी 2027 से काफी पहले ही संपन्न कर लिया जाएगा। वित्तीय आंकड़ों की बात करें तो करीब 298.93 करोड़ रुपये की लागत वाली इस वृहद बलियानाला परियोजना में अब तक लगभग 262 करोड़ रुपये की राशि खर्च की जा चुकी है। वहीं दूसरी ओर, आलूखेत और कैलाखान क्षेत्रों में सड़क तथा पहाड़ी ढलान की संवेदनशीलता को देखते हुए नए सिरे से तकनीकी अध्ययन और डीपीआर तैयार कराने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। नैनीताल की संवेदनशील पहाड़ियों पर लगातार बारिश से बढ़ते खतरे को देखते हुए स्थानीय लोगों ने मांग की है कि सभी संवेदनशील क्षेत्रों का तत्काल वैज्ञानिक सर्वे कराकर स्थायी समाधान निकाला जाए, ताकि किसी संभावित बड़ी प्राकृतिक आपदा को समय रहते रोका जा सके। इसका आप पर असर नैनीताल के संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में बढ़ रहे भू-धंसाव से स्थानीय बस्तियों की सुरक्षा और प्रमुख राजमार्गों पर आवागमन सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है। • उत्तराखंड और राष्ट्रीय स्तर पर: पर्वतीय क्षेत्रों में मानसूनी यात्रा के दौरान भूस्खलन का खतरा बढ़ने से यात्रियों को यात्रा योजना बेहद सतर्कता के साथ बनानी होगी। सड़क धंसने से भवाली और नैनीताल के बीच वाहनों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है, जिससे माल ढुलाई और पर्यटन सेवाओं में देरी होने की संभावना है। • नैनीताल के आलूखेत और कृष्णापुर में: पहाड़ी के ऊपरी हिस्से में रहने वाले लगभग 80 परिवारों पर अपना घर खाली करने या विस्थापित होने का खतरा मंडरा रहा है। प्रशासन द्वारा विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे और डीपीआर मंजूर होने तक इन परिवारों को बारिश के दौरान अत्यंत सतर्क रहने की जरूरत है। • यात्रियों और पर्यटकों के लिए: कैलाखान के पास नैनीताल-भवाली मार्ग पर दरारें आने के कारण इस मार्ग का उपयोग करने वाले चालकों को गति सीमा नियंत्रित रखनी होगी। भूस्खलन की चेतावनी वाले दिनों में यात्रियों को वैकल्पिक रास्तों का उपयोग करना चाहिए ताकि किसी भी दुर्घटना से बचा जा सके। • प्रशासन और स्थानीय निकायों पर: सिंचाई विभाग पर 298.93 करोड़ रुपये की बलियानाला परियोजना के साथ-साथ नए प्रभावित क्षेत्रों के लिए जल्द से जल्द तकनीकी उपचार शुरू करने का दबाव है। स्वीकृतियां मिलने के बाद निर्माण एजेंसियों को जनवरी 2027 की समय-सीमा से पहले ढलान स्थिरीकरण का काम पूरा करना होगा। ऐसा क्यों हुआ नैनीताल की भू-वैज्ञानिक संरचना और मूसलाधार मानसूनी बारिश के संयुक्त प्रभाव के कारण आलूखेत और कृष्णापुर की पहाड़ियों पर भूस्खलन की तीव्रता बढ़ी है। • अत्यधिक मानसूनी बारिश: लगातार हो रही भारी बारिश के कारण पहाड़ी मिट्टी में पानी का दबाव बढ़ गया है, जिससे ढलान की पकड़ कमजोर हुई है। पानी के रिसाव ने मिट्टी की निचली परतों को ढीला कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप 6 अगस्त और सोमवार को बड़े पैमाने पर भू-धंसाव हुआ। • नाजुक हिमालयी भू-संरचना: नैनीताल का पूरा क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील और कमजोर भू-वैज्ञानिक परतों पर बसा हुआ है। पुराने भूस्खलन क्षेत्रों में लगातार मानसूनी पानी का बहाव नीचे की तरफ मिट्टी के कटाव को तेजी से बढ़ाता है। • पिछले वर्षों का संचयी प्रभाव: इन क्षेत्रों में बीते वर्षों के दौरान भी भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की गई थीं, लेकिन इस मानसून में स्थिति अधिक गंभीर हो गई। पुरानी दरारों में बारिश का पानी भरने से ढलान और तेजी से खिसकने लगी है। • निकासी और ढलान उपचार की लंबित जरूरत: पहाड़ियों के निचले हिस्से में उचित ड्रेनेज और ढलान स्थिरीकरण का काम न हो पाने से ऊपरी बस्तियों पर दबाव बढ़ गया है। सिंचाई विभाग और भूस्खलन न्यूनीकरण केंद्र अब विस्तृत डीपीआर तैयार कर वैज्ञानिक समाधान लागू कर रहे हैं। सवाल-जवाब 1. नैनीताल के किन इलाकों में भूस्खलन और भू-धंसाव का सबसे ज्यादा खतरा है? नैनीताल के आलूखेत और कृष्णापुर क्षेत्रों में पहाड़ियों के खिसकने और जमीनी दरारें पड़ने का सबसे अधिक खतरा है, जबकि कैलाखान के पास नैनीताल-भवाली सड़क पर भी दरारें देखी गई हैं। 2. भूस्खलन के कारण कुल कितने परिवारों पर संकट मंडरा रहा है? पहाड़ी के ऊपरी हिस्सों में रहने वाले लगभग 80 परिवार खतरे की जद में हैं, जिनमें आलूखेत के करीब 50 परिवार और कृष्णापुर के लगभग 30 परिवार शामिल हैं। 3. प्रशासन और सिंचाई विभाग ने इस खतरे से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं? सिंचाई विभाग और प्रशासन की टीम ने स्थलीय निरीक्षण किया है तथा उत्तराखंड भूस्खलन प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र की मदद से तकनीकी सर्वे कराकर डीपीआर तैयार करने का अनुरोध भेजा है। 4. क्या हालिया भूस्खलन से बलियानाला ट्रीटमेंट परियोजना प्रभावित हुई है? नहीं, अधिशासी अभियंता डीके सिंह ने स्पष्ट किया है कि भूस्खलन आलूखेत और कृष्णापुर में हुआ है और इससे मुख्य बलियानाला ट्रीटमेंट साइट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 5. बलियानाला ट्रीटमेंट परियोजना का कुल बजट कितना है और कितना काम पूरा हो चुका है? बलियानाला परियोजना की कुल लागत करीब 298.93 करोड़ रुपये है, जिसमें से लगभग 262 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और 92 प्रतिशत काम पूरा कर लिया गया है। 6. बलियानाला परियोजना को पूरा करने की अंतिम सीमा क्या तय की गई है? इस परियोजना को पूरा करने का आधिकारिक लक्ष्य जनवरी 2027 रखा गया है, लेकिन अधिकारियों का दावा है कि कार्य जनवरी 2027 से पहले ही पूरा कर लिया जाएगा। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-ke-nainital-men-barisha-se-daraka-rahe-pahara-alukhet-aura-krishnapur-ki-bastiyon-para-gaharaya-bhuskhalana-ka-snkata-30178 TrendKia — Har trend, sabse pehle.