उत्तराखंड के नैनीताल में नए ढलानों पर दरारें, भूगर्भ वैज्ञानिकों ने चेताया बलियानाला और कृष्णापुर के बाद अब आलूखेत में पहाड़ी दरकने की घटनाओं ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों ने पूरे क्षेत्र की निरंतर भूगर्भीय निगरानी और वैज्ञानिक समाधान पर जोर दिया है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध पहाड़ी शहर नैनीताल में ढलानों के भीतर जारी भूगर्भीय गतिविधियां वैज्ञानिकों के लिए गहरी चिंता का विषय बन गई हैं। लंबे समय से भूधंसाव से जूझ रहे बलियानाला क्षेत्र के पास अब आलूखेत की पहाड़ी में हलचल और भूस्खलन दर्ज किया गया है। इसके पहले तकरीबन 10 दिन पूर्व कृष्णापुर इलाके में भी चट्टानों के खिसकने का मामला सामने आया था। एक के बाद एक कई ढलानों पर मिट्टी और पत्थरों के दरकने से यह साफ हो गया है कि शहर के आसपास की जमीन बेहद संवेदनशील स्थिति में है। भूविज्ञान के जानकारों का स्पष्ट कहना है कि इन सभी संवेदनशील जगहों पर होने वाले बदलावों का लगातार वैज्ञानिक आकलन किया जाना बेहद जरूरी है। बलियानाला में ढलान को स्थिर करने की कवायद भूगर्भ विज्ञानी डॉ. भास्कर पाटनी के अनुसार नैनीताल की पर्वत श्रृंखलाओं में हो रही आंतरिक हलचलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। बलियानाला में लंबे अरसे से भूस्खलन और जमीन धंसने की गंभीर समस्या बनी हुई है। इस खतरे को रोकने के लिए सरकार आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल कर ढलानों के उपचार और स्थिरीकरण का काम करवा रही है। डॉ. पाटनी ने बताया कि यह तकनीकी उपचार ऊपर से नीचे की दिशा में किया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया का प्राथमिक उद्देश्य कमजोर हो चुकी ढलानों को धीरे-धीरे मजबूती देना है ताकि भविष्य में किसी बड़े भूस्खलन के खतरे को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सके। कृष्णापुर की नई हलचल से सुरक्षा कार्यों पर खतरा बलियानाला के ठीक पास मौजूद कृष्णापुर इलाका भी भूगर्भीय संरचना के लिहाज से बेहद कमजोर माना जाता है। वहां लगभग 10 दिन पहले पहाड़ी का एक हिस्सा अचानक खिसक गया था। डॉ. पाटनी ने रेखांकित किया कि इस पूरे इलाके की पहाड़ी के कमजोर होने के संकेत पहले ही मिल चुके थे और इसके बारे में पहले भी सचेत किया गया था। अब वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि कृष्णापुर अथवा उसके निकटवर्ती हिस्सों का कटाव बलियानाला की ओर बढ़ता है, तो वहां चल रहे सुरक्षा और स्थिरीकरण कार्यों को भी भारी क्षति पहुंच सकती है। बलियानाला का इतिहास बड़े भूस्खलनों का गवाह रहा है, जहां अतीत में जीआईसी का खेल मैदान तक टूटकर गहरी खाई में समा गया था। पुराने भूस्खलन मलबे पर बसा है नैनीताल स्थानीय भूगर्भ विज्ञानी चारु चंद्र पंत के अनुसार नैनीताल प्राकृतिक रूप से एक अति संवेदनशील जोन में स्थित है। यहां की कई पहाड़ियां संरचनात्मक रूप से भुरभुरी और बेहद कमजोर हैं, जो भारी बारिश या प्राकृतिक दबाव के समय तेजी से धंसने लगती हैं। शहर के ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 1867 में चाइना पीक और वर्ष 1880 में शेर का डांडा क्षेत्र में विनाशकारी भूस्खलन हुए थे। वर्ष 1880 के हादसे में भारी जान-माल का नुकसान हुआ था, जिसके बाद ब्रिटिश काल से ही पहाड़ियों की स्थिरता और सुरक्षा उपायों को लेकर विस्तृत अध्ययन शुरू किए गए थे। चारु चंद्र पंत बताते हैं कि नैनीताल शहर के कई हिस्से पुराने भूस्खलन के मलबे पर ही आबाद हैं। यद्यपि समय के साथ बाजार और शेरवानी जैसे कुछ चिन्हित इलाकों में ढलानों को रोकने के तकनीकी प्रयास किए गए, लेकिन इससे शहर का मूल भूगर्भीय जोखिम समाप्त नहीं हुआ है। उनके विश्लेषण के मुताबिक बलियानाला पूरे नैनीताल की स्थिरता के लिए एक अत्यंत नाजुक कड़ी है। यदि बलियानाला असुरक्षित रहता है, तो उसका असर पूरे शहर पर पड़ सकता है, यही कारण है कि वहां बड़े पैमाने पर सुरक्षा कार्य चलाए जा रहे हैं। भवाली मार्ग और नए डेंजर जोन का अंदेशा आलूखेत क्षेत्र में हाल ही में दिखाई दी भूगर्भीय हलचल रणनीतिक और बुनियादी ढांचे के लिहाज से भी चिंताजनक है, क्योंकि यह क्षेत्र भवाली रोड से सीधा जुड़ा हुआ है। यदि इस पहाड़ी पर कटाव और दरारें बढ़ती हैं, तो इस महत्वपूर्ण मार्ग और आसपास की बस्तियों पर सीधा खतरा मंडराने लगेगा। इसके साथ ही नए भूस्खलन क्षेत्रों के विकसित होने की संभावना भी बढ़ जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आपदा आने के बाद केवल मलबा हटाने या तात्कालिक राहत देने से समस्या का हल नहीं निकलेगा। नैनीताल जैसी जटिल भौगोलिक संरचना वाले शहरों में आधुनिक वैज्ञानिक निगरानी तंत्र, पूर्व चेतावनी प्रणाली और योजनाबद्ध भूगर्भीय उपचार ही ढलानों को सुरक्षित रख सकते हैं। इसका आप पर असर नैनीताल और आसपास की पहाड़ियों में भूधंसाव के नए मामले सामने आने से स्थानीय निवासियों और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ गई है। • उत्तराखंड में: नैनीताल से भवाली जाने वाले मार्ग पर सफर करने वाले यात्रियों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। पहाड़ी दरकने की स्थिति में इस प्रमुख संपर्क मार्ग पर यातायात प्रभावित हो सकता है। • नैनीताल में: आलूखेत, कृष्णापुर और बलियानाला के निकटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों पर सुरक्षा का सीधा जोखिम बना हुआ है। स्थानीय निवासियों को ढलानों पर दिखने वाली किसी भी नई दरार की तुरंत प्रशासन को सूचना देनी चाहिए। • पर्यटन पर प्रभाव: पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता के कारण संवेदनशील रास्तों पर वाहनों के आवागमन को लेकर दिशा-निर्देश कड़े किए जा सकते हैं। शहर आने वाले पर्यटकों को मौसम और रास्तों की ताजा स्थिति देखकर ही यात्रा की योजना बनानी होगी। • बुनियादी ढांचे की सुरक्षा: सुरक्षा कार्यों में लगी तकनीकी टीमों को आसपास की पहाड़ियों में हो रहे बदलावों के अनुरूप अपने निर्माण कार्य की गति और दिशा बदलनी होगी। ढलानों के उपचार में किसी भी रुकावट से सार्वजनिक परिसंपत्तियों को नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा क्यों हुआ नैनीताल की पहाड़ियों में लगातार हो रहे भूस्खलन और दरारों के पीछे इस क्षेत्र की प्राकृतिक भुरभुरी संरचना, पुराने मलबे पर बसावट और जल निकासी की जटिलताएं मुख्य कारण हैं। • प्राकृतिक रूप से कमजोर ढलान: नैनीताल की भूगर्भीय संरचना स्वाभाविक तौर पर नाजुक और खंडित चट्टानों से बनी है। बारिश और प्राकृतिक दबाव के चलते यहां की मिट्टी और पत्थरों की पकड़ आसानी से ढीली पड़ जाती है। • पुराने भूस्खलन जोन पर निर्माण: शहर का एक बड़ा हिस्सा प्राचीन समय में गिरे भूस्खलन के मलबे पर आबाद है। ऐसे क्षेत्रों में ढलानों की आंतरिक बनावट पूरी तरह ठोस नहीं होती, जिससे जमीन धंसने का खतरा बना रहता है। • श्रृंखलाबद्ध भूगर्भीय हलचल: बलियानाला के पास स्थित कृष्णापुर और आलूखेत की पहाड़ियां एक-दूसरे की स्थिरता से जुड़ी हुई हैं। एक ढलान के दरकने से उत्पन्न तनाव आसपास की दूसरी पहाड़ियों को भी अस्थिर कर रहा है। • ऐतिहासिक घटनाओं का सिलसिला: क्षेत्र में वर्ष 1867 और वर्ष 1880 में भी बड़े विनाशकारी भूस्खलन हो चुके हैं। ये घटनाएं साबित करती हैं कि यह संपूर्ण पर्वतीय इलाका दशकों से भूगर्भीय हलचलों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील रहा है। सवाल-जवाब 1. नैनीताल में हाल ही में किन नए इलाकों में भूस्खलन और दरारें देखी गई हैं? बलियानाला के आसपास आलूखेत की पहाड़ी में नई हलचल देखी गई है, जबकि लगभग 10 दिन पहले कृष्णापुर में पहाड़ी दरकने की घटना हुई थी। 2. बलियानाला में सरकार द्वारा किस प्रकार का सुरक्षा कार्य कराया जा रहा है? बलियानाला में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक से पहाड़ी के उपचार और स्थिरीकरण का काम ऊपर से नीचे की तरफ किया जा रहा है। 3. आलूखेत में भूस्खलन से किस मुख्य सड़क पर असर पड़ने की संभावना है? आलूखेत क्षेत्र भवाली रोड से जुड़ा है, जिससे इस मुख्य मार्ग और नजदीकी इलाकों पर असर पड़ने की आशंका है। 4. नैनीताल के इतिहास में बड़े भूस्खलन कब दर्ज किए गए थे? नैनीताल में वर्ष 1867 में चाइना पीक और वर्ष 1880 में शेर का डांडा क्षेत्र में बड़े भूस्खलन हुए थे। 5. अतीत में बलियानाला भूस्खलन के कारण किस खेल मैदान को नुकसान पहुंचा था? अतीत में हुए बड़े भूस्खलन के दौरान जीआईसी का मैदान टूटकर बलियानाला की ओर खिसक गया था। 6. भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार नैनीताल की पहाड़ियों को सुरक्षित रखने के लिए क्या जरूरी है? वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ राहत कार्य काफी नहीं है, बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित भूगर्भीय निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली आवश्यक है। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-ke-nainital-men-nae-dhalanon-para-dararen-bhugarbha-vaijnanikon-ne-chetaya-36939 TrendKia — Har trend, sabse pehle.