# उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य हुड़का की थाप से परिवार पाल रहे अल्मोड़ा के लोक कलाकार अभि राम

> अल्मोड़ा निवासी अभि राम बचपन के शौक को आजीविका बनाकर कुमाऊं की लोक परंपरा को मेलों और धार्मिक उत्सवों में जीवंत रखे हुए हैं।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-ke-parnparika-vadya-hudka-ki-thapa-se-parivara-pala-rahe-almora-ke-loka-kalakara-abhi-ram-43410 · **Language:** Hindi
**Tags:** अल्मोड़ा, अभि राम, हुड़का, कुमाऊं, उत्तराखंड लोक संस्कृति, पारंपरिक वाद्य यंत्र

पहाड़ी अंचल उत्तराखंड में आधुनिक जीवनशैली और नए दौर के मनोरंजन के बीच पारंपरिक कलाओं को संजोए रखना आसान नहीं रहा है। इसके बावजूद कुमाऊं क्षेत्र में कई ऐसे निष्ठावान लोक साधक मौजूद हैं जो पुरखों की विरासत को न केवल जिंदा रखे हुए हैं बल्कि उसी के दम पर अपनी गृहस्थी भी चला रहे हैं। अल्मोड़ा जिले के रहने वाले अभि राम इसी परंपरा की एक मजबूत मिसाल हैं। उन्होंने छोटी उम्र में जिस वाद्य यंत्र को कौतूहल और शौक के तौर पर हाथ में लिया था, वही हुड़का आज उनके परिवार के गुजर-बसर का मुख्य जरिया बन चुका है।

## कुमाऊं और गढ़वाल की सांस्कृतिक आत्मा है हुड़का
उत्तराखंड के पर्वतीय जीवन में हुड़का केवल एक ताल वाद्य नहीं, बल्कि समूची लोक परंपरा की रीढ़ माना जाता है। कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही मंडलों में इसका विशेष सांस्कृतिक महत्व रहा है। यह आकार में छोटा और सुगठित वाद्य यंत्र होता है, जिसे कलाकार एक हाथ से थामकर दूसरे हाथ की उंगलियों और हथेली के सधे हुए प्रहार से बजाता है। पुराने समय से ही जागर गायकी, देवी-देवताओं के आह्वान, धार्मिक अनुष्ठानों और सामूहिक उत्सवों में हुड़के की गूंज अनिवार्य हिस्सा रही है। पहाड़ी लोकगीतों के साथ जब हुड़के की लयबद्ध थाप जुड़ती है, तो वह पूरे परिवेश को एक अलौकिक और पारंपरिक रंग में रंग देती है।

## पारंपरिक निर्माण और वादन की बारीकियां
हुड़का बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक शिल्प और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती है। इसके मूल ढांचे को तैयार करने के लिए विशेष लकड़ी को तराशकर मध्य भाग से खोखला किया जाता है। इसके दोनों खुले सिरों पर प्राकृतिक चमड़े की महीन झिल्ली चढ़ाई जाती है। ध्वनि और ताल को नियंत्रित करने के लिए इस पर रस्सियों या मजबूत डोरियों का कसाव दिया जाता है। वादन के दौरान कलाकार रस्सी के तनाव को हाथ से घटाता-बढ़ाता है, जिससे अलग-अलग पिच और सुर निकलते हैं। उंगलियों और हथेली के संयुक्त तालमेल से निकलने वाली यह धुन वर्षों के कठिन अभ्यास और साधना के बिना संभव नहीं होती।

## शौक से आजीविका तक का सफर
अभि राम के मुताबिक उनके संगीत सफर की शुरुआत बाल्यकाल में ही हो गई थी। बचपन में खेल-खेल में शुरू हुआ यह अभ्यास धीरे-धीरे उनकी पहचान में तब्दील हो गया और आगे चलकर परिवार की रोटी का सहारा बना। आज वह कुमाऊं अंचल के प्रसिद्ध कौथिगों, स्थानीय मेलों, पर्वों और मांगलिक प्रसंगों में पहुंचकर हुड़का वादन करते हैं। उनकी प्रस्तुति शुरू होते ही पूरा मंच और दर्शक दीर्घा लोक संस्कृति के रंगों से सराबोर हो जाती है। आधुनिक संगीत उपकरणों के उभार से पारंपरिक लोक कलाकारों के सामने मंच और आमदनी की चुनौतियां जरूर बढ़ी हैं, लेकिन पहाड़ी परंपराओं में आज भी हुड़के की मांग और प्रतिष्ठा कायम है।

## बदलते दौर में सांस्कृतिक पहचान बचाने का संघर्ष
डिजिटल युग और आधुनिक वाद्य यंत्रों की चकाचौंध के बीच पहाड़ी लोक वाद्य धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहे हैं। ऐसे नाजुक दौर में अभि राम जैसे समर्पित कलाकार लोक संस्कृति की मशाल थामे खड़े हैं। उन्होंने अपने जीवन का एक लंबा कालखंड हुड़के की संगत में बिताया है। उनकी उंगलियों की हर थाप में केवल तालबद्ध संगीत ही नहीं झलकता, बल्कि कुमाऊं की समृद्ध लोकगाथाएं, धार्मिक मान्यताएं और पहाड़ के गौरवशाली अतीत की जीवंत गूंज भी सुनाई देती है।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक पहाड़ी लोक कलाओं और स्थानीय कलाकारों के आर्थिक संरक्षण को लेकर यह खबर महत्वपूर्ण संदेश देती है।

- **उत्तराखंड में:** पहाड़ी मेलों और मांगलिक कार्यों में पारंपरिक लोक कलाकारों को प्रत्यक्ष मंच और मानदेय मिलता है। इससे ग्रामीण अंचल की सांस्कृतिक पहचान बची रहती है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा मिलती है।
- **अल्मोड़ा में:** स्थानीय कलाकार अभि राम जैसे साधकों की मौजूदगी जिले की सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखती है। आयोजनों में उनके वादन से स्थानीय मेलों की मौलिकता बरकरार रहती है और परिवार का भरण-पोषण सुनिश्चित होता है।
- **कला प्रेमियों के लिए:** आधुनिक वाद्य यंत्रों के बीच पारंपरिक हुड़का वादन का अनुभव लोक संगीत के दुर्लभ स्वरूप से जोड़ता है। दर्शक और श्रोता सीधे तौर पर पहाड़ के लुप्तप्राय वाद्य शिल्प और कला का समर्थन कर सकते हैं।
- **सांस्कृतिक संरक्षण:** लोक वाद्य बनाने वाले कारीगरों और वादकों को नियमित काम मिलने से पारंपरिक कुटीर उद्योग को सहारा मिलता है। जब आयोजक ऐसे कलाकारों को बुलाते हैं, तो यह हस्तशिल्प और संगीत दोनों को नया जीवन देता है।

## ऐसा क्यों हुआ
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में आधुनिक तकनीकी संगीत के प्रसार के बीच पारंपरिक वाद्य यंत्रों का संरक्षण व्यक्तिगत निष्ठा और सांस्कृतिक आस्था के बूते ही टिका हुआ है।

- **बचपन का निरंतर अभ्यास:** अभि राम ने कम उम्र से ही हुड़का बजाने को अपनी दिनचर्या और साधना का हिस्सा बनाया। उसी निरंतर साधना ने उन्हें इस कठिन ताल वाद्य पर असाधारण पकड़ और हुनर प्रदान किया।
- **आजीविका से जुड़ाव:** बड़े होने पर उन्होंने आधुनिक नौकरियों के पीछे भागने के बजाय अपनी पैतृक कला को ही आजीविका का जरिया बनाया। मेलों, त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में वादन से मिलने वाला पारिश्रमिक उनके परिवार का आधार बना।
- **धार्मिक व सांस्कृतिक अनिवार्यता:** कुमाऊं और गढ़वाल में जागर गायकी तथा पारंपरिक अनुष्ठानों में हुड़के की उपस्थिति को आध्यात्मिक रूप से जरूरी माना जाता है। इसी सांस्कृतिक आवश्यकता ने आज भी इस वाद्य की उपयोगिता को समाप्त नहीं होने दिया।

## सवाल-जवाब

### 1. अभि राम कौन हैं और वह कहां के रहने वाले हैं?
अभि राम उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के रहने वाले एक पारंपरिक लोक कलाकार हैं, जो हुड़का वादन करते हैं।

### 2. हुड़का किस प्रकार का वाद्य यंत्र है?
हुड़का उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल अंचल का एक पारंपरिक ताल वाद्य है, जिसे हाथ में पकड़कर बजाया जाता है।

### 3. हुड़का किस सामग्री से बनाया जाता है?
इसे बीच से खोखली की गई लकड़ी और दोनों सिरों पर प्राकृतिक चमड़े की झिल्ली लगाकर डोरियों के कसाव के साथ बनाया जाता है।

### 4. पारंपरिक रूप से हुड़का किन अवसरों पर बजाया जाता रहा है?
यह पुराने समय से जागर गायकी, धार्मिक अनुष्ठानों, स्थानीय मेलों, पर्वों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में बजाया जाता रहा है।

### 5. अभि राम अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करते हैं?
वह उत्तराखंड के विभिन्न मेलों, त्योहारों और पारंपरिक आयोजनों में हुड़का बजाकर मिलने वाले पारिश्रमिक से परिवार पालते हैं।

### 6. आधुनिक दौर में पारंपरिक लोक कलाकारों के सामने क्या चुनौती है?
आधुनिक संगीत और बदलते मनोरंजन के कारण पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोक कलाकारों की मांग पहले की तुलना में कम हुई है।

## प्रेरणा और सबक
अभि राम का जीवन यह सिखाता है कि अगर किसी पारंपरिक हुनर को लगन और निष्ठा से साधा जाए, तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी स्वाभिमान की आजीविका बन सकता है।

- **शौक को पहचान बनाना:** बचपन की साधारण रुचि को निरंतर अभ्यास के जरिए दक्षता में बदला जा सकता है। समर्पण से किया गया रियाज साधारण शौक को आजीविका और विशिष्ट पहचान का साधन बना देता है।
- **जड़ों और परंपरा पर गर्व:** आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच अपनी पैतृक लोक संस्कृति और विरासत पर अडिग रहना संभव है। पुरानी कलाओं को त्यागने के बजाय उन्हें सहेजकर भी जीवनयापन किया जा सकता है।
- **बदलाव के बीच निरंतरता:** समय के साथ मांग कम होने या चुनौतियां बढ़ने पर भी अपने हुनर पर भरोसा बनाए रखना चाहिए। निष्ठा और लगन से किया गया काम हमेशा समाज में अपनी जगह और सम्मान बनाए रखता है।

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