# उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्तन कैंसर की दस्तक, विशेषज्ञ ने 20 की उम्र से नियमित जांच पर दिया जोर

> नैनीताल में आयोजित जागरूकता अभियान के दौरान विशेषज्ञों ने महिलाओं को समय पर स्क्रीनिंग कराने और शुरुआती शारीरिक बदलावों को न छिपाने की सलाह दी है।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-ke-parvatiya-jilon-men-stana-kainsara-ki-dastaka-visheshajna-ne-20-ki-umra-se-niyamita-jancha-para-diya-jora-43174 · **Language:** Hindi
**Tags:** स्तन कैंसर, नैनीताल, उत्तराखंड, स्वास्थ्य, डॉ आनंद मिश्रा, पिंक रैली, जागरूकता अभियान

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाओं के बीच स्तन कैंसर की बढ़ती उपस्थिति को देखते हुए नैनीताल में सघन जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। अक्टूबर का पूरा महीना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है, और इसी सिलसिले में आयोजित कार्यक्रमों के जरिए महिलाओं को समय रहते जांच कराने और लक्षणों को न छिपाने का संदेश दिया जा रहा है। पर्वतीय इलाकों में देर से अस्पताल पहुंचने की प्रवृत्ति बीमारी को गंभीर बना रही है, जिसे रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर कई आयोजनों की शुरुआत की गई है।

## नैनीताल पहुंची विशेषज्ञ टीम ने चेताया, शुरुआती पहचान ही सबसे बड़ा बचाव
जागरूकता कार्यक्रमों में भाग लेने पहुंचे किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ के प्रोफेसर एवं विशेषज्ञ डॉ. आनंद मिश्रा ने स्पष्ट किया कि महिलाओं में होने वाले तमाम कैंसरों में स्तन कैंसर शीर्ष पर आता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं को अपने शरीर में महसूस होने वाले किसी भी असामान्य बदलाव को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जब बीमारी की पहचान शुरुआती दौर में हो जाती है, तब चिकित्सकों के पास उपचार के लिए कई सुरक्षित और असरदार विकल्प मौजूद रहते हैं।

डॉ. आनंद मिश्रा ने जानकारी दी कि कई बार स्तन कैंसर के पीछे आनुवंशिक या जेनेटिक कारण सक्रिय रहते हैं। यदि किसी महिला के परिवार में पहले किसी करीबी सदस्य को स्तन कैंसर रहा हो, तो उसमें इस बीमारी के पनपने का जोखिम काफी बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में महिलाओं को रिस्क असेसमेंट कराने और डॉक्टरों के परामर्श के अनुसार नियमित स्क्रीनिंग कराने की तत्काल जरूरत होती है। शुरुआती संकेतों की उपेक्षा करने पर जब मरीज अस्पताल पहुंचते हैं, तब तक ट्यूमर काफी आगे बढ़ चुका होता है, जिससे इलाज जटिल हो जाता है।

## पहाड़ों में सामने आ रहे मामले, अल्मोड़ा और बागेश्वर से मिले आंकड़े
उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी अंचलों में यह बीमारी तेजी से पैर पसार रही है। हाल के छह महीनों के दौरान अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों से करीब 25 महिलाओं को कीमोथेरेपी दिए जाने की बात सामने आई है। इसके अलावा नैनीताल और अन्य पर्वतीय जिलों में भी नए मामलों की पहचान चिंता का विषय बनी हुई है। विशेषज्ञ डॉक्टरों का मानना है कि दुर्गम भूगोल, स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता, सही समय पर विशेषज्ञ डॉक्टरों तक न पहुंच पाना और बीमारी के लक्षणों के प्रति पर्याप्त जानकारी न होना इस संकट को और गहरा कर रहा है। इसके साथ ही कम उम्र की महिलाओं में भी ऐसे लक्षण मिलना चिंता की एक बड़ी वजह बन गया है।

## बीस की उम्र पार करते ही रखें सजगता, जटिलताओं से बचने का तरीका
उपचार की जटिलताओं पर चर्चा करते हुए डॉ. मिश्रा ने बताया कि शुरुआती स्टेज में बीमारी पकड़ में आने पर सर्जरी और अन्य तय पद्धतियों से मरीज को पूरी तरह स्वस्थ किया जा सकता है। इसके विपरीत, यदि बीमारी पुरानी हो जाए और अन्य अंगों तक फैलने लगे, तो उपचार की अवधि लंबी खिंच जाती है और प्रक्रिया काफी कठिन हो जाती है।

विशेषज्ञों ने महिलाओं को स्पष्ट परामर्श दिया है कि 20 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद उन्हें अपने स्तनों में आने वाले किसी भी तरह के असामान्य बदलाव, गांठ या त्वचा संबंधी परिवर्तन के प्रति पूरी तरह सतर्क रहना चाहिए। जिन महिलाओं के परिवार में पहले से कैंसर का पारिवारिक इतिहास रहा है, उन्हें विशेष रूप से चिकित्सकीय सलाह लेकर तय समय पर जांच करानी चाहिए।

## भ्रांतियों और डर के माहौल से बाहर निकलने का आह्वान
समाज में स्तन कैंसर को लेकर फैली अफवाहों और अनावश्यक डर पर भी विशेषज्ञों ने खुलकर बात रखी। डॉ. आनंद मिश्रा ने कहा कि समाज में कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं, जिन्हें दूर किया जाना बेहद आवश्यक है। महिलाओं को बीमारी से डरने के बजाय सही जानकारी जुटाकर सीधे डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।

इस वर्ष डब्ल्यूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से भी वैश्विक स्तर पर “एवरी स्टोरी मैटर्स” थीम के तहत अभियान को गति दी जा रही है। इसका मूल संदेश यही है कि इस बीमारी से लड़ने वाली हर महिला का अनुभव अपने आप में एक अलग और महत्वपूर्ण कहानी समेटे हुए है। इनमें से कई दास्तानें अन्य महिलाओं को हिम्मत देती हैं और उन्हें समय पर अस्पताल जाकर जांच कराने के लिए प्रेरित करती हैं।

## गुलाबी रंग के साथ नैनीताल की सड़कों पर उतरी पिंक रैली
अक्टूबर माह के अभियान के तहत नैनीताल में आशा फाउंडेशन की ओर से पिंक रैली निकाली गई। गुलाबी रंग को स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता और उम्मीद का वैश्विक प्रतीक माना जाता है। इस रैली और इससे जुड़े कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को अपने स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देने, बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचानने और किसी भी तरह की हिचक छोड़कर तुरंत योग्य डॉक्टर से संपर्क करने के लिए प्रेरित करना है। जानकारों के मुताबिक, स्तन कैंसर से लड़ाई का सबसे मजबूत आधार सही जानकारी, नियमित स्क्रीनिंग और समय पर शुरू किया गया उपचार ही है।

## इसका आप पर असर
इस स्वास्थ्य जागरूकता अभियान का सीधा असर महिलाओं की दैनिक सतर्कता और नियमित चिकित्सकीय जांच की आदतों पर पड़ता है।

- **उत्तराखंड में:** अल्मोड़ा, बागेश्वर और नैनीताल जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं को निकटतम स्वास्थ्य केंद्रों पर समय रहते जांच कराने का अवसर मिलेगा। इससे दूरदराज के गांवों में रहने वाली महिलाओं को शुरुआती चरण में ही गंभीर बीमारी की पहचान करने में मदद मिलेगी।
- **भारत में:** देशभर की महिलाएं 20 वर्ष की आयु से ही अपने शरीर में होने वाले बदलावों के प्रति सजग हो सकेंगी। नियमित सेल्फ-एग्जामिनेशन और समय पर डॉक्टर से संपर्क करने से कैंसर के अंतिम चरणों में पहुंचने वाले मामलों में कमी आएगी।
- **जांच और परामर्श:** जिन परिवारों में पहले कैंसर का इतिहास रहा है, वे विशेषज्ञ की सलाह से जेनेटिक रिस्क असेसमेंट करा सकते हैं। समय रहते की गई स्क्रीनिंग से जटिल और लंबी कीमोथेरेपी की आवश्यकता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
- **सामाजिक सोच में बदलाव:** स्तन स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने से समाज में फैली झिझक और अफवाहें खत्म होंगी। महिलाएं बिना किसी संकोच के शुरुआती लक्षणों को पहचानकर अस्पताल जाने का फैसला ले सकेंगी।

## ऐसा क्यों हुआ
पर्वतीय क्षेत्रों में स्तन कैंसर के मामलों का गंभीर होना जानकारी के अभाव और भौगोलिक चुनौतियों से जुड़ा हुआ है।

- **जागरूकता की कमी:** सुदूर ग्रामीण इलाकों में शुरुआती संकेतों और गांठों को सामान्य मानकर अनदेखा कर दिया जाता है। इस कारण अधिकांश महिलाएं तब अस्पताल पहुंचती हैं जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है।
- **सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं:** पहाड़ों में विशेषज्ञ कैंसर डॉक्टरों और उन्नत जांच मशीनों की कमी के चलते जांच में अनावश्यक देरी होती है। इसके चलते साधारण दिखने वाले लक्षण भी समय पर पकड़े नहीं जाते।
- **आनुवंशिक जोखिम:** परिवार में पहले किसी करीबी सदस्य को स्तन कैंसर होने से अगली पीढ़ी में इसका खतरा बढ़ जाता है। नियमित रिस्क असेसमेंट न होने के कारण यह जोखिम लंबे समय तक अज्ञात रह जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. स्तन कैंसर की जांच किस उम्र से शुरू करनी चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं को 20 वर्ष की उम्र के बाद से ही अपने शरीर में होने वाले बदलावों को लेकर सतर्क रहना चाहिए और नियमित चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

### 2. अल्मोड़ा और बागेश्वर में हाल ही में कितने मामले सामने आए हैं?
छह महीने की अवधि के भीतर अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों से करीब 25 महिलाओं को कीमोथेरेपी दिए जाने की जानकारी मिली है।

### 3. विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस वर्ष की थीम क्या है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस वर्ष जागरूकता अभियान के लिए 'एवरी स्टोरी मैटर्स' थीम तय की गई है।

### 4. परिवार में कैंसर का इतिहास होने पर क्या करना चाहिए?
जिन महिलाओं के परिवार में स्तन कैंसर का इतिहास रहा है, उन्हें डॉक्टर से संपर्क कर समय पर जेनेटिक रिस्क असेसमेंट और स्क्रीनिंग करानी चाहिए।

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