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  "type": "article",
  "title": "उत्तराखंड की विलुप्त होती बिनाई और हुड़का धुन को सहेज रहे 68 वर्षीय रामचरण जुयाल",
  "summary": "पीडब्ल्यूडी से सेवानिवृत्त होने के बाद पौड़ी गढ़वाल के 68 वर्षीय रामचरण जुयाल उत्तराखंड के दुर्लभ वाद्य यंत्रों बिनाई और हुड़का के संरक्षण में जुटे हैं। उन्होंने आकाशवाणी और नरेंद्र सिंह नेगी के साथ मिलकर देश-विदेश के मंचों पर इन पारंपरिक धुनों की गूंज पहुंचाई है।",
  "content": "उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल मूल के 68 वर्षीय रामचरण जुयाल सेवानिवृत्ति के बाद भी विश्राम करने के बजाय राज्य की पारंपरिक लोक संगीत विरासत को पुनर्जीवित करने के अभियान में जुटे हैं। लोक निर्माण विभाग में अपनी पूर्णकालिक सरकारी सेवा पूरी करने के बाद भी वे हिमालयी राज्य की उन धुनों को सहेज रहे हैं, जो आधुनिक दौर में तेजी से ओझल होती जा रही हैं। विशेष रूप से विलुप्तप्राय पारंपरिक वाद्य यंत्र बिनाई और हुड़का के संरक्षण को उन्होंने अपने जीवन का मुख्य ध्येय बना लिया है।\n\nतबले की ताल से पारंपरिक वाद्य यंत्रों तक का सफर\nरामचरण जुयाल का संगीत से नाता चार दशक से भी अधिक पुराना है। उन्होंने साल 1980 में एक शिक्षार्थी के तौर पर तबला वादन सीखकर अपनी सांगीतिक यात्रा आरंभ की थी। लोक निर्माण विभाग में नियमित दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी उन्होंने अपने भीतर के कलाकार को निरंतर सक्रिय रखा। तबले की लयबद्ध बारीकियों पर पकड़ मजबूत करने के उपरांत उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी लोक वाद्यों का गहन अभ्यास शुरू किया। इस क्रम में उन्होंने हुड़का बजाने में महारत हासिल की और फिर धातु से बने दुर्लभ वाद्य यंत्र बिनाई के कठिन वादन को पूरी निपुणता के साथ साधा।\n\nराष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गूंजी लोक धुनें\nअपनी विशिष्ट वादन शैली के बल पर रामचरण जुयाल आकाशवाणी के ए ग्रेड लोक कलाकार के रूप में स्थापित हुए। इसके साथ ही उन्हें उत्तराखंड के प्रतिष्ठित लोकगायक गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी के संगीत दल का अभिन्न सदस्य बनने का गौरव प्राप्त हुआ। नरेंद्र सिंह नेगी के साथ मिलकर उन्होंने देश के प्रमुख महानगरों दिल्ली और मुंबई में अपनी प्रस्तुतियां दीं। इतना ही नहीं, वे अपनी इस पारंपरिक वादन कला को मस्कट और ओमान जैसे विदेशी मंचों तक भी ले गए, जहां उन्होंने प्रवासी भारतीयों और अंतरराष्ट्रीय श्रोताओं के समक्ष उत्तराखंडी धुनों की अनूठी छटा बिखेरी।\n\nविलुप्ति की कगार पर खड़ी बिनाई और जागर परंपरा की रक्षा\nउत्तराखंड की आध्यात्मिक जागर परंपरा और आंचलिक लोकगाथाओं में बिनाई का स्थान अत्यंत विशिष्ट रहा है। यह वाद्य यंत्र अब अत्यंत दुर्लभ हो चुका है और इसे बजाने वाले कलाकार भी उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। जुयाल के अनुसार समूचे उत्तराखंड में अब केवल इक्के-दुक्के बुजुर्ग कलाकार ही शेष हैं, जिन्हें बिनाई बजाने का पारंपारिक ज्ञान है। इस नायाब वाद्य यंत्र की गूंज पूरी तरह खामोश न हो जाए, इसी चिंता के कारण वे उम्र के इस पड़ाव पर भी इसके संरक्षण और निरंतर अभ्यास में समर्पित हैं।\n\nयुवा पीढ़ी को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास\nरामचरण जुयाल केवल अतीत की स्मृतियों को संजोने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे भावी पीढ़ी के सामने इन वाद्य यंत्रों का व्यावहारिक प्रदर्शन कर उन्हें जागरूक कर रहे हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि जब तक नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पारंपरिक संगीत विधाओं से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ेगी, तब तक लोक धरोहरों को सुरक्षित रख पाना असंभव होगा। इसी सोच के साथ वे आज भी निरंतर अभ्यास करते हुए देवभूमि की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को नई सांसें देने में लगे हैं।\n\nइसका आप पर असर\nपारंपरिक वाद्य यंत्रों का संरक्षण समाज की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में सीधी भूमिका निभाता है।\n\n• भारत में: यह प्रयास देश के विभिन्न राज्यों में लुप्त हो रही दुर्लभ क्षेत्रीय संगीत परंपराओं के दस्तावेजीकरण और संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाता है। संगीत प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए पारंपरिक लोक वाद्यों की तकनीक को समझने का अवसर बना रहता है।\n• उत्तराखंड में: राज्य के युवाओं को अपनी मौलिक जागर और लोक संगीत धरोहर से सीधे रूबरू होने का मंच मिलता है। इससे बिनाई और हुड़का जैसी दुर्लभ वाद्य विधाओं को सीखने के प्रति नई पीढ़ी में उत्सुकता पैदा हो सकती है।\n• लोक कलाकारों के लिए: वरिष्ठ कलाकारों की यह लगन साबित करती है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी लोक कला की सेवा जारी रखी जा सकती है। इससे युवा कलाकारों को अपनी जड़ों से जुड़े रहकर लोक संगीत को मंच देने का संबल मिलता है।\n• सांस्कृतिक पर्यटन: पारंपरिक वाद्य यंत्रों का जीवंत प्रदर्शन राज्य की सांस्कृतिक पहचान को विशिष्ट बनाकर पर्यटकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है। स्थानीय मेलों और उत्सवों में इन धुनों की मौजूदगी लोक परंपराओं को नई प्रासंगिकता प्रदान करती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nउत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्रों के विलुप्त होने की मुख्य वजह आधुनिक संगीत का बढ़ता प्रभाव और नई पीढ़ी में इन कठिन वाद्य यंत्रों को सीखने की रुचि का कम होना है। रामचरण जुयाल ने इस संकट को देखते हुए इन्हें बचाने का व्यक्तिगत संकल्प लिया।\n\n• सीखने वालों की भारी कमी: बिनाई और हुड़का जैसे वाद्य यंत्रों को बजाने के लिए निरंतर साधना और विशेष तकनीक की आवश्यकता होती है, जिसे सीखने वाले गिने-चुने लोग ही बचे हैं। उचित प्रशिक्षण और अभ्यास के अभाव में यह कला केवल कुछ बुजुर्ग कलाकारों तक सिमट कर रह गई।\n• सरकारी सेवा के साथ साधना: लोक निर्माण विभाग में नियमित नौकरी करते हुए जुयाल ने 1980 से संगीत का अभ्यास जारी रखा और सेवानिवृत्ति के बाद इसे पूर्णकालिक मिशन बना लिया। उन्होंने तबले से शुरुआत करने के बाद पहाड़ी वाद्यों में दक्षता प्राप्त की।\n• मंच और संरक्षण का अभाव: आधुनिक समय में पारंपरिक जागर और लोकगीतों के वाद्य यंत्रों को मुख्यधारा के कार्यक्रमों में सीमित स्थान मिलने लगा था। इसी स्थिति को बदलने के लिए उन्होंने नरेंद्र सिंह नेगी जैसे दिग्गजों के साथ मंच साझा कर इन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. रामचरण जुयाल कौन हैं?\nवे उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल निवासी 68 वर्षीय सेवानिवृत्त पीडब्ल्यूडी कर्मचारी और आकाशवाणी के ए ग्रेड लोक कलाकार हैं, जो पारंपरिक वाद्य यंत्रों के संरक्षण में लगे हैं।\n\n2. उन्होंने अपने संगीत सफर की शुरुआत कब और किस विधा से की थी?\nउन्होंने साल 1980 में एक शिक्षार्थी के रूप में तबला वादन से अपनी संगीतमय यात्रा शुरू की थी।\n\n3. वे किन प्रमुख पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बजाते हैं?\nवे मुख्य रूप से उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र हुड़का और विलुप्तप्राय वाद्य यंत्र बिनाई का वादन करते हैं।\n\n4. उन्होंने किन बड़े मंचों और कलाकारों के साथ अपनी प्रस्तुतियां दी हैं?\nवे प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी के दल के साथ दिल्ली, मुंबई सहित मस्कट और ओमान जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुतियां दे चुके हैं।\n\n5. बिनाई वाद्य यंत्र के संरक्षण की आवश्यकता क्यों पड़ी?\nउत्तराखंड की जागर परंपरा में बजने वाली बिनाई आज विलुप्ति की कगार पर है और पूरे राज्य में इसे बजाने वाले केवल गिने-चुने कलाकार ही बचे हैं।\n\n6. रामचरण जुयाल का मुख्य ध्येय क्या है?\nउनका मुख्य उद्देश्य भावी पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना और उत्तराखंड की लुप्त होती संगीत विरासत को जीवित रखना है।\n\nप्रेरणा और सबक\nरामचरण जुयाल का जीवन यह साबित करता है कि सच्ची निष्ठा और निरंतर साधना से किसी भी उम्र में अपनी संस्कृति को नई जिंदगी दी जा सकती है।\n\n• जुनून को समय का बहाना नहीं: सरकारी नौकरी के दायित्वों के बीच भी उन्होंने 1980 से संगीत के अभ्यास को कभी रुकने नहीं दिया। अपनी व्यस्त दिनचर्या में भी कला के लिए नियमित समय निकालकर महारत हासिल की जा सकती है।\n• उम्र केवल एक संख्या: 68 वर्ष की आयु में आरामदायक जीवन चुनने के बजाय उन्होंने संस्कृति सेवा का चुनौतीपूर्ण मार्ग चुना। जीवन के किसी भी पड़ाव पर सामाजिक और सांस्कृतिक संरक्षण के बड़े लक्ष्य तय किए जा सकते हैं।\n• जड़ों से जुड़ाव ही वास्तविक पहचान: आधुनिकता की दौड़ में अपनी पहचान खोने से बचाने के लिए पारंपरिक कलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। जुयाल का समर्पण सिखाता है कि अपनी लोक परंपराओं का आदर करना ही समाज को जीवंत रखता है।\n• सफलता का व्यापक फलक: स्थानीय मंचों से लेकर ओमान और मस्कट तक अपनी प्रस्तुति देकर उन्होंने दिखाया कि प्रामाणिक लोक कला को यदि लगन से साधा जाए तो उसे वैश्विक सम्मान प्राप्त होता है।",
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  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-09-30",
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    "रामचरण जुयाल",
    "उत्तराखंड लोक संस्कृति",
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