उत्तराखंड में 29 साल की सेवा के बाद भी नियमित रोजगार को तरसती पीआरडी जवान निशा असवाल देहरादून में तैनात पीआरडी जवान निशा असवाल 1997 से सेवाएं देने और पति के निधन के बाद अकेले दो बच्चों की परवरिश करने के बावजूद साल में केवल 5 से 6 महीने के काम पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में प्रांतीय रक्षक दल की वर्दी पहनकर मुस्तैदी से अपनी जिम्मेदारी निभाने वाली निशा असवाल का संघर्ष सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को बयां करता है। साल 1997 से सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संभाल रहीं निशा को इस विभाग में लगातार सेवाएं देते हुए 29 साल पूरे हो चुके हैं। वर्ष 2026 तक की इस लंबी सेवा अवधि के बावजूद उनका पद न तो नियमित हो सका है और न ही उन्हें मासिक निश्चित आय की कोई गारंटी मिली है। पूरे साल में केवल पांच से छह महीने ही उन्हें ड्यूटी पर बुलाया जाता है, जबकि शेष छह से सात महीने बिना किसी काम और आमदनी के घर पर ही गुजारने पड़ते हैं। पति के निधन के बाद सिर पर आया दो बच्चों की परवरिश का जिम्मा उत्तरकाशी जिले के पुरोला क्षेत्र की मूल निवासी निशा के जीवन में परेशानियां उस वक्त काफी बढ़ गईं, जब करीब आठ से नौ वर्ष पहले उनके पति का अचानक देहांत हो गया था। परिवार के मुखिया का साया सिर से उठने के बाद घर की पूरी आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारी अकेले निशा के कंधों पर आ गई। उनके सामने अपने दो बच्चों के भरण-पोषण के साथ-साथ उनके सुरक्षित भविष्य को गढ़ने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। निशा बताती हैं कि उनके दोनों बच्चे पढ़ाई-लिखाई में काफी होनहार हैं और उनका सपना है कि वे अपने बच्चों को बेहतरीन स्कूलों में तालीम दिलाएं। हालांकि, अनियमित काम और बिना किसी स्थायी आमदनी के रोजमर्रा के घरेलू खर्च पूरे करना ही भारी पड़ता है, जिसके चलते बच्चों की बेहतर शिक्षा का सपना पूरा करने में लगातार अड़चनें आ रही हैं। साल में सिर्फ पांच से छह महीने की ड्यूटी और अनिश्चित भविष्य निशा असवाल का यह दर्द बताता है कि पहाड़ की अनगिनत महिलाएं किस तरह सालभर नियमित रोजगार की उम्मीद में निरंतर संघर्ष कर रही हैं। वे बताती हैं कि जब साल के आधे समय काम ही नहीं मिलता, तो परिवार का पालन-पोषण कैसे संभव हो सकता है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीआरडी जवानों के मानदेय में वृद्धि करने की घोषणा अवश्य की थी, लेकिन निशा का स्पष्ट कहना है कि यदि जवानों को साल में केवल कुछ ही महीने काम दिया जाएगा तो बढ़ा हुआ मानदेय भी घरेलू बजट को संतुलित नहीं कर सकता। जब तक पूरे 12 महीने रोजगार की गारंटी नहीं होगी, तब तक जवानों के परिवारों की आर्थिक तंगी दूर नहीं हो सकती। भविष्य की वित्तीय सुरक्षा और पक्की तनख्वाह के अभाव में जवानों को हमेशा अनिश्चितता के साए में जीना पड़ रहा है। हजारों पीआरडी जवानों का आक्रोश और संगठन का आंदोलन नियमित रोजगार की यह भीषण समस्या केवल निशा तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड भर के हजारों पीआरडी जवान लंबे समय से इसी प्रकार की मार झेल रहे हैं। विभाग में दशकों तक काम करने के उपरांत भी स्थायी कर्मचारी का दर्जा न मिलने से कर्मियों में गहरा असंतोष व्याप्त है। इसी गंभीर विषय को लेकर प्रांतीय रक्षक दल हित संगठन ने शासन के समक्ष अपनी आवाज उठाई है। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष किशन सिंह रावत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि शासन स्तर से जवानों की न्यायसंगत मांगों पर त्वरित और सकारात्मक फैसला नहीं लिया जाता है, तो राज्य भर के जवान राजधानी देहरादून में महा आक्रोश रैली का आयोजन करेंगे। किशन सिंह रावत ने यह भी स्मरण कराया कि संगठन अपनी मांगों को लेकर एकता विहार में 18 मार्च से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठा था। होमगार्ड की तर्ज पर मूल वेतन और महंगाई भत्ते की प्रमुख मांग प्रांतीय रक्षक दल हित संगठन ने सरकार से मांग की है कि पीआरडी जवानों को होमगार्ड की तर्ज पर मूल वेतन के साथ महंगाई भत्ता प्रदान किया जाए। इसके साथ ही, जवानों की सबसे बुनियादी मांग यह है कि उन्हें वर्षभर यानी पूरे बारह महीने नियमित काम मुहैया कराया जाए। जवानों का कहना है कि पूरे साल रोजगार मिलने से ही वे अपने परिवारों का पालन-पोषण सम्मानजनक तरीके से कर सकेंगे और अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा बिना किसी आर्थिक तंगी के सुनिश्चित कर पाएंगे। वर्तमान में उत्तराखंड के हजारों पीआरडी जवान इस उम्मीद में टकटकी लगाए बैठे हैं कि राज्य सरकार जल्द ही उनके भविष्य को सुरक्षित करने वाला ठोस निर्णय लेगी। इसका आप पर असर यह मामला उत्तराखंड में कार्यरत संविदा और मानदेय आधारित कर्मियों के रोजगार स्थायित्व और आजीविका सुरक्षा से सीधा जुड़ा हुआ है। • उत्तराखंड में: राज्य के हजारों पीआरडी जवानों के परिवारों को साल में केवल पांच से छह महीने ही सीमित मानदेय पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि सरकार वर्षभर ड्यूटी देने और नियमितीकरण की मांग स्वीकार करती है, तो इन परिवारों की आर्थिक अनिश्चितता पूरी तरह समाप्त हो सकेगी। • आंदोलन और प्रशासनिक व्यवस्था: पीआरडी जवानों के संगठन द्वारा देहरादून में महा आक्रोश रैली निकालने की चेतावनी से राजधानी की प्रशासनिक एवं यातायात व्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है। सुरक्षा और यातायात ड्यूटी में तैनात जवानों के विरोध में उतरने से सार्वजनिक सेवाओं के संचालन पर असर पड़ सकता है। • कर्मचारी कल्याण नीति: होमगार्ड की तर्ज पर मूल वेतन और महंगाई भत्ता लागू होने से राज्य सरकार के वित्तीय बजट पर असर पड़ेगा। इससे अन्य विभागों के मानदेय कर्मियों के लिए भी नियमितीकरण की उम्मीदें बढ़ सकती हैं। • शिक्षा और बाल विकास: अल्पकालिक रोजगार की वजह से एकल माताओं और कम आय वाले कर्मियों के बच्चों की उच्च शिक्षा सीधे प्रभावित हो रही है। पक्की आमदनी मिलने पर ही ऐसे परिवार बच्चों को बेहतर संस्थानों में पढ़ाने की स्थिति में आ सकेंगे। ऐसा क्यों हुआ उत्तराखंड में पीआरडी जवानों की आर्थिक बदहाली और आंदोलन की नौबत दशकों पुरानी संविदात्मक व्यवस्था और सीमित कार्य आवंटन के कारण उत्पन्न हुई है। • अस्थायी सेवा नियमावली: प्रांतीय रक्षक दल में जवानों को नियमित कर्मचारी के बजाय आवश्यकता-आधारित स्वयंसेवक के रूप में शामिल किया जाता रहा है। यही कारण है कि 1997 से 29 साल तक सेवा देने के बाद भी निशा असवाल जैसे कर्मियों को स्थायी नियुक्ति या सेवा सुरक्षा नहीं मिल सकी। • सीमित बजट और मौसमी आवंटन: शासन स्तर पर पीआरडी जवानों को पूरे बारह महीने के लिए लगातार ड्यूटी आवंटित करने की स्थायी व्यवस्था नहीं की गई है। इसके चलते जवानों को साल में मात्र पांच से छह महीने काम देकर बाकी समय बिना वेतन छोड़ दिया जाता है। • मानदेय वृद्धि का सीमित प्रभाव: मुख्यमंत्री द्वारा मानदेय बढ़ाए जाने के बावजूद कार्य दिवसों की संख्या न बढ़ने से आय में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आया। कम कार्य दिवसों के कारण जवान अपने बच्चों की पढ़ाई और आवश्यक पारिवारिक खर्च चलाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। • लंबित मांगों पर असंतोष: एकता विहार में 18 मार्च से शुरू हुए धरने के बावजूद समाधान न निकलने से कर्मचारियों में रोष गहराया है। शासन की ओर से ठोस निर्णय न लिए जाने के कारण संगठन ने अब देहरादून में महा आक्रोश रैली की चेतावनी दी है। सवाल-जवाब 1. निशा असवाल कितने वर्षों से पीआरडी में सेवा दे रही हैं? निशा असवाल ने साल 1997 में प्रांतीय रक्षक दल में काम शुरू किया था और वे पिछले 29 वर्षों से लगातार सेवाएं दे रही हैं। 2. निशा असवाल मूल रूप से कहां की रहने वाली हैं? वे उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के पुरोला क्षेत्र की रहने वाली हैं और वर्तमान में देहरादून में तैनात हैं। 3. पीआरडी जवानों को साल में कितने समय काम मिलता है? पीआरडी जवानों को साल में केवल 5 से 6 महीने ही ड्यूटी मिलती है, जबकि बाकी 6 से 7 महीने उन्हें बिना काम के रहना पड़ता है। 4. प्रांतीय रक्षक दल हित संगठन की मुख्य मांगें क्या हैं? संगठन की मांग है कि जवानों को होमगार्ड की तर्ज पर मूल वेतन और महंगाई भत्ता मिले तथा उन्हें सालभर नियमित रोजगार दिया जाए। 5. मांगें पूरी न होने पर संगठन ने क्या कदम उठाने की चेतावनी दी है? संगठन के प्रदेश अध्यक्ष किशन सिंह रावत ने कहा है कि फैसला न होने पर प्रदेशभर के पीआरडी जवान देहरादून में महा आक्रोश रैली निकालेंगे। 6. संगठन ने पूर्व में अनिश्चितकालीन धरना कहां और कब शुरू किया था? संगठन अपनी मांगों को लेकर 18 मार्च से एकता विहार में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठा था। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-29-sala-ki-seva-ke-bada-bhi-niyamita-rojagara-ko-tarasati-prd-javana-nisha-oswal-55606 TrendKia — Har trend, sabse pehle.