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  "type": "article",
  "title": "उत्तराखंड में बाबा नीम करौरी के कैंची धाम से बहती पवित्र शिप्रा को कागजों में मिला सिर्फ बरसाती नाले का दर्जा",
  "summary": "नैनीताल के कैंची धाम से बहने वाली पवित्र उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में महज एक बरसाती नाला यानी रौली के रूप में दर्ज है, जबकि अब भवाली के सीवर से इसे बचाने के लिए 9.26 करोड़ रुपये की योजना तैयार की गई है।",
  "content": "उत्तराखंड के नैनीताल जिले की हसीन वादियों में स्थित बाबा नीम करौरी का कैंची आश्रम देश और दुनिया भर में अपनी आध्यात्मिक आभा और प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात है। इस पावन आश्रम परिसर के ठीक पास से होकर एक प्राकृतिक जलधारा बहती है, जिसे स्थानीय लोग और देश-विदेश से आने वाले भक्त शिप्रा नदी के नाम से पुकारते हैं। चारों तरफ घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों के बीच से गुजरने वाली यह नदी हर मौसम में अविरल बहती रहती है। भौगोलिक और धार्मिक दृष्टि से यह एक उत्तरवाहिनी जलधारा है, जिसका अर्थ है कि इसका प्राकृतिक प्रवाह उत्तर दिशा की ओर है। साधारण पहाड़ी जलस्रोत जैसी दिखने के बावजूद इस नदी से श्रद्धालुओं की अगाध आस्था जुड़ी हुई है, और कैंची धाम पहुंचने वाले भक्त इसे बाबा नीम करौरी की अपनी नदी मानकर इसके पावन जल में डुबकी लगाते हैं।\n\nनैनीताल के जंगलों से कोसी तक का भौगोलिक सफर\nभौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो शिप्रा नदी नैनीताल जनपद के पर्वतीय भूभाग में प्रवाहित होने वाला एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक जलस्रोत है। यह जलधारा कैंची धाम आश्रम के बिल्कुल करीब से कल-कल करती हुई आगे बढ़ती है और खैरना के समीप पहुंचकर प्रसिद्ध कोसी नदी में समाहित हो जाती है। विशेष रूप से कैंची क्षेत्र में इस नदी का स्वरूप अत्यंत मनोहारी और सुरम्य दिखाई देता है। यहां एक किनारे पर हरे-भरे पहाड़ और सघन जंगल खड़े हैं, तो दूसरी तरफ नदी तट पर बाबा नीम करौरी का भव्य आश्रम और मंदिर परिसर फैला हुआ है, जो इस पूरे परिदृश्य को एक शांत और आध्यात्मिक रूप प्रदान करता है।\n\nनागरिक प्रयासों से फिर जी उठा नदी का मूल स्वरूप\nबीते दौर में सरकारी तंत्र और स्थानीय प्रशासन की निरंतर उपेक्षा के चलते यह सदानीरा जलधारा अपने मूल अस्तित्व को खोने लगी थी। शिप्रा कल्याण समिति का गठन कर इस नदी के पुनरुद्धार की मुहिम में लंबे समय से जुटे जगदीश नेगी के अनुसार, इस नदी का उद्गम स्थल घोड़ाखाल और गागर के पर्वतीय जंगलों में मौजूद है। पूर्व में इस क्षेत्र में हुए पेड़ों के अंधाधुंध और अवैध कटान के कारण जलस्रोतों पर गंभीर असर पड़ा था और यह नदी लगभग सूखने की कगार पर पहुंच गई थी। जलधारा को मरते देख स्थानीय स्तर पर इसे बचाने का संकल्प लिया गया।\n\nस्थानीय नागरिकों के लगातार प्रयासों से नदी के उद्गम क्षेत्र के आसपास व्यापक सफाई अभियान चलाए गए। इसके साथ ही इलाके में बांज और बुरांश के पुराने कटे हुए वृक्षों के संरक्षण और नई हरियाली पनपने से प्राकृतिक जलस्रोतों में जल स्तर काफी बढ़ गया। इन सामूहिक कोशिशों का ही सुखद परिणाम है कि अब उद्गम से ही शिप्रा में साल भर पानी का सतत प्रवाह देखा जा रहा है। हालांकि, जगदीश नेगी का स्पष्ट कहना है कि नदी के जीवन को हमेशा बनाए रखने के लिए अब भी बेहद कड़े और ठोस कदमों की जरूरत है, विशेष रूप से भवाली नगर से निकलने वाले गंदे पानी और कचरे को नदी में जाने से पूरी तरह रोकना अनिवार्य है।\n\nसरकारी दस्तावेजों में महज रौली और सीवर का बढ़ता संकट\nश्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए भले ही यह एक आदरणीय नदी हो, लेकिन सरकारी दस्तावेजों की हकीकत बेहद चौंकाने वाली है। सरकारी राजस्व विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड में इस सदानीरा नदी को किसी नदी का दर्जा नहीं मिला है, बल्कि इसे केवल रौली यानी एक छोटा बरसाती नाला दर्ज किया गया है। भवाली नगर पालिका के ईओ सुधीर कुमार ने खुद इस तथ्य की पुष्टि करते हुए बताया है कि राजस्व अभिलेखों में दर्ज जानकारी के अनुसार इसे रौली ही माना गया है।\n\nदुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस जलधारा को भक्त पूजनीय मानते हैं, उसमें भवाली शहर के आवासीय इलाकों से निकलने वाला सीवर का गंदा पानी खुलेआम बहाया जा रहा है। नदी में गिरती इस गंदगी से पर्यावरण और आस्था दोनों को ठेस पहुंच रही है। इस गंभीर समस्या के स्थायी समाधान के लिए अब नगर पालिका प्रशासन सक्रिय हुआ है। ईओ सुधीर कुमार के मुताबिक, भवाली शहर के घरों से निकलने वाले पूरे सीवर के वैज्ञानिक ट्रीटमेंट के लिए 9 करोड़ 26 लाख रुपये की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) जल निगम के माध्यम से उत्तराखंड राज्य सरकार को भेजी गई है।\n\nप्रशासनिक अधिकारियों को उम्मीद है कि शासन से इस परियोजना को जल्द ही वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृति मिल जाएगी। सरकारी मंजूरी मिलते ही सीवर शोधन संयंत्र और सीवेज नेटवर्क से जुड़ा जमीनी कार्य शुरू हो जाएगा, जिससे आने वाले कुछ वर्षों में नदी में गिरने वाली गंदगी पर पूरी तरह रोक लग सकेगी और शिप्रा अपने स्वच्छ और निर्मल रूप में लौट सकेगी। वहीं, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष संजय वर्मा का भी कहना है कि राज्य सरकार शिप्रा के मूल प्राकृतिक स्वरूप को संरक्षित करने की दिशा में पूरी गंभीरता से कदम उठा रही है।\n\nजब भंडारे में नदी का पानी घी में बदल गया\nकैंची धाम और बाबा नीम करौरी के इतिहास का हर पन्ना शिप्रा नदी के उल्लेख के बिना अधूरा समझा जाता है। स्थानीय मान्यताओं और पारंपरिक आख्यानों के मुताबिक, बाबा नीम करौरी महाराज का इस पूरे क्षेत्र के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध रहा। इसी पहाड़ी भूभाग में प्रख्यात संत सोमवारी बाबा की प्राचीन धूनी और साधना गुफा होने का भी ऐतिहासिक विवरण मिलता है। बाबा नीम करौरी का इस शांत वातावरण में निरंतर आवागमन रहता था और उनके आशीर्वाद से ही कालांतर में यहां भव्य हनुमान मंदिर और कैंची आश्रम की नींव रखी गई।\n\nइस पावन नदी के संदर्भ में एक अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय लोककथा श्रद्धालुओं के बीच श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है। मान्यता के अनुसार, बीते समय में कैंची धाम में एक विशाल धार्मिक भंडारे का आयोजन चल रहा था, जिसमें दूर-दराज के क्षेत्रों से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हुए थे। भंडारे के दौरान अचानक आश्रम की रसोई में पूरियां तलने के लिए घी समाप्त हो गया। जब इस संकट की सूचना सेवकों ने बाबा नीम करौरी महाराज तक पहुंचाई, तो उन्होंने पास ही बह रही शिप्रा नदी से कनस्तरों में पानी भरकर लाने का निर्देश दिया। श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है कि बाबा के अलौकिक आशीर्वाद से नदी का वह साधारण जल शुद्ध घी में तब्दील हो गया और बिना किसी रुकावट के विशाल भंडारे की व्यवस्था पूरी हुई। यद्यपि इस घटना के कोई वैज्ञानिक आधार या प्रमाण मौजूद नहीं हैं, फिर भी यह कथा भक्तों के हृदय में नदी के प्रति असीम आस्था का संचार करती है।\n\nस्कंद पुराण की परंपरा और संरक्षण की तत्काल दरकार\nधार्मिक और पौराणिक परंपराओं में शिप्रा नदी का उत्तर दिशा की ओर बहना इसे अत्यंत विशिष्ट और पुण्यदायी बनाता है। सनातन संस्कृति में उत्तरवाहिनी नदियों को विशेष देवतुल्य आदर दिया जाता है और उनके तटों पर साधना व स्नान का असाधारण फल माना गया है। इसी कारण कैंची धाम आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए शिप्रा का यह अद्वितीय प्रवाह आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र बना रहता है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न धार्मिक स्रोतों में इस पर्वतीय नदी का संबंध स्कंद पुराण के मानसखंड में वर्णित आख्यानों से भी जोड़ा जाता है।\n\nवर्तमान समय में देश-विदेश में कैंची धाम की ख्याति बहुत तेजी से बढ़ रही है, जिसके चलते हर दिन हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। जैसे-जैसे आश्रम में आने वाले भक्तों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है, वैसे-वैसे शिप्रा नदी की स्वच्छता, उसके किनारों की शुद्धि और उसके प्राकृतिक प्रवाह को अक्षुण्ण बनाए रखने की जरूरत और भी गंभीर हो गई है। श्रद्धालु अब इसे बाबा नीम करौरी की पावन स्मृति से जोड़कर देखते हैं और मनोकामनाओं की पूर्ति व कष्टों से मुक्ति की आशा लेकर इसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करते हैं, ऐसे में नदी को प्रदूषण मुक्त रखना शासन और समाज दोनों की साझी जिम्मेदारी बन चुका है।\n\nइसका आप पर असर\nकैंची धाम में शिप्रा नदी की वर्तमान स्थिति और सीवर ट्रीटमेंट योजना का सीधा असर वहां आने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: देश भर से कैंची धाम पहुंचने वाले लाखों श्रद्धालुओं को भविष्य में स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त जल में स्नान करने का अवसर मिलेगा। जब सीवर शोधन योजना पूरी हो जाएगी, तब नदी में बीमारियों का जोखिम खत्म होगा और तीर्थयात्रियों की धार्मिक भावनाएं सुरक्षित रहेंगी।\n• नैनीताल में: भवाली और कैंची क्षेत्र के निवासियों को खुले में बहने वाले सीवर और बदबू की समस्या से स्थायी छुटकारा मिलेगा। 9 करोड़ 26 लाख रुपये की सीवर परियोजना लागू होने से स्थानीय पर्यावरण शुद्ध रहेगा और पहाड़ी जलस्रोतों का भूजल दूषित होने से बचेगा।\n• स्थानीय पर्यावरण: घोड़ाखाल और गागर के जंगलों में बांज-बुरांश के पेड़ों का दायरा बढ़ने से क्षेत्रीय पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा। जल स्रोतों के पुनर्जीवित होने से गर्मियों के मौसम में भी घाटी में पानी का संकट गहराने का अंदेशा कम रहेगा।\n• प्रशासनिक व्यवस्था: राजस्व विभाग द्वारा नदी को मात्र नाला दर्ज किए जाने के मामले में बदलाव की मांग जोर पकड़ेगी। आधिकारिक नदी का दर्जा मिलने पर भविष्य में इसके संरक्षण के लिए अतिरिक्त सरकारी बजट और कानूनी सुरक्षा हासिल हो सकेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nशिप्रा नदी के सूखने और प्रदूषित होने की मुख्य वजह जंगलों का अंधाधुंध कटान और अनियोजित शहरीकरण रहा, जबकि राजस्व अभिलेखों में पुराने वर्गीकरण के चलते इसे अपेक्षित प्रशासनिक सुरक्षा नहीं मिल सकी।\n\n• उद्गम पर पेड़ों का कटान: घोड़ाखाल और गागर के घने जंगलों में पूर्व में हुए बांज और बुरांश के पेड़ों के अवैध कटान ने प्राकृतिक जलस्रोतों को सुखा दिया था। वनों के घटने से वर्षा जल जमीन में समाने के बजाय सीधे बह गया, जिससे सदानीरा नदी सूखने की कगार पर पहुंच गई।\n• शहरी सीवर का सीधा निकास: पहाड़ी कस्बे भवाली में व्यवस्थित ड्रेनेज और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट न होने से घरेलू सीवर सीधे नदी में गिरने लगा। बढ़ती आबादी और पर्यटकों की आवाजाही के कारण घरों का गंदा पानी खुलेआम शिप्रा में छोड़ा जाता रहा।\n• पुराने राजस्व अभिलेख: ब्रिटिश काल या पुराने बंदोबस्त के समय से ही राजस्व दस्तावेजों में इस जलधारा को नदी के बजाय 'रौली' यानी मौसमी बरसाती नाला दर्ज किया गया था। इस तकनीकी वर्गीकरण के कारण इस जलस्रोत को औपचारिक नदी संरक्षण अधिनियमों के तहत प्राथमिकता नहीं मिल पाई।\n• जनजागरूकता और सुधारात्मक कदम: स्थानीय नागरिकों द्वारा शिप्रा कल्याण समिति बनाकर उद्गम की सफाई करने से नदी का प्रवाह तो लौट आया, पर सीवर रोकने के लिए 9.26 करोड़ रुपये की डीपीआर बनाकर शासन को भेजी गई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. शिप्रा नदी का उद्गम स्थल कहां है और यह किस नदी में मिलती है?\nशिप्रा नदी नैनीताल के घोड़ाखाल और गागर के जंगलों से निकलती है और खैरना के पास जाकर कोसी नदी में समाहित हो जाती है।\n\n2. सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में शिप्रा नदी को क्या दर्जा दिया गया है?\nसरकारी राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में शिप्रा नदी को एक औपचारिक नदी नहीं, बल्कि रौली यानी छोटा बरसाती नाला दर्ज किया गया है।\n\n3. भवाली नगर पालिका ने नदी में सीवर रोकने के लिए क्या कदम उठाया है?\nनगर पालिका ने भवाली के घरों से निकलने वाले सीवर के ट्रीटमेंट के लिए 9 करोड़ 26 लाख रुपये की डीपीआर जल निगम के जरिए राज्य सरकार को भेजी है।\n\n4. शिप्रा नदी को पुनर्जीवित करने में स्थानीय नागरिकों का क्या योगदान रहा?\nजगदीश नेगी की शिप्रा कल्याण समिति ने उद्गम पर सफाई की और बांज-बुरांश के पेड़ों के संरक्षण से नदी में साल भर पानी का प्रवाह लौटाया।\n\n5. बाबा नीम करौरी और शिप्रा नदी से जुड़ी कौन सी लोककथा प्रसिद्ध है?\nलोकमान्यता है कि आश्रम के एक भंडारे में जब पूरियां तलने के लिए घी कम पड़ गया था, तब बाबा नीम करौरी के आशीर्वाद से शिप्रा नदी का पानी घी में बदल गया था।\n\n6. धार्मिक दृष्टि से इस नदी के प्रवाह को विशेष क्यों माना जाता है?\nकैंची क्षेत्र में शिप्रा नदी उत्तर दिशा की ओर बहती है, और सनातन धार्मिक परंपरा में उत्तरवाहिनी नदियों को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व वाला माना जाता है।",
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  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-10-08",
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