उत्तराखंड में बढ़ी ठंड तो सांस के मरीजों की बढ़ी परेशानी, नैनीताल के डॉक्टर ने बताए बचाव के उपाय नैनीताल में ठंड बढ़ने के साथ ही अस्थमा और सांस संबंधी समस्याओं के मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। अस्पताल के विशेषज्ञ ने मरीजों को ठंड में खास सावधानी बरतने की सलाह दी है। उत्तराखंड के नैनीताल में मौसम में बदलाव के साथ ही तापमान में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है, जिसका सीधा असर अब स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। सुबह और शाम के समय बढ़ती हुई ठंड के कारण सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। खासकर अस्थमा से पीड़ित लोगों को इस ठंडे मौसम में सांस लेने में खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय चिकित्सा इकाइयों में ऐसे मरीजों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे स्वास्थ्य चिंताएं भी गहरी होती जा रही हैं। बीडी पांडे जिला अस्पताल में उमड़ रही मरीजों की भीड़ नैनीताल के प्रसिद्ध बीडी पांडे जिला अस्पताल में इन दिनों सांस की विभिन्न समस्याओं से पीड़ित मरीज उपचार के लिए बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। अस्पताल के चेस्ट फिजिशियन डॉ. अभिषेक गुप्ता के अनुसार, मौजूदा समय में रोजाना ओपीडी में 60 से 70 मरीज स्वास्थ्य लाभ के लिए आ रहे हैं। इनमें से करीब 25 से 30 मरीज अकेले अस्थमा की गंभीर समस्या से जूझ रहे होते हैं। इस स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने मौसम के इस बदलाव के दौर में सभी संबंधित रोगियों को विशेष एहतियात बरतने की कड़ी हिदायत दी है। ठंड हवाओं से श्वसन नलियों में होती है सिकुड़न विशेषज्ञों का मानना है कि सर्दियों की आहट के साथ ही श्वसन तंत्र से जुड़ी परेशानियां तेजी से उभरने लगती हैं। तापमान में गिरावट आने और सीधे ठंडी हवा के संपर्क में आने से कई मरीजों की श्वास नली में सूजन और संकुचन जैसी दिक्कतें बढ़ जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप पीड़ित व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई, लगातार खांसी, सीने में जकड़न और सांस लेते समय घरघराहट जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिन लोगों को पहले से ही यह पुरानी बीमारी है, उनके लिए यह मौसम अत्यधिक सतर्कता की मांग करता है। दवाओं और इनहेलर का रखें नियमित ध्यान चिकित्सकों का कहना है कि अस्थमा एक ऐसी स्थिति है जिसमें श्वसन मार्ग में सूजन पैदा होने से हवा का आवागमन बाधित होता है। हालांकि इसे हमेशा जड़ से समाप्त करना संभव नहीं होता, लेकिन उचित चिकित्सा और नियमित देखभाल के जरिए इसे पूरी तरह नियंत्रण में रखा जा सकता है। मरीजों को सख्त सलाह दी जाती है कि वे बिना चिकित्सक की पूर्व सलाह के अपनी कोई भी निर्धारित दवा या इनहेलर का इस्तेमाल बंद न करें। लक्षण थोड़े कम होते ही दवा छोड़ देना भविष्य में भारी पड़ सकता है। बचाव के लिए अपनाएं ये जरूरी सावधानियां सर्दियों के इस मौसम में अस्थमा रोगियों को अपनी दिनचर्या में कुछ बुनियादी बदलाव करने की आवश्यकता होती है। जब सुबह और शाम के वक्त तापमान काफी गिर जाता है, तब ठंडी हवा के सीधे संपर्क में आने से बचना चाहिए। घर से बाहर निकलते समय अपने मुंह और नाक को किसी साफ स्कार्फ या मास्क से अच्छी तरह ढक कर रखना चाहिए। इसके अलावा धूल, धुएं तथा अन्य प्रदूषण फैलाने वाले कारकों से भी उचित दूरी बनाकर रखनी चाहिए ताकि सांस लेने में किसी प्रकार की अतिरिक्त बाधा उत्पन्न न हो। बच्चों में भी नजर आ सकते हैं शुरुआती लक्षण यह समस्या केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है बल्कि 14 से 15 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों में भी अस्थमा के शुरुआती लक्षण देखने को मिल सकते हैं। यदि किसी बच्चे को बार-बार खांसी की शिकायत रहती है, खेलकूद या दौड़भाग करते समय जल्दी सांस फूलने लगती है या फिर रात के समय सांस लेने में तकलीफ होती है, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि ये संकेत अन्य संक्रमणों के भी हो सकते हैं, इसलिए सटीक कारण का पता लगाने के लिए समय पर चिकित्सकीय परीक्षण कराना बेहद आवश्यक माना जाता है। इसका आप पर असर बढ़ती ठंड के दौर में सांस और अस्थमा के मरीजों को अपनी सेहत को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। • राष्ट्रीय स्तर पर: देशभर में सर्दियों की शुरुआत के साथ ही ठंडी हवाओं के कारण सांस के रोगियों की परेशानियां बढ़ जाती हैं, इसलिए सभी संवेदनशील लोगों को सुबह और शाम के वक्त बाहर निकलते समय सुरक्षात्मक उपाय अपनाने चाहिए। • नैनीताल में: नैनीताल के स्थानीय निवासियों और पर्यटकों को गिरते तापमान के बीच श्वसन नलियों में संकुचन से बचने के लिए अपने चेहरे और नाक को ढककर रखना चाहिए तथा किसी भी समस्या पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। ऐसा क्यों हुआ ठंड के मौसम में तापमान गिरने और ठंडी हवाओं के प्रभाव से श्वसन तंत्र पर प्रतिकूल असर पड़ता है, जिससे अस्थमा के मरीजों की मुश्किलें बढ़ती हैं। • तापमान में गिरावट: सर्दियों की शुरुआत के साथ ठंडी हवा के सीधे संपर्क में आने से श्वसन नलियों में सूजन और सिकुड़न बढ़ जाती है। • मौसम का बदलाव: वातावरण में अचानक बदलाव होने के कारण अस्थमा और सांस संबंधी पुरानी बीमारियां अधिक सक्रिय हो जाती हैं। • पर्यावरणीय कारक: इस मौसम में हवा में मौजूद धूल, धुएं और अन्य कणों के कारण सांस लेने में दिक्कतें और अधिक गंभीर हो जाती हैं। सवाल-जवाब 1. नैनीताल के किस अस्पताल में सांस के मरीज उपचार के लिए पहुंच रहे हैं? नैनीताल के बीडी पांडे जिला अस्पताल में सांस संबंधी समस्याओं से पीड़ित मरीज उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। 2. ओपीडी में रोजाना कितने मरीज सांस की समस्या लेकर आ रहे हैं? बीडी पांडे जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना 60 से 70 मरीज सांस संबंधी समस्याओं के उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। 3. दैनिक ओपीडी में कितने मरीज अस्थमा से पीड़ित बताए गए हैं? इन 60 से 70 मरीजों में से 25 से 30 मरीज अस्थमा की बीमारी से पीड़ित होते हैं। 4. नैनीताल अस्पताल के चेस्ट फिजिशियन का क्या नाम है? अस्पताल के चेस्ट फिजिशियन डॉ. अभिषेक गुप्ता हैं। 5. कितनी उम्र के बच्चों में अस्थमा के शुरुआती लक्षण दिख सकते हैं? 14 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों में भी अस्थमा के शुरुआती लक्षण दिखाई दे सकते हैं। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-barhi-thnda-to-sansa-ke-marijon-ki-barhi-pareshani-nainital-ke-doktara-ne-batae-bachava-ke-upaya-48640 TrendKia — Har trend, sabse pehle.