उत्तराखंड में चार दशक सेवा के बाद भी अल्प मानदेय, देहरादून में संविदा कर्मियों ने खोला मोर्चा देहरादून में जल संस्थान, विद्युत और वन विभाग के आउटसोर्स कर्मियों ने अल्प मानदेय और नियमितीकरण की मांग को लेकर धरना दिया। कई कर्मी दशकों की जोखिम भरी सेवा के बाद भी मामूली पगार और सामाजिक सुरक्षा के अभाव में जीवन यापन कर रहे हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में विभिन्न सरकारी विभागों के संविदा और आउटसोर्स कर्मचारी अपनी लंबित मांगों को लेकर आंदोलन की राह पर हैं। वन विभाग, जल संस्थान और विद्युत निगम जैसे अनिवार्य व संवेदनशील विभागों में 20 से लेकर 40 वर्षों तक लगातार सेवाएं देने के बावजूद इन कर्मचारियों को आज तक न तो नियमित किया गया है और न ही सम्मानजनक पारिश्रमिक दिया जा रहा है। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव और सेवानिवृत्ति की दहलीज पर खड़े ये कामगार अब शासन-प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहे हैं। दुर्गम पहाड़ों में जोखिम भरी ड्यूटी और नाममात्र की पगार पर्वतीय राज्य की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में ये कर्मचारी बेहद चुनौतीपूर्ण माहौल में काम करते आए हैं। वन क्षेत्रों में हिंसक वन्यजीवों के साए में गश्त करना हो, विद्युत आपूर्ति बहाल रखने के लिए हाई-वोल्टेज तारों पर जान जोखिम में डालकर चढ़ना हो या फिर बारिश के मौसम में उफनती नदियों और बरसाती गदेरों को लांघकर पेयजल लाइनें दुरुस्त करना हो, इन कर्मचारियों ने निरंतर जनता तक जरूरी सेवाएं पहुंचाई हैं। इसके बाद भी दशकों की निष्ठापूर्ण सेवा के बदले इन्हें सामाजिक सुरक्षा या भविष्य निधि जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मयस्सर नहीं हो सकी हैं। चार दशक की नौकरी और महज 4500 रुपये मानदेय धरने में शामिल कर्मचारियों ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि कैसे पूरी जिंदगी खपा देने के बाद भी उनके हाथ खाली हैं। उत्तरकाशी जिले के सुदूर ग्रामीण इलाके से आए मंगल लाल ने बताया कि वह वर्ष 1986 से जल संस्थान में कार्यरत हैं। सेवा की शुरुआत में उन्हें 100 रुपये मासिक मिलते थे, जो 40 वर्षों के लंबे सेवाकाल के बाद अब जाकर मात्र 4500 रुपये तक पहुंचे हैं। मंगल लाल के अनुसार, प्रत्येक मौसम में उन्हें पानी की पाइपलाइनें ठीक करने के लिए 25-25 किलोमीटर पैदल नापना पड़ता है। बरसात के समय जब जल स्रोत उफान पर होते हैं और पाइपलाइनें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तब वे जान हथेली पर रखकर काम करते हैं। अब 60 वर्ष की आयु के करीब पहुंच चुके मंगल लाल का कहना है कि बढ़ती उम्र में दूसरा काम करना संभव नहीं है और इतनी अल्प आय में घर चलाना नामुमकिन हो गया है। जंगलों की आग और हाथियों के बीच काम, सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं वन विभाग के राजाजी नेशनल पार्क क्षेत्र में तैनात प्रदीप सिंह ने बताया कि वे हर समय जंगली जानवरों के खतरे के बीच अपनी ड्यूटी निभाते हैं। वनाग्नि की घटनाएं हों या आबादी की तरफ बढ़ रहे हाथियों के झुंड को जंगल की ओर खदेड़ना, वन कर्मी हर जोखिम सीधे तौर पर उठाते हैं। उन्होंने दुख जताया कि ड्यूटी के दौरान किसी अनहोनी या हादसे का शिकार होने पर भी विभाग या सरकार से कोई ठोस आर्थिक मदद नहीं मिलती, जिससे पीड़ित कर्मचारी के परिवार के आगे भरण-पोषण का संकट खड़ा हो जाता है। वर्तमान में मिल रहे 8-10 हजार रुपये के मासिक वेतन में आटा, चावल और खाद्य तेल जैसी आवश्यक वस्तुएं जुटाना भी उनके लिए भारी पड़ रहा है। दिहाड़ी मजदूर से भी कम आय और महीनों अटका वेतन रुद्रप्रयाग के केदार घाटी क्षेत्र से आए सूरज भंडारी ने विद्युत लाइनों की देखरेख से जुड़ी गंभीर स्थिति सामने रखी। उन्होंने बताया कि उन पर 25,18 किलोमीटर लंबी बिजली लाइनों के रखरखाव की जिम्मेदारी है, जिसके एवज में उन्हें केवल 3500 रुपये मासिक मानदेय दिया जाता है। उन्होंने रेखांकित किया कि यह रकम प्रतिदिन लगभग 120 रुपये बैठती है, जो एक सामान्य अकुशल मजदूर की न्यूनतम दिहाड़ी से भी काफी कम है। विडंबना यह भी है कि यह मामूली रकम भी नियमित रूप से नहीं मिलती और कई बार पांच-पांच महीने तक भुगतान अटका रहता है। जोखिम भरे कार्यों में भी पीएफ और ईएसआई का अभाव बिजली विभाग से जुड़े पान सिंह ने बताया कि फील्ड में जान जोखिम में डालने वाले लाइनमैन को करीब 8000 रुपये वेतन मिलता है। उन्होंने चिंता जताई कि खतरनाक प्रकृति का कार्य होने के बावजूद कर्मचारियों का भविष्य पूरी तरह असुरक्षित है, क्योंकि उन्हें ईएसआई और पीएफ जैसी अनिवार्य सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। उन्होंने वर्ष 2022 का उदाहरण देते हुए बताया कि उस दौरान उनके एक साथी लाइनमैन को गंभीर विद्युत करंट लगा था, जिसके बाद पूरे परिवार पर गहरा संकट आ गया था। कर्मचारियों की स्पष्ट मांग है कि ड्यूटी के दौरान सुरक्षा के लिए जरूरी दस्ताने और आधुनिक उपकरण दिए जाएं तथा पारिश्रमिक में बढ़ोतरी की जाए। प्रशासनिक उपेक्षा और नियमितीकरण की मांग प्रदर्शन में शामिल श्याम सिंह ने आज की कमरतोड़ महंगाई के दौर में 10 से 12 हजार रुपये के वेतन पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों और विधायकों को तमाम भत्ते, महंगाई भत्ता और पेंशन की सुविधाएं हासिल हैं, जबकि जमीनी स्तर पर सेवा देने वाले कर्मियों की अनदेखी हो रही है। कर्मचारियों का कहना है कि वे कई बार शासन और प्रशासन को लिखित रूप से अपनी समस्याओं से अवगत करा चुके हैं, किंतु अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला। कर्मियों का कहना है कि सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए तत्काल प्रभाव से वेतन वृद्धि और सेवा नियमितीकरण के न्यायसंगत कदम उठाने चाहिए। इसका आप पर असर इस विरोध प्रदर्शन से उत्तराखंड में आवश्यक जनसुविधाओं के संचालन और संविदा कर्मचारियों के कार्यबल पर सीधा प्रभाव पड़ने के संकेत हैं। • उत्तराखंड में जनसेवाएं: बिजली, पानी और वन संरक्षण जैसे संवेदनशील विभागों के कर्मचारियों के आंदोलनरत होने से ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में खराबी दुरुस्त करने की गति प्रभावित हो सकती है। उपभोक्ताओं को बिजली फॉल्ट या पाइपलाइन फटने की स्थिति में बहाली के लिए अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। • संविदा व आउटसोर्स कामगार: आंदोलन से मानदेय संशोधन, पीएफ तथा ईएसआई जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा नीतियों पर प्रशासनिक दबाव बन सकता है। यदि मांगों पर सकारात्मक निर्णय होता है तो दशकों से कार्यरत हजारों अल्पवेतनभोगी कर्मियों को आर्थिक संबल मिलेगा। • सुरक्षा उपकरण व दिशानिर्देश: विद्युत लाइनों पर कार्य करने वाले कार्मिकों के लिए सुरक्षा दस्ताने और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने की मांग से कार्यस्थल सुरक्षा मानकों में सुधार हो सकता है। इससे फील्ड कर्मचारियों के जानलेवा हादसों के जोखिम में कमी आ सकती है। • न्यूनतम मजदूरी नियम: 120 रुपये प्रतिदिन जैसे निम्न मानदेय के मामलों से राज्य में न्यूनतम मजदूरी प्रावधानों के अनुपालन पर चर्चा तेज हो सकती है। श्रम विभाग द्वारा आउटसोर्सिंग एजेंसियों और विभागों की समीक्षा किए जाने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा क्यों हुआ यह धरना प्रदर्शन कर्मचारियों के दशकों लंबे आर्थिक शोषण, खतरनाक परिस्थितियों में काम करने के बावजूद सामाजिक सुरक्षा के अभाव और बार-बार ज्ञापन देने पर भी प्रशासन द्वारा कोई समाधान न निकालने के कारण उपजा है। • अत्यधिक अल्प मानदेय: चार दशक तक काम करने के बाद भी कर्मचारियों को केवल 3500 से 4500 रुपये प्रतिमाह दिए जा रहे हैं, जो प्रति दिन लगभग 120 रुपये बैठता है। वर्तमान मुद्रास्फीति में इस पगार पर परिवार चलाना असंभव होने के कारण कर्मचारी सड़कों पर उतरे। • अनियमित वेतन भुगतान: सूरज भंडारी जैसे कर्मियों के अनुसार अल्प मानदेय का भुगतान भी कई बार पांच-पांच महीने तक अटका रहता है। नियमित आमदनी न मिलने से बुनियादी जरूरतों को पूरा करना संकट बन जाता है। • सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा की कमी: बिजली के नंगे तारों और हिंसक जानवरों के बीच काम करने के बावजूद कर्मचारियों को ईएसआई, पीएफ या दुर्घटना बीमा की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई है। सुरक्षा दस्तानों की अनुपस्थिति के कारण हादसों में कर्मचारी और उनके परिवार निराश्रित हो जाते हैं। • प्रशासनिक संवादहीनता: श्याम सिंह के अनुसार कर्मचारियों ने अपनी समस्याओं को लेकर कई बार प्रशासन को लिखित पत्र भेजे, किंतु कोई ठोस हल नहीं निकला। लगातार उपेक्षा के बाद कर्मचारियों ने देहरादून में सामूहिक धरना शुरू करने का निर्णय लिया। सवाल-जवाब 1. देहरादून में किन विभागों के कर्मचारी धरना दे रहे हैं? वन विभाग, जल संस्थान और विद्युत विभाग में कार्यरत आउटसोर्स और संविदा कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर देहरादून में प्रदर्शन कर रहे हैं। 2. जल संस्थान के कर्मचारी मंगल लाल को कितना वेतन मिल रहा है? मंगल लाल वर्ष 1986 से जल संस्थान में कार्यरत हैं और 40 वर्ष की सेवा के बाद भी उन्हें मात्र 4500 रुपये मासिक मानदेय मिल रहा है। 3. केदार घाटी के सूरज भंडारी का दैनिक मानदेय कितना बैठता है? सूरज भंडारी को 25,18 किलोमीटर लंबी बिजली लाइन संभालने के लिए 3500 रुपये मासिक मिलते हैं, जो लगभग 120 रुपये प्रतिदिन बैठता है। 4. बिजली विभाग के कर्मचारियों की मुख्य सुरक्षा मांगें क्या हैं? कर्मचारी सुरक्षा के लिए जरूरी दस्ताने और उपकरण उपलब्ध कराने के साथ-साथ ईएसआई और पीएफ जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। 5. वन विभाग के कर्मचारियों को किन जोखिमों का सामना करना पड़ता है? राजाजी नेशनल पार्क क्षेत्र में तैनात कर्मचारी जंगली जानवरों, हाथियों के झुंड को खदेड़ने और वनाग्नि की घटनाओं के बीच बिना किसी सुरक्षा कवर के ड्यूटी करते हैं। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-chara-dashaka-seva-ke-bada-bhi-alpa-manadeya-dehradun-men-snvida-karmiyon-ne-khola-morcha-44818 TrendKia — Har trend, sabse pehle.