# उत्तराखंड में जमीन डोलने से आधा मिनट पहले सायरन बजाकर अलर्ट कर रहा भू देव ऐप

> आईआईटी रुड़की और राज्य सरकार द्वारा तैयार भू देव ऐप ने चमोली के 4.9 तीव्रता वाले भूकंप में लोगों को झटके आने से 20 से 30 सेकंड पहले सतर्क कर सुरक्षित निकलने का मौका दिया।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-jamina-dolane-se-adha-minata-pahale-sayarana-bajakara-alarta-kara-raha-bhu-dev-aipa-44964 · **Language:** Hindi
**Tags:** उत्तराखंड भूकंप, भू देव ऐप, आईआईटी रुड़की, चमोली भूकंप, भूकंप अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, थराली, हिमालयी टेक्टोनिक्स

हिमालयी राज्य उत्तराखंड में भूगर्भीय हलचल के बीच तकनीक अब आपदा से निपटने में ढाल बनकर सामने आ रही है। हाल ही में 6 अक्टूबर को चमोली जिले के थराली इलाके में 4.9 तीव्रता का जब तेज भूकंप दर्ज किया गया, तो वहां के निवासियों को तेज झटके महसूस होने से करीब 20 से 30 सेकंड पहले ही चेतावनी मिल गई। समय रहते मिले इस पूर्व संकेत ने लोगों को इमारतों से निकलकर खुली जगहों पर जाने की बहुमूल्य मोहलत दी, जिससे भारी खतरे को टाला जा सका। यह त्वरित चेतावनी प्रणाली मोबाइल पर काम करने वाले 'भू देव ऐप' के जरिए संभव हो पाई है।

## आईआईटी रुड़की और सरकार की संयुक्त पहल
पहाड़ी क्षेत्र में भूकंप के गंभीर खतरे को देखते हुए उत्तराखंड राज्य सरकार ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (आईआईटी रुड़की) के साथ मिलकर इस खास अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को तैयार किया है। इस डिजिटल सुरक्षा प्लेटफॉर्म को वर्ष 2021 में विकसित किया गया था। यह प्रणाली भविष्य में होने वाले भूकंप की भविष्यवाणी नहीं करती, बल्कि जमीन के भीतर हलचल शुरू होते ही सक्रिय हो जाती है। यह सतह पर पहुंचने वाली विनाशकारी तरंगों से पहले ही नेटवर्क पर संकेत पकड़ लेती है, जिससे मुख्य झटके पहुंचने से 20 से 30 सेकंड पहले फोन पर तेज सायरन बजने लगता है।

## बीते 22 महीनों में 52 बार डोली जमीन
उत्तराखंड के आंकड़े बताते हैं कि बीते 22 महीनों के दौरान यहां कुल 52 बार भूकंपीय झटके दर्ज किए गए हैं। इन सभी घटनाओं में सबसे अधिक तीव्रता 6 अक्टूबर को थराली में आए भूकंप की ही रही, जिसकी माप 4.9 थी। इस भूकंप के झटके इतने प्रभावी थे कि इनका असर उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर तक अनुभव किया गया। इतनी कम अवधि में 52 बार धरती हिलने से भू-वैज्ञानिकों और शासन-प्रशासन के बीच चिंता की स्थिति बनी हुई है।

## हिमालयी फॉल्ट लाइन और उत्तराखंड का भौगोलिक संकट
उत्तराखंड के अत्यधिक भूकंप संवेदनशील क्षेत्र में आने की मुख्य वजह इसका सक्रिय टेक्टोनिक जोन में स्थित होना है। वैज्ञानिक संरचना के अनुसार राज्य के भूगर्भ से मेन फ्रंटल थ्रस्ट, मेन बाउंड्री थ्रस्ट और मेन सेंट्रल थ्रस्ट जैसी बड़ी फॉल्ट लाइनें गुजरती हैं। भूगर्भीय अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि बीते दौर में आए ज्यादातर बड़े भूकंपों के केंद्र इसी मेन सेंट्रल थ्रस्ट के निकट रहे हैं। उत्तराखंड का लगभग पूरा भूभाग इसी मेन सेंट्रल थ्रस्ट के ऊपर बसा है, जिसके कारण यहां जमीन के भीतर तनाव बढ़ने पर तेज कंपन का जोखिम हमेशा बना रहता है।

## इसका आप पर असर
यह चेतावनी प्रणाली पहाड़ी क्षेत्रों और दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले लोगों को भूकंप के समय अपनी जान बचाने के लिए 20 से 30 सेकंड का कीमती समय उपलब्ध कराती है।

- **भारत में:** उत्तर भारत और खासकर दिल्ली-एनसीआर के निवासियों के लिए हिमालयी भूकंपों का सीधा खतरा रहता है क्योंकि वहां तक तेज झटके महसूस होते हैं। इस तरह के अर्ली वॉर्निंग सिस्टम के विस्तार से घनी आबादी वाले मैदानी शहरों में भी लोगों को तुरंत सुरक्षित स्थानों की ओर भागने का अवसर मिल सकेगा।
- **उत्तराखंड में:** राज्य के निवासियों के फोन में 'भू देव ऐप' सक्रिय रहने पर जमीन हिलने से आधा मिनट पहले जोर से सायरन बज उठेगा। यह 20 से 30 सेकंड का अंतर लोगों को तुरंत पक्के मकानों से बाहर निकलकर खुले मैदान में जाने या सुरक्षित आड़ लेने में मदद करता है।
- **आपदा प्रबंधन तैयारी:** 22 महीनों में 52 बार झटके लगने के बाद प्रशासन और आम नागरिकों को अब हर समय भूकंप सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य हो गया है। परिवारों को अपने फोन में चेतावनी ऐप सक्रिय रखने और इमारतों से सुरक्षित निकासी के रास्ते पहले से तय रखने की सलाह दी जा रही है।
- **भवन और संरचना सुरक्षा:** मेन सेंट्रल थ्रस्ट पर बसे होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण कार्यों को भूकंपरोधी मानकों के अनुसार ढालना बेहद जरूरी हो गया है। स्थानीय लोगों और बिल्डरों को अब कमजोर ढांचों की पहचान कर उनकी मरम्मत पर तुरंत ध्यान देना होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
उत्तराखंड में भूकंप की लगातार घटनाएं और चमोली का 4.9 तीव्रता का झटका मुख्य रूप से हिमालय की सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटों में बने भूगर्भीय दबाव के कारण सामने आए हैं।

- **सक्रिय टेक्टोनिक सीमा:** पूरा हिमालयी क्षेत्र एक गतिशील टेक्टोनिक ज़ोन है जहां भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट के नीचे निरंतर दबाव बना रही है। यह निरंतर दबाव चट्टानों में तनाव बढ़ाता है, जो अचानक रिलीज होकर भूकंप का रूप ले लेता है।
- **तीन प्रमुख भूगर्भीय फॉल्ट लाइनें:** राज्य के गर्भ से होकर मेन फ्रंटल थ्रस्ट, मेन बाउंड्री थ्रस्ट और मेन सेंट्रल थ्रस्ट जैसी विशाल दरारें गुजर रही हैं। इन संवेदनशील संरचनाओं में होने वाला हल्का सा विस्थापन भी सतह पर तेज झटके उत्पन्न कर देता है।
- **मेन सेंट्रल थ्रस्ट पर स्थिति:** वैज्ञानिक रिकॉर्ड के अनुसार अतीत में आए विनाशकारी भूकंपों के केंद्र इसी मेन सेंट्रल थ्रस्ट के पास केंद्रित रहे हैं। लगभग समूचा उत्तराखंड इसी फॉल्ट लाइन के ठीक ऊपर बसा हुआ है, जिससे यह क्षेत्र सबसे संवेदनशील भूकंप जोन में बना हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. भू देव ऐप को किसने और कब विकसित किया?
इस ऐप को उत्तराखंड राज्य सरकार के सहयोग से आईआईटी रुड़की ने वर्ष 2021 में विकसित किया था।

### 2. यह ऐप भूकंप आने से कितने समय पहले चेतावनी देता है?
यह ऐप मुख्य विनाशकारी झटके पहुंचने से 20 से 30 सेकंड पहले मोबाइल पर तेज सायरन बजाकर अलर्ट भेजता है।

### 3. 6 अक्टूबर को आए भूकंप की तीव्रता कितनी थी और इसका केंद्र कहां था?
6 अक्टूबर को आए भूकंप की तीव्रता 4.9 दर्ज की गई थी और इसका असर चमोली जिले के थराली क्षेत्र में देखा गया।

### 4. पिछले 22 महीनों में उत्तराखंड में कुल कितने भूकंप दर्ज किए गए?
राज्य में बीते 22 महीनों के दौरान कुल 52 भूकंप दर्ज किए जा चुके हैं।

### 5. उत्तराखंड के नीचे से कौन सी प्रमुख भूगर्भीय संरचनाएं गुजरती हैं?
उत्तराखंड के नीचे से मेन फ्रंटल थ्रस्ट, मेन बाउंड्री थ्रस्ट और मेन सेंट्रल थ्रस्ट जैसी प्रमुख फॉल्ट लाइनें गुजरती हैं।

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