उत्तराखंड में कैसे होता है जागर का आयोजन, लोक संस्कृति को बचाने के लिए उठाए जा रहे हैं कदम उत्तराखंड की पारंपरिक जागर संस्कृति को जीवित रखने के लिए देहरादून में विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। राज्य के पारंपरिक लोक कलाकारों को सम्मानित करने के साथ ही इस धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया जा रहा है। देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान में जागर का स्थान बेहद खास माना जाता है। यह केवल एक अनुष्ठानिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि लोक देवताओं का आह्वान करने और अपनी आस्था को प्रकट करने का एक बेहद प्रभावी तरीका है। इस पारंपरिक पद्धति के दौरान ढोल-दमाऊ और हुड़का जैसे पारंपरिक वाद्यों की विशेष लय पर गीत गाए जाते हैं, जिनके माध्यम से देवताओं का आह्वान किया जाता है। जब देवता किसी चुने हुए व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करते हैं, जिन्हें पश्वा या डंगरिया कहा जाता है, तो वे न केवल लोगों की समस्याओं का समाधान करते हैं, बल्कि समाज और परिवार से जुड़े आपसी विवादों में अंतिम फैसला सुनाने का कार्य भी करते हैं। राजधानी देहरादून के युवाओं के पास अब इस अनूठी परंपरा को बेहद करीब से देखने और समझने का एक खास अवसर मिल रहा है। इसके जरिए लोग कत्यूरी और चंद वंश के प्रतापी राजाओं के इतिहास और उनकी वीरता की कहानियों से परिचित हो रहे हैं, जिससे यह प्राचीन लोक धरोहर आने वाले समय में भी सुरक्षित बनी रहे। हर साल 17 सितंबर को जागर संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है, और इस मौके पर देहरादून में कई अनुभवी लोक कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देने के लिए एकत्र होते हैं। डांडी कांठी क्लब के अध्यक्ष विजय भूषण उनियाल ने बताया कि उनके शुरुआती दिनों में धार्मिक आयोजनों के दौरान जागर गीत बहुत आम हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ सामाजिक परिवेश तेजी से बदल रहा है। आज की युवा पीढ़ी इस प्राचीन कला के गहरे अर्थ और महत्व से दूर होती जा रही है, इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने संगठन के जरिए साल 2016 में जागर संरक्षण दिवस की शुरुआत की थी। पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन और शहरीकरण की वजह से पारंपरिक गीत गाने वाले कलाकार भी अब धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं, लेकिन आयोजनों के माध्यम से उन्हें राजधानी में लाकर आज के युवाओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। आयोजनों के सिलसिले में विजय भूषण ने जानकारी दी कि राज्य के 17 अलग-अलग गांवों से आने वाले ढोल वादकों और पारंपरिक जागर गायकों, जिन्हें जागरिया कहा जाता है, को राज्य वाद्य यंत्र सम्मान 2026 से सम्मानित किया जाएगा। हालांकि आम जनजीवन अब इन पुरानी कलाओं से थोड़ा दूर होता जा रहा है, फिर भी कई कलाकारों ने इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए महत्वपूर्ण काम किया है। पिछले साल ही कुमाऊं क्षेत्र की कमला पंत ने बॉलीवुड गायिका नेहा कक्कड़ के साथ मिलकर पहाड़ी संस्कृति की खुशबू पूरी दुनिया तक पहुंचाई थी। कमला पंत एक जानी-मानी जागर गायिका हैं जिन्होंने कोक स्टूडियो जैसे बड़े मंचों पर पहाड़ी धुनों को प्रस्तुत करके पूरे प्रदेश का मान बढ़ाया है। वह हमेशा से जागर के अलावा राजुला, मालूशाही, विवाह के अवसरों पर गाए जाने वाले मंगलगीत, धान की रोपाई के दौरान गूंजने वाले हुड़किया बौल और गुड़ौल जैसे तमाम उन गीतों को पुनर्जीवित करने में लगी हैं जो आज विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। परंपरा के इतिहास पर रोशनी डालते हुए विजय भूषण बताते हैं कि एक दौर ऐसा था जब इस विधा में केवल पुरुषों का ही दबदबा हुआ करता था और वही इन गीतों को गाया करते थे। लेकिन बसंती बिष्ट उत्तराखंड की पहली ऐसी महिला बनीं जिन्होंने महिलाओं के लिए जागर गायन के द्वार खोले और इस परंपरा में नया अध्याय जोड़ा। उनके इस उल्लेखनीय योगदान के लिए देश के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। आज के डिजिटल दौर में लोग जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण की प्रस्तुतियां इंटरनेट पर खूब सुनते और पसंद करते हैं, और युवा पीढ़ी भी उनके संगीत से जुड़ रही है। विजय भूषण उनियाल की यह कोशिश है कि इसी तरह आने वाली संताने भी अपनी लोक संस्कृति और पहाड़ी गीतों से जुड़ी रहें। उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं दोनों ही प्रमुख क्षेत्रों में जागर का विशेष महत्व है और इसके कई रूप देखने को मिलते हैं। इनमें कुछ गीत खास तौर पर अपने कुल देवताओं के लिए गाए जाते हैं जिन्हें देव जागर कहा जाता है, जबकि कुछ अन्य प्रकार भूतों और मसान जैसी बाधाओं को दूर करने के लिए आयोजित किए जाते हैं। इसका आप पर असर यह सांस्कृतिक पहल उत्तराखंड की लोक कलाओं के संरक्षण और उनके पुनरुद्धार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। • भारत में: देश भर में अपनी क्षेत्रीय संस्कृति और पारंपरिक कलाओं से जुड़े समुदायों को अपनी अनूठी धरोहर को सहेजने की प्रेरणा मिलती है। • उत्तराखंड में: राज्य के स्थानीय कलाकारों और ढोल वादकों को मंच मिलने से उनकी कला को आर्थिक संबल और सामाजिक पहचान दोनों मिलती है। ऐसा क्यों हुआ आधुनिकता की दौड़ और ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के कारण उत्तराखंड की पारंपरिक लोक कलाएं संकट में आ गई हैं। नई पीढ़ी का शहरी जीवन शैली की तरफ झुकाव होना और पुराने कलाकारों का बुजुर्ग हो जाना इस प्राचीन संस्कृति के लुप्त होने का मुख्य कारण बनता जा रहा है। • शहरीकरण का प्रभाव: गांवों से शहरों की ओर पलायन के कारण नई पीढ़ी अपनी जड़ों और पारंपरिक अनुष्ठानों से दूर होती चली गई है। • कलाकारों की कमी: पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने वाले और जागर गाने वाले बुजुर्ग कलाकारों की संख्या घटने से यह मौखिक परंपरा समाप्त होने की कगार पर पहुंच गई थी। सवाल-जवाब 1. उत्तराखंड में जागर किसे कहा जाता है? जागर लोक देवताओं के आह्वान और सामाजिक आस्था का एक पारंपरिक अनुष्ठान है जिसमें विशेष वाद्ययंत्रों की ताल पर गीत गाए जाते हैं। 2. पश्वा या डंगरिया किसे कहा जाता है? वह विशिष्ट व्यक्ति जिसके शरीर में अनुष्ठान के दौरान देवता अवतरित होते हैं, उसे पश्वा या डंगरिया कहा जाता है। 3. जागर संरक्षण दिवस कब मनाया जाता है? हर साल 17 सितंबर को जागर संरक्षण दिवस मनाया जाता है। 4. बसंती बिष्ट क्यों जानी जाती हैं? बसंती बिष्ट उत्तराखंड की पहली महिला हैं जिन्होंने महिलाओं के जागर गायन की परंपरा की शुरुआत की और उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। 5. विजय भूषण उनियाल किस संगठन से जुड़े हैं? विजय भूषण उनियाल डांडी कांठी क्लब के अध्यक्ष हैं। प्रेरणा और सबक उत्तराखंड की लोक संस्कृति को बचाने वाले कलाकारों का जीवन हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने की सीख देता है। • विरासत का सम्मान: अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजने के लिए व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर निरंतर प्रयास करना जरूरी है। • बाधाओं को पार करना: बसंती बिष्ट और कमला पंत जैसी महिला कलाकारों ने पारंपरिक वर्जनाओं को तोड़कर कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। • नई पीढ़ी को जोड़ना: सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से युवाओं को उनके इतिहास और लोक कलाओं से परिचित कराना अत्यंत आवश्यक है। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-kaise-hota-hai-jaagar-ka-ayojana-loka-snskriti-ko-bachane-ke-lie-uthae-ja-rahe-hain-kadama-32742 TrendKia — Har trend, sabse pehle.